विनय wrote 1 year ago: लो! यह दिन भी क़रीब आ गये जानम जब मैं तुम्हारे लिए सरे-बाम खड़ा होता था इस बरस होली के रंग रास नहीं आ … more →
विनय wrote 2 years ago: शाम गहरी हो रही थी सुनहरा चाँद बादलों से झाँक रहा था छत पे था मैं और पुरवाई बह रही थी तेरा ख़्याल और … more →