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	<title>rishte &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/rishte/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "rishte"</description>
	<pubDate>Tue, 13 May 2008 19:06:09 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[कभी किसी बिछङे से पूछो,]]></title>
<link>http://shipsag.wordpress.com/2007/04/19/%e0%a4%95%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%9b%e0%a4%99%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9b%e0%a5%8b/</link>
<pubDate>Thu, 19 Apr 2007 21:14:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>shipsag</dc:creator>
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<description><![CDATA[कभी किसी बिछङे से पूछो,
कैसे घर की याद स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कभी किसी बिछङे से पूछो,<br />
कैसे घर की याद सताती है&#124;</p>
<p>बारिश में सौन्धी हुई मिट्टी,<br />
मन भीतर तक गीला कर जाती है&#124;</p>
<p>तस्वीरों में जो बचपन थोङा बाकी है,<br />
यादें उसकी अब भी गुदगुदाती हैं&#124;</p>
<p>बाज़ार में सजी कोई फुलकारी,<br />
दूर अपने देस ले जाती है&#124;</p>
<p>कभी किसी बिछङे से पूछो,<br />
कैसे घर की याद सताती है&#124;</p>
<p>खुशियाँ दिलासा देने जब,<br />
कभी-कभार दस्तक दे जाती हैं,</p>
<p>दादी-काकी, मामी - नानी,<br />
कहाँ बलाएँ लेने आती हैं&#124;</p>
<p>धुन हर गीत की पुराने<br />
गली के नुक्कङ तक पँहुचाती है&#124;</p>
<p>कभी किसी बिछङे से पूछो,<br />
कैसे घर की याद सताती है&#124;</p>
<p>महकता हुआ रजनीगँधा हर,<br />
घर के आँगन में ले चलता है&#124;</p>
<p>पर दीवाली का दीया भी यहाँ,<br />
सप्ताहांत को तरसता है&#124;</p>
<p>लौटेगा तू कब घर अपने,<br />
मन बार-बार ये प्रश्न करता है&#124;</p>
<p>कभी किसी बिछङे से पूछो,<br />
कैसे घर की याद सताती है&#124;</p>
<p>अजनबी देस में, यहाँ- वहाँ,<br />
रिश्तों की तलाश की जाती है&#124;</p>
<p>जाने खुद से ये आँख-मिचौली,<br />
अभी कितने बरस बाकी है&#124;</p>
<p>पहचान कहीं गुम गयी है,ये गुत्थी<br />
क्या खोया,क्या पाया सुलझ नहीं पाती है&#124;</p>
<p>कभी किसी बिछङे से पूछो,<br />
कैसे घर की याद सताती है&#124;</p>
<p>बारिश में सौन्धी हुई मिट्टी,<br />
मन भीतर तक गीला कर जाती है&#124;</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कुछ पुरानी किताबों के पन्ने]]></title>
<link>http://shipsag.wordpress.com/2007/03/23/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%9b-%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%8d/</link>
<pubDate>Fri, 23 Mar 2007 20:21:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>shipsag</dc:creator>
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<description><![CDATA[बरसों बाद खुले,कुछ पुरानी किताबों के प]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बरसों बाद खुले,कुछ पुरानी किताबों के पन्ने&#124;</p>
<p>उम्र के बोझ तले,पीले साँचे में ढले,<br />
पन्ने कुछ अधखुले,आज यों खुले,</p>
<p>सूखे गुलाबों की बासी खुशबू समेटे,<br />
वक्त से पिछङ,कल को आज में लपेटे,</p>
<p>कागज़ के मुङे- तुङे पुर्जे छुपाये हुए,<br />
जाने कितने राज़ सीने में दबाये हुए,</p>
<p>भीगे मौसमों की स्याही फैलाये हुए,<br />
अश्कों के निशां गालों पर सजाये हुए,</p>
<p>बरसों बाद खुले कुछ पुरानी किताबों के पन्ने&#124;</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[ ऐसी भी क्या दिल्लगी]]></title>
<link>http://shipsag.wordpress.com/2006/10/18/%e0%a4%90%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%97%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Wed, 18 Oct 2006 03:20:14 +0000</pubDate>
<dc:creator>shipsag</dc:creator>
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<description><![CDATA[हमारे एक मित्र Entomologist हैं, अर्थात कीट-वि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हमारे एक मित्र Entomologist हैं, अर्थात कीट-विज्ञान शास्त्री&#124;एक दिन उनसे मिलने के लिये हम उनकी लैबोरटरी में पँहुच गये&#124;डेंगू जैसी बीमारी फैलाने वाले जीव के विषय में जानने की इच्छा प्रकट करने पर उन्होने हमें एक किस्सा सुना कर टरका दिया&#124; हमने सोचा ज्ञान नही बाँट सकते तो क्या वो किस्सा ही आपको सुना देते हैं&#124;<br />
एक स्लाइड पर एक मच्छर की निष्प्राण काया को रख हमारे मित्र जाने किस ख्याल में डूबे हुए थे&#124;<br />
हमने उन्हे चेताया , अरे भाया, इस तुच्छ मच्छर ने सारे भारत में है आतंक फैलाया, इतने पर भी उन्हें कुछ समझ में ना आया, और उन्होने उस मच्छर का दुखङा हमें कुछ यों सुनाया, जिसे सुन हमें भी बेचारे मच्छर की किस्मत पर रोना आया&#124; तो किस्सा कुछ यों है--<br />
 <br />
कालेज में मलेरिया ,डेंगू ,कालेरा  जब पढा रहे थे लेक्चरार&#124;<br />
उसी समय बेचारे मच्छरजी की मक्खीजी से आँखें हो गयी चार&#124;</p>
<p>इश्क का चढा तेज़ बुखार और दोनो हो गये इक-दूजे के बीमार&#124;<br />
डेटिंग पर अब कहाँ जाया जाए, इस पर किया दोनो ने विचार&#124;</p>
<p>मुनिसिपल्टी के नाले या,पार्क के गड्ढो में किया जाये विहार&#124;<br />
मैकडोनल्ड के कच्ररेदान में खाया, प्रेम से फास्ट-फूड का आहार&#124;</p>
<p>सोचा रिश्ता अटूट हो जाए, अब ये, विवाह को बना आधार&#124;<br />
कुण्डली मिली तो, झट,मच्छर पण्डित को प्रकट किया आभार&#124;</p>
<p>शुभ मुहूर्त की तारीख तय हुई,और दिन तय हुआ सोमवार&#124;<br />
सज-धज कर आयी मक्खी,तन- मन से उसने किया श्रिंगार&#124;</p>
<p>महक रही थी वो ऐसे, जैसे साथ लायी हो  अपने नयी बहार&#124;<br />
अँखियों में लक्मे का काजल लगा,छोङ रही थी तीर वो एक हज़ार&#124;</p>
<p>पर हाय रे किस्मत! पास आते ही हुए धराशायी मच्छर जी हमार&#124;<br />
खोज-बीन की तो पता चला हमको इसका विचित्र कारण यार&#124;</p>
<p>डिओडोरेंट ना मिला तो मक्खीजी ने ओडोमास क्रीम लगाई बार-बार&#124;<br />
और महकने के लिये,बेचारे मच्छरजी पर कर दिया अनजाने में वार&#124;</p>
<p>इसलिये कहत हैं बछुवा ,काहू को ना चढे ऐसन प्रीत का बुखार&#124;<br />
बेचारे मच्छरवा की खातिर रोवत है दिल बार-बार, ज़ार-ज़ार हमार&#124;   </p>
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