<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><!-- generator="wordpress.com" -->
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	>

<channel>
	<title>samajwadi-janparishad &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/samajwadi-janparishad/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "samajwadi-janparishad"</description>
	<pubDate>Sat, 19 Jul 2008 05:21:32 +0000</pubDate>

	<generator>http://wordpress.com/tags/</generator>
	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[चरम गुलामी : जब गुलामी भाने लगती है , बौद्धिक साम्राज्यवाद(३):अफ़लातून]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/?p=281</link>
<pubDate>Tue, 19 Feb 2008 10:23:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
<guid>http://samatavadi.wordpress.com/?p=281</guid>
<description><![CDATA[&#8216; विचारधारा और इतिहास के अंत की &#8216; घो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="left"><strong>' विचारधारा और इतिहास के अंत की '</strong> घोषणाओं का वैश्वीकरण के हक़ में एक निश्चित बौद्धिक सहयोग है । फोर्ड फाउन्डेशन पोषित एक शोध में पुराने <strong>राष्ट्र-राज्य</strong> की अवधारणा के स्थान पर <strong>राज्य-राष्ट्र </strong>और<strong> 'मल्टीनेशनल स्टेट'</strong> जैसी अवधारणा प्रस्तुत करते हुए कस्मीर और उत्तर-पूर्वी  भारत के उदाहरण दिए गए हैं । ऐसे विद्वानों द्वारा तमिलनाडु के हिन्दी विरोधी आन्दोलन में बहुराष्त्रीय राज्य के तत्व होने की बात कही गई है । <em><font color="#0000ff">गुलामी के चरम दौर को समझाते हुए किशन पटनायक कहते थे कि उसमें गुलामी का अहसास भी नहीं रह जाता है । अहसास रहने पर मानव-स्वभाव मुक्ति के लिए उद्यत होता है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया था कि गुलामी में एक प्रकार की सुरक्षा का अहसास रहता है। बौद्धिक गुलामी के बारे में भी ये सामान्य बातें लागू होती हैं ।</font></em></p>
<p align="left"><font color="#0000ff"><em>    </em></font><font color="#000000">सरकार द्वारा लिए गए विदेशी धन से चलने वाली प्राथमिक शिक्षा परियोजनाओं में अदना नौकरी करने और शोध परियोजनाओं का परिचालन करने फर्क को नजरन्दाज नहीं किया जाना चाहिए , पर छोटी-बड़ी किसी भी विदेशी मदद से चलने वाली परियोजनाओं में यदि भारत के प्रगतिशील कहे जाने वाले समाज विज्ञानी शरीक हों तब उनकी गतिविधियों और भूमिका की जांच का एक तरीका अवश्य होना चाहिए(कि.प.)।कम्युनिस्ट पार्टियों में जांच का एक तरीका मौजूद है। <strong><font color="#0000ff">जो समूह वैश्वीकरण का मुकम्मल विकल्प देने की विचारधारा से लैस होने का दावा करते हैं उन्हें बौद्धिक साम्राज्यवाद के इन पहलुओं के प्रति सचेत रहना होगा ।</font></strong></font></p>
<p align="left"><font color="#0000ff"><strong>    </strong></font><font color="#000000">विदेशी दानदाता संस्थाओं के द्वारा 'मानवीय चेहरे वाला वैश्वीकरण' और 'न्यायपूर्ण वैश्वीकरण' की घोषणाएं की जा रही हैं जिनका मकसद वैश्वीकरण विरोधी जन-उभार को दिग्भ्रमित करना है। हालांकि गौण या हाशिए के मसलों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कुछ ऊपरी तौर पर प्रगतिशील दिखने वाले अध्ययनों और आन्दोलनों को बढ़ावा दिया जाता है। 'सबऑल्टर्न स्टडीज़' इसका नमूना है। पूंजीवाद के समक्ष जब भी संकट आता है वह अपने बचाव के लिए ऐसे कदम उठाता है । महान आर्थिक मन्दी के बाद के दौर में जिस तरह कल्याणकारी राज्य के कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए ठीक उसी तरह 'मानवीय चेहरे वाला वैश्वी करण' मौजूदा दौर में चलाया जा रहा है ।</font></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">- अफ़लातून , राज्य अध्यक्ष , समाजवादी जनपरिषद - उत्तर प्रदेश</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#993366">समाजवादी जनपरिषद की बाबत अविनाश द्वारा उद्धृत जनसत्ता की कतरन में उन्हें कुछ भ्रम हुआ है।भ्रम का मुख्य आधार मेरे इन विचारों और सीएसडीएस से जुड़े दल के सदस्य का होना है। इस बाबत स्पष्ट हो कि:</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">दल के संविधान की 3.1.(2) के अनुसार सक्रिय सदस्य दल द्वारा स्वीकृत आचरण संहिता का पालन करेगा। दल की आचरण संहिता पर हमे फक्र है तथा नई राजनैतिक संस्कृति की स्थापना के लिए इसे हम अनिवार्य मानते हैं। इसे यहाँ पूरा दे रहा हूँ :</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">समाजवादी जनपरिषद के प्रत्येक सक्रिय सदस्य के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह-</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">1.1 जनेऊ जैसे जातिश्रेष्ठता के चिह्न धारण नहीं करेगा।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">1.2 छुआछूत का किसी भी रूप में पालन नहीं करेगा।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">1.3 जाति आधारित गालियों का प्रयोग नहीं करेगा ।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">1.4 दबी हुई जातियों को छोड़कर किसी भी अन्य जाति विशेष संगठन की सदस्यता स्वीकार नहीं करेगा।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">2.1 दहेज नहीं लेगा ।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">2.2 औरत की पिटाई नहीं करेगा और औरत(नारी) विरोधी गालियों का व्यवहार नहीं करेगा।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">2.3 एक पत्नी या पति के रहते दूसरी शादी नहीम करेगा और न ही उस स्थिति में बिना शादी के किसी अन्य महिला/पुरुष के साथ घर बसाएगा ।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">3 धार्मिक या सांप्रदायिक द्वेष फैलाने वाली किसी भी गतिविधि में शामिल नहीं होगा ।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">4 समाजवादी जनपरिषद के प्रत्येक सदस्य के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह ऐसे किसी गैरसरकारी स्वैच्छिक संस्था (  NGO ), जो मुख्यत: विदेशी धन पर निर्भर हो,</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">(क) का संचालन नहीं करेगा ।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">(ख) की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली समिति का सदस्य नहीं होगा।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">(ग) से आजीविका नहीं कमाएगा ।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">5.1 सदस्यता-ग्रहण/नवीनीकरण के समय अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति व आय की घोषणा करेगा ।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">5.2 अपनी व्यक्तिगत आय का कम से कम एक प्रतिशत नियमित रूप से समाजवादी जनपरिषद को देगा।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">5.3 विधायक या साम्सद चुने जाने पर अपनी सुविधाओं का उतना अंश दल को देगा जो राष्त्रीय कार्यकारिणी द्वारा तय किया जायेगा।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">    उपर्युक्त आचरण संहिता के प्रावधान को न मानना दल की न्यूनतम कसुटी का उल्लंघन माना जाएगा और यह दल द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अनुशासनात्मक कार्यवाही का आधार होगा।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff"></font></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बौद्धिक साम्राज्यवाद..(२) : जिनका भाँडा फूट चुका है- अफ़लातून ]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/?p=280</link>
<pubDate>Mon, 18 Feb 2008 13:56:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
<guid>http://samatavadi.wordpress.com/?p=280</guid>
<description><![CDATA[
&#8216;बौद्धिक साम्राज्यवाद की शिनाख्त]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class="post-body">
<div align="left">'बौद्धिक साम्राज्यवाद की शिनाख्त' शीर्षक से ७ दिसम्बर २००५ को जनसत्ता के सम्पादकीय पृष्ट पर छपे लेख का <a href="http://mohalla.blogspot.com/2008/02/blog-post_17.html"><font color="#1b703a">प्रथम भाग</font></a> 'मोहल्ला' में छपा था । आज दूसरा भाग प्रस्तुत है ।</div>
<div align="left"><span class="fullpost"><strong>जिनका भाँडा फूट चुका है</p>
<p>फोर्ड फाउन्डेशन और सीआईए के अधिकारी रिचर्ड बिसेल ने परराष्ट्र संबंध परिषद के एक चर्चा समूह से मुखातिब होते हुए कहा - </strong></span></div>
<blockquote>
<p align="left">&#160;</p>
</blockquote>
<div align="left">यदि एजेंसी को असरकारक बनना है तो उसे निजी संस्थाओं का प्रयोग और व्यापक स्तर पर करना होगा ,हालांकि जिन संबंधों का भांडा फूट चुका है उन्हें फिर से गढ़ना नामुमकिन है । हमें अपने क्रियाकलापों को गहरे आवरण के नीचे संचालित करना होगा। और 'मध्यस्थों' के इस्तेमाल को बढ़ाना होगा। यदि ये समूह अपनी आमदनी के मूल स्रोत के बारे में अवगत नहीं होते तब भांडा फूटने के फलस्वरूप हुआ नुकसान काफ़ी कम होता । "</p>
<p>जी विलियम डॉमहॉक की पुस्तक ' द हायर सर्कल्स' में 'हाउ द पावर इलीट मेक फॉरेन पॉलिसी' शीर्षक से एक अध्याय है। फोर्ड फाउन्डेशन द्वारा वित्त पोषित पररा्ष्ट्र संबंध परिषद की कार्य प्रणाली की बाबत इस अध्याय में प्रकाश डाला गया है -<br />
" राजनीतिशास्त्री लेस्टर मिलब्रैथ कहते हैं सरकार से सहायता प्राप्त न किए जाने के बावजूद परिषद की स्वायत्त कार्रवाइयों और सरकार प्रेरित कार्रवाई में फर्क कर पाना बहुत कठिन है । अपनी शोध पत्रिका <strong><em>फॉरेन एफ़ेयर्स</em></strong> से प्राप्त आमदनी और निवेश से प्राप्त लाभांश के अलावा परिषद की आय का प्रमुख स्रोत विभिन्न बहुराष्ट्रीय कंपनियां और फोर्ड , रॉकफ़ेलर जैसे प्रतिष्ठान होते हैं ।" <em>परिषद के साथ संबंधों का वृत्त पूरा होता है इन प्रतिष्ठानों के ट्रस्टियों-पदाधिकारियों के परिषद के सदस्य होने से ।एक अध्ययन के अनुसार रॉकफेलर फाउन्डेशन के बीस में बारह , फोर्ड फाउन्डेशन के पन्द्रह में दस और कार्नेगी फाउन्देशन के चौदह में दस ट्रस्टी इस परराष्ट्र परिषद में भी थे ।</em></p>
<p>परिषद और प्रतिष्ठानों के अलावा शुद्ध शैक्षणिक समूहों की प्रवृत्तियाँ भी गौरतलब हैं । १९४२ में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के रजत जयन्ती समारोह के अवसर पर महात्मा गांधी ने कहा था कि " <strong>हमारे देश के विश्वविद्यालय पश्चिम के विश्विद्यालयों के 'सोख़्ता' हैं । पूर्व के हार्वर्ड ,एमाईटी अथवा पूर्व के ऑक्स्फॉर्ड ,कैम्ब्रिज कहलाना उपनिवेश रह चुके देशों के विश्वविद्यालयों द्वारा मौजूदा दौर में भी फख्र के साथ होता है। </strong>विश्वविद्यालय की योग्यता का मूल्यांकन पश्चिमी देशों के विद्वानों से करवाने की होड़ लग जाती है।'गुणवत्ता' के ऐसे प्रमाणपत्र प्राप्त करने के बाद ही वे 'विश्व स्तरीय' माने जाते हैं।</div>
<div align="left">जाहिर है , विश्व स्तरीय संस्थाओं से ही इन देशों के उच्च शैक्षणिक संस्थानों का गठजोड़ होता है । <strong>विदेश जाने के वजीफे , शोध-परियोजनाएं इस गठजोड़ को पुख़्ता करने के प्रमुख साधन हैं । पश्चिम की अंधी नकल और पश्चिमी देशों की शोध-पत्रिकाओं में परचों के प्रकाशन के साथ जुड़ी प्रतिष्ठा बौद्धिक गुलामी का आम लक्षण है।</strong></div>
<div align="left">तीसरी दुनिया में अमेरिकीकरण का एक बड़ा प्रयास नाइजीरिया में चल रहा है । यूएसएआईडी ( USAID ) से मुख्यत: धन प्राप्त करने वाली इस परियोजना को अनुपूरक सहायता फोर्ड और कार्नेगी फाउन्डेशन से प्राप्त होती है । परियोजना का घोषित लक्ष्य नाइजीरिया के भावी नेताओं को निर्णय प्रक्रिया के संदर्भ में ' वैचारिक प्रशिक्षण ' प्रदान करना है । नाइजीरिया की शैक्षणिक संस्थाओं के लिए बाहरी मदद के स्रोत और असर को निश्चित करने के साथ-साथ इस परियोजना द्वारा अमेरिकी अन्वेषकों को नाइजीरिया में अनुप्रवेश भी मिलता है । दानदाताओं को विश्वविद्यालय केन्द्रित तकनीकी शोध विशेषज्ञों की सूची प्रदान करना भी एक उद्देश्य से इन दूरगामी मनोवैज्ञानिक कार्रवाइयों पर अरबों डॉलर खर्च किए जा रहे हैं ।</div>
<div align="left">राजनीतिशास्त्रियों का अमेरिकी एसोशियेशन गंभीरतापूर्वक अपना अंतर्राष्ट्रीयकरण करने की दिशा में पहल कर चुका है । एसोशियेशन की अंतर्राष्ट्रीय कमेटी के अध्यक्ष आशुतोष वार्ष्णेय (अनिवासी भारतीय और CSDS के साथ फोर्ड फाउन्डेशन की एक परियोजना के प्रमुख) इस पहल की प्रासंगिकता को समझाते हुए चीन और भारत की मौजूदा दौर की प्रगति का उल्लेख करते हैं। एसोशियेशन की अध्यक्ष मार्गरेट लेबी के साथ वार्ष्णेय ने हाल ही में भारत का दौरा किया था। दौरे के मद्देनजर युवा भारतीय राजनीतिशास्त्रियों की बंगलूर में बैठक आयोजित की गई(भारत में इसकी पहलकदमी सीएसडीएस से जुड़े एक व्यक्ती ने की) । यह गौरतलब है कि वार्ष्णेय 'परराष्ट्र नीति परिषद' की एशिया प्रकोष्ठ का प्रमुख भी है ।फोर्ड फाउन्डेशन की छोटी मोटी परियोजनाओं का प्रमुख होने के अलावा अमेरिकी शिक्षा विभाग की दसियों लाख डॉलर की परियोजना उसके पास हैं। तीसरी दुनिया के देशों में शैक्षणिक सम्पर्क सूत्र बनाने के अलावा ऐसे लोगों द्वारा विदेश सेवा के अफसरों को भी जो्ड़ने के तत्परता से प्रयास होते हैं। इन प्रयासों के अंतर्गत विदेश में भारी वित्तीय मदद और सुविधाओं के साथ <strong>'अध्ययन अवकाश' </strong>के मौके प्रदान किए जाते हैं।(वार्षणेय द्वारा श्रीलंका में पोस्टेड एक भारतीय राजनयिक को ऐसा ऑफ़र देने की बात मुझे उक्त राजनयिक ने बतायी) [अगली(अन्तिम) कड़ी में <strong>विचारधारा और इतिहास का अन्त और बौद्धिक साम्राज्यवाद]</strong></div>
<div style="clear:both;"></div>
</div>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नई राजनीति के नेता : जुगलकिशोर रायबीर]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/11/06/%e0%a4%a8%e0%a4%88-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a5%81%e0%a4%97%e0%a4%b2%e0%a4%95%e0%a4%bf/</link>
<pubDate>Tue, 06 Nov 2007 07:16:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
<guid>http://samatavadi.wordpress.com/2007/11/06/%e0%a4%a8%e0%a4%88-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a5%81%e0%a4%97%e0%a4%b2%e0%a4%95%e0%a4%bf/</guid>
<description><![CDATA[  

    उत्तर भारत की राजनीति पर नज़र रखने]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>  </p>
<p><a href="http://samatavadi.files.wordpress.com/2007/11/windowslivewriter5cc99d762e15-9badjugalda4.jpg"><img width="409" src="http://samatavadi.files.wordpress.com/2007/11/windowslivewriter5cc99d762e15-9badjugalda-thumb2.jpg" height="398" style="border:0;" /></a></p>
<p>    उत्तर भारत की राजनीति पर नज़र रखने वाले बसपा के गाँधी-विरोधी तेवर से परिचित होंगे। राजनीति की इतनी खबर रखने वाले यह भी जानते होंगे कि नक्सलबाड़ी उत्तर बंगाल का वह गाँव है जहाँ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से अलग हो कर भा.क.पा. ( मा-ले ) की स्थापना हुई और इस नई जमात द्वारा " बुर्जुआ लोकतंत्र को नकारने तथा वर्गशत्रु के खात्मे" के सिद्धान्तों की घोषणा हुई ।</p>
<p>    उत्तर बंगाल के इन्हीं चार जिलों ( कूच बिहार , उत्तर दिनाजपुर , जलपाईगुड़ी , दार्जीलिंग ) से एक अन्य जनान्दोलन भी गत तीन दशकों में उभरा जिसने उत्तर बंग को एक <strong>आन्तरिक उपनिवेश</strong> के रूप में चिह्नित किया और बुलन्दी से इस बात को कहा कि आजादी के बाद विकास की जो दिशा तय की गई उसमें यह अन्तर्निहित है कि बड़े शहरों की अय्याशी उत्तर बंगाल , झारखण्ड , पूर्वी उत्तर प्रदेश , उत्तराखन्ड , छत्तीसगढ़ जैसे देश के भीतर के इन इलाकों को 'आन्तरिक उपनिवेश' बना कर,  लूट के बल पर ही मुमकिन है । नक्सलबाड़ी में वर्ग शत्रु की शिनाख्त सरल थी । खेती की लूट का शिकार छोटा किसान भी है और उसे खेत मजदूर के साथ मिल कर इस व्यवस्था के खिलाफ़ लड़ना होगा इस समझदारीके साथ उत्तर बंग में जो किसान आन्दोलन उभरा उसके प्रमुख नेता थे <strong>साथी जुगलकिशोर रायबीर</strong> जुगलदा की अगुवाई में उत्तर बंगाल के किसान आन्दोलन के दूसरी प्रमुख अनूठी बात थी कि इस जमात में अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग जुटे जो अम्बेडकर की सामाजिक नीति के साथ गाँधी की अर्थनीति को लागू करने में यकीन रखते हैं। बंगाल के अलावा कर्नाटक का <strong>'दलित संघर्ष समिति'</strong> ऐसी जमात है जिसके एक धड़े ने बहुजन समाज पार्टी में विलय से पहले  कांशीरामजी के समक्ष शर्त रखी थी कि आप गांधी की  आलोचना नहीं करेंगे। <a href="http://samatavadi.files.wordpress.com/2007/11/windowslivewriter5cc99d762e15-9badbargarh6.jpg"><img width="420" src="http://samatavadi.files.wordpress.com/2007/11/windowslivewriter5cc99d762e15-9badbargarh-thumb4.jpg" height="429" style="border:0;" /></a></p>
<p>    नई राजनैतिक संस्कृति की स्थापना के मकसद से १९९२ में जब <strong>समाजवादी जनपरिषद</strong> की स्थापना हुई तब लाजमी तौर पर इसके पहले अध्यक्ष साथी जुगलकिशोर रायबीर चुने गए और इस बार ( सातवें सम्मेलन में ) पुन: राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए। आज सुबह साढ़े चार बजे उनकी मृत्यु हुई । वे रक्त कैन्सर से जूझ रहे थे । अपने क्रान्तिकारी साथी की मौत पर हम संकल्प लेते हैं कि उनके सपनों को मंजिल तक पहुँचाने की हम कोशिश करेंगे।</p>
<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%9c%e0%a5%81%e0%a4%97%e0%a4%b2%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a5%8b%e0%a4%b0%20%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0">जुगलकिशोर रायबीर</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%89%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%b0%20%e0%a4%ac%e0%a4%82%e0%a4%97">उत्तर बंग</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%80%20%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%b7%e0%a4%a6">समाजवादी जनपरिषद</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a8%20%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a4%be">किसान नेता</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/jugal%20kishor%20raibir">jugal kishor raibir</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/samajwadi%20janaparishad">samajwadi janaparishad</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/north%20bengal">north bengal</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/alternative%20politics">alternative politics</a></p>
<p align="left">&#160;</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA['लोकतंत्र का जिला-बदर' : ले. सुनील]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/23/%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%95%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a4%b0-%e0%a4%b2%e0%a5%87-%e0%a4%b8/</link>
<pubDate>Thu, 23 Aug 2007 07:28:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
<guid>http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/23/%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%95%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a4%b0-%e0%a4%b2%e0%a5%87-%e0%a4%b8/</guid>
<description><![CDATA[Technorati tags: शमीम, अनुराग, जिला-बदर, हरदा, shamim, anu]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b6%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%ae">शमीम</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%97">अनुराग</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a4%b0">जिला-बदर</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a4%a6%e0%a4%be">हरदा</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/shamim">shamim</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/anurag">anurag</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/externment">externment</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/harda">harda</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/M.P.">M.P.</a></p>
<p align="left">    भारत एक लोकतंत्र है । कई बार हम गर्व करते हैं कि जनसंख्या के हिसाब से यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है । अपने पड़ोसियों की तुलना में हमने लोकतंत्र को बचाकर रखा है। लेकिन इस लोकतंत्र में आम लोगों की इच्छाओं , आकांक्षाओं तथा चेतना को बाधित करने व कुचलने की काफ़ी गुंजाइश रखी गयी है । ऐसा ही एक मामला मध्य - प्रदेश के हरदा जिले के सामने आया है ।</p>
<p align="left">    हरदा जिले के कलेक्टर ने इस जिले में आदिवासियों , दलितों और गरीब तबकों को संगठित करने का काम कर रहे एक दम्पति को जिला बदर करने का नोटिस दिया है। समाजवादी जनपरिषद नामक एक नवोदित दल से जुड़े शमीम मोदी और अनुराग मोदी पर आरोप लगाया है कि वे बार - बार बिना सरकारी अनुमति के बैठकों , रैली , धरना आदि का आयोजन करते हैं तथा आदिवासियों को जंगल काटने और वनभूमि पर अतिक्रमण करने के लिए भड़काते हैं । वे परचे छापते हैं और जबरन चन्दा करते हैं। मध्य-प्रदेश राज्य सुरक्षा अधिनियम १९९० की धारा ५ (ख) के तहत एक वर्ष की अवधि के लिए हरदा व निकटवर्ती जिलों होशंगाबाद , सीहोर, देवास , खंडवा तथा बैतूल से जिला बदर करने का नोटिस उन्हें दिया गया है ।</p>
<p align="left">    इस नोटिस से ऐसा प्रतीत होता है कि शमीम और अनुराग मानों कोई खतरनाक गुण्डों और अपराधी गिरोह के सरगना हैं । लेकिन इकहरे बदन वाले दुबले-पतले मोदी दम्पति</p>
<p align="left">से हरदा की सड़कों पर टकरायें,तो दूसरी ही<a href="http://samatavadi.files.wordpress.com/2007/08/windowslivewriterdb7e4359e80d-b665harda14.jpg"><img width="490" src="http://samatavadi.files.wordpress.com/2007/08/windowslivewriterdb7e4359e80d-b665harda-thumb12.jpg" height="391" style="border:0;" /></a> धारणा बनती है। <strong>वे लोग गुण्डागर्दी तो क्या करेंगे , लेकिन पिछले कई सालों से सरकारी तंत्र के गुण्डाराज से जरूर टकरा रहे हैं । </strong>बरगी बाँध के विस्थापितों के संघर्ष में साथ देने के बाद पिछले दस वर्षों से वे बैतूल , हरदा , और खण्डवा जिलों में आदिवासी तथा गरीब तबकों के साथ हो रहे अन्याय ,अत्याचार व शोषण के खिलाफ उन्हें संगठित करने का काम कर रहे हैं । मूल रूप से हरदा के ही निवासी अनुराग शिक्षा से इंजीनियर हैं। शमीम ने मुंबई के प्रतिष्ठित टाटा इन्स्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइन्सेज़ से शिक्षा प्राप्त की है।दोनों अपनी नौकरी को लात मारकर इस कठिन काम में आ कूदे हैं । इस कार्य के लिए उन्हें प्रतिष्ठा और मान्यता भी मिली है। आदिवासी वन अधिकार कानून के विषय में बनी संयुक्त संसदीय समिति और योजना आयोग ने समय-समय पर उन्हें आमंत्रित किया है। आज उन्हीं को हरदा जिला प्रशासन समाज - विरोधी तत्व तथा अपराधी गिरोह का सरगना बताकर जिला बदर करने को तुला है। इससे स्वयं मध्य प्रदेश सरकार की नीयत पर सवाल खड़ा हो गया है।</p>
<p align="left">    शमीम व अनुराग ने आज तक किसी को गाली भी नहीं दी है, मारना या मारने की धमकी देना तो दूर की बात है। उनका हर आन्दोलन अनुशासित और शान्तिपूर्ण होता है। इसके विपरीत , सत्तादल भाजपा-कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की गुण्डागर्दी की खबरें आती रहती हैं। पिछले वर्ष उज्जैन में प्रोफेसर सभरवाल हत्याकाण्ड इसका उदाहरण है । ऐसे लोगों के खिलाफ़ प्रदेश ने जिला बदर की कार्यवाही करने की जरूरत नहीं समझी, बल्कि उन्हें बचाया जाता है ।</p>
<p align="left">    दरअसल देश के आदिवासी इलाकों में विवाद का मुद्दा उस भूमि का है जिस पर वन नहीं है,आदिवासी खेती कर रहे हैं किन्तु सरकारी रिकार्ड में वह 'वनभूमि' के रूप में दर्ज है । इस कारण बड़ी संख्या में आदिवासी अपनी भूमि के जायज हक की मान्यता से वंचित है,अतिक्रमणकर्ता कहलाते हैं और उन पर अत्याचार होता है । इस ऐतिहासिक अन्याय को दुरुस्त करने के लिए पिछले साल संसद में एक कानून भी बनाया गया ।हांलाकि, इस कानून में अनेक खामियाँ रह गयीं हैं । आदिवासियों के इसी हक को मान्यता दिलाने तथा कानून की खामियों दुरुस्त करने के लिए देश भर के जनसंगठनों ने अभियान चलाया था। किन्तु हरदा जिले में यही अभियान 'जुर्म' बन गया । इसी के परचों , बुलेटिनों, बैठकों और सभाओं को जिला प्रशासन ने जिला बदर की कार्यवाही का आधार बनाया है । <strong>भारत की संसद जिस हक के लिए को कानूनी मान्यता देती है,उसे भारत के एक जिले का कलेक्टर 'गुनाह' बना देता है। </strong>विडम्बना यह है कि इसी वर्ष मध्य प्रदेश सरकार ने १८५७ के विद्रोह में आदिवासियों के योगदान को याद किया , टण्टया भील और बिरसा मुण्डा के नाम से जिले-जिले में समारोह किये। <strong>अपने समय में अंग्रेज सरकार की निगाह में टण्टया भील भी 'लुटेरा' और 'डाकू' था। आज आदिवासी हक के लिए संघर्ष करने वाले भी 'समाज-विरोधी' तथा 'अपराधी' हैं। ऐसा लगता है कि डेढ़ सौ साल में कुछ नहीं बदला है।</strong></p>
<p align="left"><strong>( जारी)</strong></p>
<p align="left"><strong>अनुराग- शमीम के जिला बदर के प्रतिवाद में ज्ञापन पर समर्थन जतायें, <a href="http://www.petitiononline.com/harda/petition.html">यहाँ</a> ।</strong></p>
<p align="left"><strong>उक्त प्रतिवेदन पर हिन्दी में हस्ताक्षर और समर्थन वक्तव्य दिया जा सकता है।</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मौजूदा चुनाव के लोकतंत्र विरोधी संकेत]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/05/09/%e0%a4%ae%e0%a5%8c%e0%a4%9c%e0%a5%82%e0%a4%a6%e0%a4%be-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b5-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%95%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Wed, 09 May 2007 09:32:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
<guid>http://samatavadi.wordpress.com/2007/05/09/%e0%a4%ae%e0%a5%8c%e0%a4%9c%e0%a5%82%e0%a4%a6%e0%a4%be-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b5-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%95%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/</guid>
<description><![CDATA[Technorati tags: assembly elections, election commission, fascism
    उत्तर प्र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/assembly%20elections">assembly elections</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/election%20commission">election commission</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/fascism">fascism</a></p>
<p align="left">    उत्तर प्रदेश का जनादेश स्पष्ट है । मुख्यधारा के किसी दल को बहुमत न देने के मामले में जनता भ्रमित नहीं है । १९९३ में सपा - बसपा गठबन्धन को स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद हुए सभी चुनावों के परिणामों से मौजूदा चुनाव अलग नहीं हुए हैं ।</p>
<p align="left">    प्रदेश के बड़े शहर होने के कारण आगरा , इलाहाबाद में २२ फ़ीसदी और बनारस में २९ - ३० फ़ीसदी मतदान की खबर मीडिया की मुख्यधारा में भी हल्की - फुल्की चर्चा का विषय जरूर बनी । चुनाव आयोग ने इस पर कहा ,</p>
<ol>
<li>
<p align="left">गत चुनावों से १० - १५ फ़ीसदी ही कम वोट पड़ना चिन्ता की बात नहीं है ।</p>
</li>
<li>
<p align="left">चुनाव आयोग ने प्रवासी आबादी का जिक्र किया और कहा कि करीब ११ फ़ीसदी लोग अन्य सूबों में रोजगार या रोजी की तलाश में चले जाते हैं ।</p>
</li>
</ol>
<p align="left">    नागालैण्ड और काश्मीर के सरहदी सूबों में कई चुनावों में बहिष्कार के आह्वान के बाद अत्यन्त कम मतदान होते थे । असम में केन्द्र की दमनकारी कांग्रेसी सरकार द्वारा नेल्ली जैसे नरसंहार के बाद कराए गए चुनाव का जनता ने बहिष्कार किया था । ६० वोट , १२२ वोट पाने वाले भी विधायक - मन्त्री बने थे और कांग्रेसी सुश्री अनवरा तैमूर मुख्यमंत्री बनी थीं ।जनता द्वारा इच्छित कम भागीदारी वाले इन चुनावों को लोकतंत्र की कमजोरी और कांग्रेस के फासीवादी रुझान का द्योतक माना गया था ।</p>
<p align="left">  उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव प्रक्रिया की शुरुआत से चुनाव आयोग सिर्फ मतदाता परिचय पत्र के आधार पर मतदान कराने की बहादुरी से घोषणा कर रहा था ।अधिसूचना के बाद तक स्थानीय प्रशासन फोटो पहचान पत्र बनवाने में जुटा था । मतदान के बाद भी स्थानीय प्रशासन  इस बार <strong>" २० फ़ीसदी हुए मतदान में ७३ या ८१ फ़ीसदी लोगों ने परिचय पत्र दिखा कर वोट दिए "</strong> जैसी घोषणा कर फूला नहीं समा रहा था ।</p>
<p align="left">    सन २००१ से भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा जारी किए जा रहे फोटो पहचान पत्र संभाल कर रखने वाले जो लोग मतदाता सूची में नाम न होने के कारण मतदान से वंचित रहे उन पर स्थानीय प्रशासन और आयोग मौन है , अखबार और टे.वि. चैनल सरसरी तौर पर जिक्र कर कर्त्तव्य की इतिश्री मान ले रहे हैं तथा चुनावी दल पूरी तरह निश्चिन्त रहते हैं कि जिनके नाम हैं उन्हीं की चिन्ता की जाए ।</p>
<p align="left">    यह भी उल्लेखनीय है कि कि रोजगार की  तलाश में पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों से लोग मुम्बई -दिल्ली जाते हैं , शहरों से कम । जौनपुर और गाजीपुर जिलों की जनगणना रिपोर्ट से प्रवासन साफ झलकता है - इन जिलों में स्त्रियों की आबादी पुरुषों से अधिक है । चुनाव के यह महीने प्रवासियों के गाँव लौटने के भी महीने हैं ।</p>
<p align="left">    <strong>हिन्सा - मुक्त चुनाव कराने के लिए आयोग और प्रशासन की वाहवाही होना लाजमी है लेकिन मताधिकार से वंचित लाखों लोग जम्हूरियत के कमजोर होने की गवाही देते हैं ।</strong></p>
<p align="left">    मतदाता सूची में भारी गड़बड़ियों के अलावा सम्पूर्ण चुनाव प्रक्रिया में ऐसा काफी कुछ था जो हमारे जैसे छोटे राजनैतिक दलों के खिलाफ़ था और भ्रष्टाचार और पूँजीपतियों से किए गए अकूत धन-राशि खर्च करने वाले बड़े दलों के हक में । जनता से संवाद के लिए आयोजित जन सभाओं के के लिए अनुमति देने की बाबत ऐसा ही कुछ हुआ । आयोग द्वारा बड़े दलों के बड़े नेताओं की सूची अपनी वेबसाईट पर डाल दी गयी थी । मुमकिन है कि इन दलों से यह सूची माँगी गयी हो । इस सूची में विश्वनाथ प्रताप - राज बब्बर का जनमोर्चा गौरतलब अपवाद था - मान्यताप्राप्त दल न होने के बावजूद इसके नेता भी सूची में थे । सूची में उल्लिखित नेताओं के सभा के लिए अनुमति दी जाती थी । अन्य दलों को दो चरणों के बीच की अवधि में ही सभा की अनुमति दी गयी । मसलन सातवें दौर ( ८ मई )  के चुनाव के लिए छठे दौर ( ३ मई ) के बाद यानी ३ से ६ मई तक ही सभाओं की इजाजत दी गयी। उसके पहले प्रशासन द्वारा यह कह दिया जाता था कि <strong>पुलिस बल की कमी के कारण अनुमति नहीं दी जा रही है ।</strong></p>
<p align="left">    पोस्टर - बैनर - दिवाल लेखन पर रोक के कारण महीनों पहले से टेलिविजन , राष्ट्रीय पत्रिकाओं और अखबारों में भारी खर्च वाले विज्ञापन ही जनता को दृष्टिगोचर हुए । छोटे कस्बों के संवाददाताओं को स्पष्ट निर्देश था कि <strong>बिना विज्ञापन प्रेस विज्ञप्ति न लें , किसी प्रेस वार्ता में भाग न लें ।</strong></p>
<p align="left">    चुनावी प्रक्रिया के बुनियादी अवयवों पर रोक का नतीजा लोकतंत्र को कमजोर करने वाले साधनों को सबल करता है । पूर्वी उत्तर प्रदेश के दो प्रमुख माफिया गिरोहों के वास्तविक 'चुनाव खर्च' के तरीकों पर गौर करें । <strong>मुख्तार अन्सारी</strong> के कारिन्दे ज्यादा से ज्यादा शादियों में ' न्यौता देने ' और धन के अलावा अपने आका का सन्देश भी देते , ' जरूरत पड़ने पर और पैसा दिया जाएगा ' । <strong>बृजेश सिंह</strong> के भतीजे सुशील सिंह धानापुर के कई हार्वेस्टर कब्जे में ले कर मतदाताओं की मुफ़्त में कटनी करवा कर दिल जातना चाहा ।</p>
<p align="left">    चुनाव आयोग अथवा न्यायपालिका द्वारा चुनाव प्रक्रिया में कुछ तब्दीलियाँ की जाती रही हैं। सम्पत्ति और आपराधिक मामलों की बाबत शपथ पत्र देना इनमें प्रमुख है । इन पर आपत्ति करते हुए प्रतिवाद न किए जाने तक इन शपथ पत्रों में उल्लिखित तथ्यों की जाँच नहीं की जाती । सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मुलायम सिंह यादव की सम्पत्ति की जाँच सी.बी.आई. द्वारा कराने का निर्देश एक कांग्रेसी की जनहित याचिका पर हुआ है , आयोग के कहने पर नहीं । यह उल्लेखनीय है कि <strong>डॉ. लोहिया की मृत्यु के समय उनके पास पार्टी के दौरों में काम आने वाली एक अटैची और किताबें बतौर निजी सम्पत्ति थीं । लोकसभा हेतु चुने के पहले तक लोहिया का निजी बैंक खाता भी नहीं था। </strong></p>
<p align="left">    आपराधिक मुकदमों की बाबत जमा किए शपथ पत्रों की बाबत आयोग की गम्भीरता का उदाहरण लीजिए । वाराणसी के लोकसभा प्रतिनिधि <strong>राजेश मिश्रा</strong> ने नामांकन के वक्त बाहलफ़ कहा था कि उन पर कोई मुकदमें लम्बित नहीं हैं । उम्मेदवारों के शपथ-पत्र स्कैन कराके आयोग अपनी वेबसाइट पर देता है , इसे देखा जा सकता है ।<strong> राजेश मिश्रा पर उस समय कम से कम बारह ऐसे मुकदमें लम्बित थे जो मुझ पर भी थे । </strong>इन अपराधों में हत्या के प्रयास , एक्स्प्लोसिव एक्ट , क्रिमिनल एमेन्डमेंट एक्ट और आगजनी की धारायें प्रमुख थीं। इन गंभीर अपराधों में हम '८६ - '८७ में लिप्त थे । <strong>आज तक इन मामलों की एक भी तारीख पर हम अदालत में नहीं गये और न ही इस वजह से हुसैन की तरह हमारी कुर्की का कभी आदेश हुआ ।</strong> इसका जिक्र सिर्फ़ इसलिए कर रहा हूँ कि यह स्प्ष्ट हो जाए कि आयोग हलफनामों में दिये तथ्यों की जाँच नहीं करता । भारतीय दण्ड संहिता में राजनैतिक/आपराधिक यह दो भाग नहीं किए गए हैं - सभी मामले अपराध की कोटि में आते हैं । दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा १४४ को तोड़ने पर भा.द.सं की धारा १८८ लगायी जाती है - शायद इसे 'राजनैतिक' माना जा सकता है । आन्दोलनों को दबाने के लिए शासन द्वारा फर्जी मुकदमे दायर किए जाते हैं तथा इनमें भा.द.सं की गम्भीर धारायें ही इस्तेमाल की जाती हैं ।</p>
<p align="left">    यह कुछ प्रसंग हैं जिनकी शिनाख्त लोकतंत्र के कमजोर होने के लक्षण के रूप में हम करते हैं ।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सलमान खुर्शीद और चुनाव आयोग का मनमानापन , विभेद]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/05/07/%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%96%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a5%80%e0%a4%a6-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b5-%e0%a4%86%e0%a4%af/</link>
<pubDate>Mon, 07 May 2007 06:23:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
<guid>http://samatavadi.wordpress.com/2007/05/07/%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%96%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a5%80%e0%a4%a6-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b5-%e0%a4%86%e0%a4%af/</guid>
<description><![CDATA[Technorati tags: eci, uttar pradesh, electoral roles
&nbsp;
मुख्य निर्वाचन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/eci">eci</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/uttar%20pradesh">uttar pradesh</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/elctoral%20roles">electoral roles</a></p>
<p align="left">&#160;</p>
<p>मुख्य निर्वाचन आयुक्त ,</p>
<p>भारत का निर्वाचन आयोग ,</p>
<p>नई दिल्ली .</p>
<p>महाशय ,</p>
<p>     २२५ वाराणसी कैन्टोनमेन्ट विधानसभा क्षेत्र में मतदाता सूची से हजारों वैध मतदाताओं के नाम गायब होने के सन्दर्भ में मैंने उप चुनाव आयुक्त,मुख्य निर्वाचन अधिकारी तथा जिला निर्वाचन अधिकारी को मतदान की पूर्व ज्ञापन दिए थे । गत लोक सभा निर्वाचन में वाराणसी जिले की मतदाता सूचियों में व्यापक गड़बड़ियों तथा हजारों मतदाता के आयोग द्वारा जारी परिचय पत्र धारक होने के बावजूद मतदाता सूची में नाम न होने के बारे में आयोग से कई शिकायतें दर्ज करायी गयी थीं ।</p>
<p>    लोकसभा निर्वाचन के बाद मतदाता सूची के पुनरीक्षण का काम डाकियों और डाकघर द्वारा कराया गया था । डाकियों द्वारा पतों की पुष्टि प्रमाणित किए जाने के बाद पोस्टमास्टर द्वारा प्रारूप ६ अग्रसारित किए गए थे । यह उल्लेखनीय है कि प्रारूप ६ मं परिवार के उन व्यक्तियों का हवाला भी दिया गया था जिनका सूची में नाम था । मतदाता पुनरीक्षण के इस दौर की पोस्टमास्टर द्वारा हस्ताक्षरित पावतियाँ मौजूद होने के बावजूद अद्यतन मतदाता सूची से हजारों नाम गायब थे । फलस्वरूप हजारों नागरिक मताधिकार से वंचित हो गए ।आयोग का ध्यान इस ओर भी आकर्षित किया गया था कि वाराणसी के स्थानीय दैनिकों में भारी संख्या में भरे हुए प्रारूप ६ जला दिए जाने की खबर छपी थी ।</p>
<p>    आज के अखबारों में उत्तर प्रदेश के मुख्य चुनाव अधिकारी के हवाले से सूचित किया गया है कि मतदाता सूची में गड़बड़ी पाए जाने के कारण कायमगंज वि.स. क्षेत्र के ४५ मतदान केन्द्रों में मतदाता सूची की गड़बड़ी को ध्यान में रख कर पुनर्मतदान का आदेश हुआ है।उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा यह बताया गया है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष श्री सलमान खुर्शीद तथा उनकी पत्नी श्रीमती लुइस खुर्शीद के नाम भी मतदाता सूची से गायब थे तथा इन मतदान केन्द्रों में भी पुनर्मतदान होगा ।</p>
<p>    मैं भारत के निर्वाचन आयोग में पंजीकृत गैर मान्यताप्राप्त राजनैतिक दल समाजवादी जनपरिषद का प्रदेश अध्यक्ष हूँ मेरे हस्ताक्षरों से अधिकृत दल के उम्मीदवार गोरखपुर जिले के धुरियापार तथा कौड़ीराम विधान सभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे हैं ।</p>
<p>  २२५ वाराणसी कैन्टोन्मेन्ट विधासभा क्षेत्र की मतदाता सूची से मेरा, मेरी पत्नी डॉ. स्वाति तथा हजारों मतदाताओं के नाम ,आयोग द्वारा जारी मतदाता परिचय पत्र और जमा किए प्रारूप ६ की हस्ताक्षरित पावती रसीदें होने के बावजूद गायब हैं तथा ३ मई को हुए चुनाव में इस प्रशासनिक तृटि के कारण हम मताधिकार का प्रयोग करने से मरहूम हो गए ।</p>
<p>    उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर आयोग से यह माँग है कि :</p>
<ol>
<li>२२५ वाराणसी कैन्टोनमेन्ट की मतदाता सूची की गड़बड़ियों,प्रारूप ६ गायब किये/जलाये जाने तथा परिचय पत्र धारक मतदाताओं के नाम सूची में न आने की जाँच हो तथा जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जाय ।</li>
<li>त्रृटिपूर्ण मतदाता सूची के आधार पर हुए मतदान को रद्द कर पुनर्मतदान काराया जाए।</li>
</ol>
<p>    ऐसा न किया जाना आयोग द्वारा मनमाने और विभेदपूर्ण कार्रवाई होगी तथा उस स्थिति में न्याय प्राप्ति के अन्य संवैधानिक रास्ते चुनने के लिए हम स्वतंत्र होंगे ।</p>
<p>           भवदीय ,</p>
<p>   अफ़लातून.</p>
<p>--<br />
Aflatoon   अफ़लातून ,State President,Samajwadi Janparishad(U.P.),( फोन 0542 - 2575063)<br />
5,Readers Flats,Jodhpur Colony,<br />
Banaras Hindu University,<br />
Varanasi,Uttar Pradesh,INDIA 221005<br />
Visit  <a href="http://samajwadi.blogspot.com">http://samajwadi.blogspot.com</a><br />
<a href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com">http://kashivishvavidyalay.wordpress.com</a><br />
URL: <a href="http://kashipursolidarity.tripod.com/">http://kashipursolidarity.tripod.com/</a><br />
<a href="http://shaishav.wordpress.com">http://shaishav.wordpress.com</a><br />
<a href="http://samatavadi.wordpress.com">http://samatavadi.wordpress.com</a>.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सीख वाले खेल और गैर - जवाबदेह चुनाव आयोग]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/04/23/%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%96-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%87-%e0%a4%96%e0%a5%87%e0%a4%b2-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%97%e0%a5%88%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a5%87/</link>
<pubDate>Mon, 23 Apr 2007 04:13:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
<guid>http://samatavadi.wordpress.com/2007/04/23/%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%96-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%87-%e0%a4%96%e0%a5%87%e0%a4%b2-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%97%e0%a5%88%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a5%87/</guid>
<description><![CDATA[Technorati tags: eci, vidhan sabha, uttar pradesh
खेल - खेल में
    संज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/eci">eci</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/vidhan%20sabha">vidhan sabha</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/uttar%20pradesh">uttar pradesh</a></p>
<h2>खेल - खेल में</h2>
<p>    संजय मंगला गोपाल । संजय ने अपने नाम से अपने माता - पिता का नाम जोड़ा है । आम तौर पर नाम के साथ जातिसूचक 'सरनेम' (गुजराती में एक इसके लिए शब्द है-'अटक') जुड़ा रहता है। महाराष्ट्र में समता आन्दोलन और छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी से जुड़े कई तरुणों ने अपने माता-पिता के नाम जोड़ना, सरनेम की जगह बरसों से शुरु किया है। भारतीय समाज में जाति की सूचना सिर्फ़ इतने से न मिले, यह नामुमकिन है।सन १९८५ में बाबा साहब अम्बेडकर की जयन्ती में मेरा भाषण सुनने के बाद एक छात्र मुझसे मिला और बोला,'आपका भाषण तो अच्छा रहा लेकिन आपकी जाति क्या है?' मैंने उसे कहा कि मैं जाति में यकीन नहीं रखता।उसने पलट कर कहा , ' कोई जाति होगी जो आप में यकीन रखती होगी,उसीका नाम बता दीजिये '। मैं निरुत्तर हो गया ।</p>
<p>    बहरहाल तरुणों और किशोरों के लिए आयोजित '  समता संस्कार शिबिरों ' में संजय कुछ खेलों के जरिये प्रशिक्षण देते हैं । जाति प्रथा को समझने  और उसके उन्मूलन पर प्रशिक्षण हेतु जो खेल होता है उसमें ५-७ की छोटी टोलियों में लड़के- लड़कियों को बाँट दिया जाता है। छोटी टोलियों में बोलने का संकोच कम होता है और कई टोलियों से कई विचार आयें इसकी सम्भावना भी अधिक रहती है ।सभी टोलियों को कुछ प्रश्न दे दिये जाते हैं जिन पर टोली का हर सदस्य अपने जवाब देता है । टोली में हुई चर्चा के नोट्स लेने का काम एक साथी करता है । टोलियों से आये निष्कर्षों की चर्चा सभी शिबिरार्थियों के बीच होती है । जाति-प्रथा उन्मूलन वाले खेल में ऐसे सवाल होते हैं :-</p>
<ol>
<li>अपनी जाति की जानकारी और अहसास आपको पहले-पहल कब और कैसे हुआ ?</li>
<li>अन्य जातियों ( ऊपर की तथा नीचे की ) के साथ आपकी जाति के सम्बन्ध , व्यवहार के बारे में बताइये ।</li>
<li>क्या जाति विहीन समाज की स्थापना स्थापना सम्भव है ? क्यों और कैसे ?</li>
</ol>
<p>    सभी टोलियों की रपट प्रस्तुत होते वक्त जाति-प्रथा के बारे में एक छवि उभर कर आ जाती है। जाति का प्रथम अहसास किसी को अपने से काफी उम्र वाले व्यक्ति द्वारा ,'बाबा प्रणाम' सुन कर हुआ था तो किसी को जाति-सूचक गाली सुनकर ।   </p>
<p>    मैंने पूर्वी उत्तर प्रदेश के वयस्कों के बीच इस खेल में पहली बार भाग लिया था । महाराष्ट्र के फुले-अम्बेडकर और समाजवादियों के सामाजिक आन्दोलन में ऐसे खेल नये नहीं हैं । उत्तर प्रदेश के समाजवादी आन्दोलन के बुजुर्ग साथियों के लिए भी यह नया अनुभव था।दरअसल पूर्वी उत्तर प्रदेश के समाजवादी 'अंग्रेजी हटाओ-भारतीय भाषा लाओ' और अलाभकर खेती पर लगान न लगाने के आन्दोलनों से जुड़े रहे हैं लेकिन जाति-प्रथा उन्मूलन और स्त्री-पुरुष समता आदि के संस्कार के लिए ऐसे कार्यक्रमों का अभाव रहा है। शायद जिस रूप में हम शोषक होते हैं,वहाँ हम शोषण नहीं देखना चाहते। महाराष्ट्र में अन्तरजातीय विवाह करने वाले जोडों के सार्वजनिक सम्मान भी आयोजित होते हैं।</p>
<p>    ऐसे ही नर-नारी समता और साझा संस्कृति को समझने के लिए होने वाले खेल भी 'समता संस्कार शिबिरों' में काफी लोकप्रिय होते है। दूसरे धर्म के बारे में क्या जानते हैं? इस सवाल के जवाब में प्राय: सभी की स्थिति <a href="http://dhurvirodhi.wordpress.com/2007/04/21/fulatti-bazar/">धुरविरोधी</a> के चिट्ठे पर अविनाश द्वारा बतायी गयी  अपनी हालत(islaam ko nahi jaanta) जैसी होती है ।</p>
<h2></h2>
<h2><font face="Verdana">गैर जवाबदेह चुनाव आयोग</font></h2>
<p>    संजय के एक अन्य खेल  में पहला सवाल राज्य-व्यवस्था के बारे में होता है। संक्षिप्त चर्चा के बाद ही इस नतीजे पर लोग पहुँचते है कि अन्य व्यवस्थाओं से मौजूदा लोकतंत्र बेहतर है। बहुदलीय लोकतंत्र की अहमियत समझ लेने के बाद राजनीति की अहमियत समझना आसान हो जाता है ।</p>
<p>    आज चुनाव व्यवस्था की एक गम्भीर कमी की ओर ध्यान खींच रहा हूँ । चुनाव-संचालन की संवैधानिक जिम्मेदारी भारत के निर्वाचन आयोग की है और स्थानीय प्रशासन की मदद से आयोग इसे सम्पन्न करता है । आयोग के द्वारा राजनैतिक दलों पर अंकुश रखने ,नकेल कसने और सख्ती की खबरें चुनाव के दिनों में सुर्खियों में रहती हैं । कई चुनाव आयुक्त तो राजनैतिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध दिए गए बयानों से आकर्षण का केन्द्र भी बन जाते हैं । उसी उत्साह में टी.एन. शेषन सिर्फ शिव सेना के समर्थन से राष्ट्रपति का चुनाव लड़ गये थे ।</p>
<p>    राजनीति के भ्रष्टाचार से आक्रान्त जनता चुनाव आयोग की खामियों पर गौर नहीं करती । अलबत्ता इन कमियों का शिकार जरूर हो जाती है । भारतीय प्रशासन-तंत्र में जवाबदेही का घोर अभाव है और चुनाव आयोग इससे परे नहीं है । ब्रिटिश शासन में यह जरूरी था कि उपनिवेशों की प्रजा छोटे से छोटे सरकारी मुलाजिम का साबका पड़ने पर अपने मौलिक अधिकारों को भूल कर दबा हुआ-सा रहे । क्या आजादी मिलने के ६० वर्षों के बाद एक लेखपाल(पटवारी) या सिपाही के समक्ष आम किसान दब कर नहीं रहता ?</p>
<p>    मतदाता सूची में भारी गड़बडियों का अन्दाज पिछले लोकसभा चुनाव में एक एक क्षेत्र में हजारों लोगों के नाम गायब होने के बाद लग गया था। कई लोग जिनके पास भारत के चुनाव आयोग द्वारा जारी फोटो पहचान पत्र था लेकिन सूची में नाम न होने की वजह से मताधिकार से वे वंचित रहे । अखबार और टे.वि. चैनलों पर इन लाचार लोगों के चेहरे दिखा दिये जाते हैं , बस । लोकसभा चुनाव के बाद कई समूहों ने आयोग से इसकी शिकायत भी की थी। आयोग के निर्देश पर मतदाता सूची के पुनरीक्षण का काम प्राथमिक शालाओं के शिक्षकों के बदले डाकियों के से करवाया गया ताकि पतों की पुष्टि आसानी से हो जाये। मौजूदा चुनाव अधिसूचना जारी होने के दो दिन पहले तक वाराणसी में पहचान पत्र हेतु फोटो खींचने का काम चलता रहा( बनारस में ११ अप्रैल तक) लेकिन हजारों लोग जिन्होंने डाकियों को नाम जोड़ने या सुधारने के लिए फार्म६ दिये थे और पोस्ट-मास्टरों के दस्तखत और मुहर सहित उसकी पावती संभाल कर रखी थी उनके नाम फिर गायब थे । मतदान से वे फिर वंचित रहेंगे। बड़े दल इसे मुद्दा नहीं बनायेंगे चूंकि जिनके नाम हैं उनसे भी चुनाव तो सम्पन्न होगा ही। प्रशासन तंत्र पर चुनाव आयोग इस भारी त्रुटि के लिए कोई कदम नहीं उठायेगी।</p>
<p>    कई साल पहले हजारों की संख्या में फोटो पहचान पत्र गंगा किनारे फेंके पड़े मिले थे। इस बार यह निर्देश था कि फोटो पहचान पत्र देते वक्त मतदाता के दस्तखत लिये जाएं तो स्थानीय अखबारों में खबर थी की बड़ी संख्या में प्रारूप ६ जला दिये गये हैं ।</p>
<p>    मेरे पास ऐसे मतदाताओं के प्रारूप ६ की पावतियाँ और पहचान पत्र हैं जिनके नाम पुन: सूची से गायब हैं। आयोग के उपायुक्त को अधिसूचना जारी होने के पहले लिखा भी है लेकिन स्थानीय प्रशासन की इस गैरजिम्मेदारी पर आयोग की ओर से किसी कदम की उम्मीद मुझे नहीं है। अधिसूचना जारी होने के बाद अदालत भी हस्तक्षेप नहीं करती है। लोकतंत्र को कमजोर करने में नौकरशाही की भूमिका और आयोग की उनसे मिलीभगत की इस मिसाल के कारण एक-एक विधान-सभा क्षेत्र में हजारों लोग मताधिकार से वंचित रहेंगे। आप की सलाह आमंत्रित है ।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पूर्वी उत्तर प्रदेश में चुनावी राजनीति में आई गिरावट]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/04/16/%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a5%80-%e0%a4%89%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%9a/</link>
<pubDate>Mon, 16 Apr 2007 13:47:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
<guid>http://samatavadi.wordpress.com/2007/04/16/%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a5%80-%e0%a4%89%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%9a/</guid>
<description><![CDATA[Technorati tags: assembly elections, eastern uttar pradesh
    उत्तर प्रदेश]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/assembly%20elections">assembly elections</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/eastern%20uttar%20pradesh">eastern uttar pradesh</a></p>
<p align="left">    उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनावों के आखिरी दो चरणों में पूर्वी उत्तर प्रदेश में चुनाव होंगे । अन्तिम चरण में होने वाले चुनावों में दो सीटों ( सीयर,जि. बलिया और कौड़ीराम,जि. गोरखपुर में क्रमश: <strong>साथी नवमी यादव</strong> और <strong>साथी दीपक पाण्डे</strong> ) पर <strong>समाजवादी जनपरिषद</strong> भी चुनाव मैदान में है । हमने इन चुनावों की बाबत अपनी घोषणा जनता के समक्ष की है, और <a href="http://samatavadi.wordpress.com/2007/04/06/assembly-electionssamajwadi-janaparishad/">चिट्ठे</a> पर भी ।</p>
<p align="left">    बहरहाल , आज की प्रविष्टि में मुख्यधारा के दलों में जो परिवर्तन ( नकारात्मक ) मुझे चर्चा के लायक लग रहे हैं उन्हें पेश कर रहा हूँ । प्रदेश की विधान सभा में चुनाव- पूर्व समझौते के साथ पूर्ण बहुमत अन्तिम बार १९९३ में आया था । राम-मन्दिर आन्दोलन को चरम पर ( बाबरी मस्जिद को गिराने के बाद)  पहुँचा चुकी भाजपा तीसरे नम्बर की पार्टी बन गयी थी और तब से अब तक उसका यही स्थान रहा है । जनता के बीच उस चुनाव में "मिले मुलायम - कांशीराम,हवा हो गए 'जै श्री राम' " नारा लोकप्रिय हुआ था । यह एक स्वाभाविक गठबन्धन था जिसमें भारतीय समाज के साम्प्रदायिकता-विरोधी तबकों- पिछड़ों और दलितों की एकता ने साम्प्रदायिक और ब्राह्मणवादी शक्ति को आसानी से शिकस्त दी थी। हिन्दू राष्ट्र का सामाजिक ढाँचा वर्णाधारित होगा इस तथ्य के कारण दबायी गयी जातियों ने भाजपा का साथ नहीं दिया था । बाद के चुनावों में भी अलग - अलग चुनाव लड़ने के बावजूद पहले और दूसरे स्थान पर यह दोनों दल ही रहे हैं। मौजूदा विधान सभा चुनाव में भी पहला और दूसरा स्थान बसपा या सपा में कौन पायेगा यह कहना कठिन है लेकिन भाजपा का तीसरा स्थान ज्यादा भरोसे के साथ कहा जा सकता है ।</p>
<p align="left">    १९९३ में राजनीति में जो गठबन्धन हुआ था उसके अनुरूप समाज के स्तर पर ऐसे कार्यक्रम नहीं चलाये गये जिनसे पिछड़ों और दलितों में देश बनाने के लिए आपसी एकता बने । फिर भी उस चुनाव में जीत कर आने वाले उम्मीदवारों में साइकिल-मिस्त्री , खेत-मजदूर और बुनकर जैसे तबकों के प्रतिनिधि अच्छी संख्या में थे। <strong>इन चौदह वर्षों में मुख्यधारा की राजनीति में आई जो गिरावट मुझ जैसे राजनैतिक कार्यकर्ता को सब से अधिक अखरती है- वह है ऐसे जमीनी कार्यकर्ताओं का चुनाव मैदान से लोप ।</strong> बहुजन समाज पार्टी में बिना विपुल राशि दिये टिकट पाना नामुमकिन हो गया है।विपुल राशी देने वाले ऐसे व्यक्ति जो राजनीति में थे ही नहीं और नवधनाढ्य तबकों के हैं अचानक चुनाव मैदान में हैं । पूर्वांचल से मुम्बई जा कर सफल व्यवसायी , बिल्डर या ठेकेदार बने लोग चुनाव लड़ने का टिकट खरीद कर आ डटे हैं । </p>
<p align="left">      'संसोपा ने बाँधी गाँठ , पिछड़ा पावे सौ में साठ' के हिसाब से उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति में कर्पूरी , मुलायम सिंह,बेनीप्रसाद वर्मा, रामविलास पासवान,लालू प्रसाद और नीतीश कुमार जैसे कार्यकर्ता नेता बने । समाज के पिछड़े-दलित तबकों में आई चेतना का नतीजा है कि अब इन दो प्रमुख राज्यों में मुख्य मन्त्री पद के दावेदार और उनके विकल्प भी इन्हीं तबकों से होते हैं ।मायावती ,मुलायम सिंह और कल्याण सिंह प्रदेश के तीन प्रमुख दलों के मुख्य मन्त्री पद के प्रत्याशी हैं।</p>
<p align="left">    पिछड़ी जातियों में संख्या के लिहाज से कुछ बड़ी जातियों के अलावा सैंकड़ों अति-पिछड़ी जातियाँ हैं । 'सामाजिक न्याय' के लक्ष्यविहीन दौर में इस चुनाव में ५-६ जाति-आधारित दल चुनाव लड़ रहे हैं और मायावती के सर्वजन-समाज के नारे से प्रेरित हो इन दलों ने भी सवर्णों को टिकट बेचे हैं ।  ऐसे ही एक दल  के एक उम्मीदवार ने अपनी जाति(दल वाली जाति का नहीं) का एक सम्मेलन बलिया में आयोजित किया । सम्मेलन में आये सभी प्रतिनिधियों को एक-एक तलवार और पीला साफा दिया गया ।इसका परिणाम हुआ कि अगले दिन से दल की जाति के कार्यकर्ताओं ने कार्यालय में आना बन्द कर दिया । इन दलों के नेताओं ने सभी बड़े दलों से सौदेबाजी के काफी प्रयास किये लेकिन सफलता नहीं मिली।</p>
<p align="left">    जब दलित-पिछड़े और महिला नेतृत्व को राजनीति में आगे लाने, उन्हें चुनावों में ज्यादा संख्या में लड़ाने की बात होती थी तब उसके साथ यह भी निहित रहता था कि दल से जुड़े सवर्णों को खाद बनने की तैय्यारी रखनी होगी। बीज और खाद का सम्बन्ध बिगड़ चुका है।</p>
<p align="left">    मेरे दल के प्रान्तीय महामन्त्री साथी जयप्रकाश सिंह के पास <strong>'ठाकुर अमर सिंह'</strong> का एक पत्र आया है ।ऐसे पत्र हजारों लोगों को भेजे गये होंगे,अन्दाज है। मँहगे-चिकने लेटर-पैड की पृष्टभूमि में दो तलवारें और ढाल भी बनी हुई है।ऊपर बोल्ड अक्षरों में जो नाम है वह उक्त पैड से उद्धृत है।</p>
<p align="left">    भारतीय जनता पार्टी ने अपना दल ,जद(यू) से समझौता किया है और अपना दल के अध्यक्ष ही बनारस के कोलसला क्षेत्र से भाजपा के विरुद्ध चुनाव लड़ रहे हैं ।</p>
<p align="left">    उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के बारे में पूर्वी उत्तर प्रदेश की बोली में कहा जाए ' मूस मोटायी , लोढ़ा होई' तो वह कहावत भी सही ठहरेगी या नहीं इस पर भी विद्वानों में मतभेद होगा।</p>
<p align="left">      बेनीप्रसाद वर्मा जैसे अनुभवी नेता ऐन चुनाव के पहले सपा से अलग हुए हैं और बहराइच , बाराबंकी आदि की सीटों पर आरिफ़ मोहम्मद खान का साथ ले कर चुनाव लड़ रहे हैं। बनारस में रहने वाले इनके एक निकट राजनैतिक कार्यकर्ता ने कहा,' नेताजी ने यह काम पाँच साल पहले किया होता तो आज मुख्य मन्त्री के दावेदारों में से होते'। बहरहाल बेनी बाबू चुनाव के बाद केन्द्र में मन्त्री बनने की आशा जरूर ले कर चल रहे होंगे क्योंकि वे सोनिया गाँधी के दरबार में मत्था जरूर टेक आये हैं ।</p>
<p align="left">    महाराष्ट्र के किसान नेता शरद जोशी वैश्वीकरण की नीतियों के स्मर्थक हैं और राजग खेमे में हैं । उत्तर प्रदेश के किसान नेता चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत जो अपने संगठन भारतीय किसान यूनियन नाम के साथ <strong>( अराजनैतिक) </strong>जोड़ते हैं अपने बेटे की एक सीट के बदले कांग्रेस से समझौता कर चुके हैं ।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विधानसभा में विपक्ष में बैठेंगे, हम]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/04/06/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b8%e0%a4%ad%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ac/</link>
<pubDate>Fri, 06 Apr 2007 07:32:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
<guid>http://samatavadi.wordpress.com/2007/04/06/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b8%e0%a4%ad%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ac/</guid>
<description><![CDATA[Technorati tags: samajwadi janaparishad, assembly elections
उत्तर प्रदेश व]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/samajwadi%20janaparishad">samajwadi janaparishad</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/assembly%20elections">assembly elections</a></p>
<p align="left">उत्तर प्रदेश विधानसभा का यह चुनाव एक ऐसे समय में हो रहा है जब वैश्वीकरण की शक्तियों के आगे राजनीति घुटने टेक रही है । राज्य सत्ता का दायरा छोटा हो रहा है , उसके साधन और शक्तियाँ घट रही हैं , राजनैतिक संगठनों की विश्वसनीयता घट रही है । राजनैतिक आन्दोलन की आभा और आकांक्षा कम होती जा रही है । आम जनता अपने हाथों से अपनी नियति का निर्माण कर सकती है - यह विश्वास टूटता जा रहा है ।</p>
<p align="left">बेलगाम पूँजीवाद पर नकेल डालने की बात दो दूर <strong>सपा-सरकार ने देश के नामी-बदनाम पूँजीपतियों को विकास-परिषद में औपचारिक ओहदा दिया है ।</strong> इस विकास-परिषद से जुड़े  सपा-प्रेमी उद्योगपतियों द्वारा प्रदेश में रोजगार सृजन न कर कई स्थानों पर सरकार की मदद से किसानों की जमीनें हड़प ली हैं । नवधनाढ्यों के लिए शहर बनाए जा रहे हैं,इन जमीनों पर ।</p>
<p align="left">पिछले तीन चुनावों से प्रदेश की जनता किसी राजनैतिक दल को स्पष्ट बहुमत देने लायक नहीं मान रही है । एक बार राष्ट्रपति शासन के छ: माह बीत जाने के बाद <strong>तीन प्रमुख विपक्षी दलों को तोड़ कर तथा शराब-सिंडीकेट और माफ़िआ निर्दलीय विधायकों को मन्त्री पद के लोभ से जोड़ कर कल्याण सिंह ने सरकार बनायी थी । नैतिकता और शुचिता के भाजपा के दावे का खोखलापन बेपर्दा हुआ था ।तब से अब तक की सभी सरकारों में इन यह २०-२५ विधायक मन्त्री रहे हैं ।</strong> मुख्यधारा के सभी दल इस परिघटना को मुद्दा नहीं बनाते , चूँकि चुनाव उन्हें भी यह हथकण्दा अपनाना पड़ सकता है । ' सरकार चाहे जिसकी बने, हम मन्त्री बनेंगे'- ऐसे निर्दलीय भी दावा ठोक रहे हैं । <strong>समाजवादी जनपरिषद विधानसभा में विपक्ष में बैठने की घोषणा के साथ चुनाव लड़ रही है ।</strong></p>
<p align="left">यह मात्र संयोग नहीं है कि राज्य सत्ता का दायरा इतिहास के उस दौर में सिमट रहा है जब पिछड़े , दलित और आदिवासी समाज का रजनीतिकरण हो रहा है । आर्थिक नीतियों से इन तबकों पर पड़ रही मार को मुद्दा न बना कर , सामाजिक न्याय के पक्षधर शक्तियाँ जातिगत दल और जाति-सम्मेलन आयोजित करवा रही हैं । जनता की समस्याओं के लिए संघर्ष करने के बजाय जाति के नाम पर वोट लेने का आसान तरीका चुन लिया गया है । दरअसल जातिविहीन समाज बनाने का आदर्श उनके 'सामाजिक न्याय' के आड़े आता है । <strong>बहुजन समाज पार्टी ने आज तक अपनी आर्थिक नीति घोषित नहीं की है ।</strong></p>
<p align="left">विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने का कानून संसद में बिना विरोध पास हुआ था। राष्ट्रवादी होने का दावा करने वाली भाजपा खेमे के लोगों का प्रशिक्षण ऐसा हुआ है कि <strong>वे राष्ट्रवाद और साम्प्रदायिकता में फर्क नही कर पात उनकी साम्प्रदायिक भावना ज्यादा प्रबल है और दबाव पड़ने पर उनका राष्ट्रवाद दब जाता है।</strong> कम्युनिस्टों से वक्र-बेवक्त अभय प्राप्त करने वाली सपा नन्दीग्राम में सेज्विरोधी किसानों की हत्या  पर चुप हो जाती है। <strong>जन विरोधी आर्थिक नीतियों की प्रणेता कांग्रेस हांलाकि उत्तर प्रदेश में अप्रासंगिक हो चुकी है परन्तु यह जरूरी है कि उसे कमजोर किया जाय ।</strong></p>
<p align="left">&#160;</p>
<p align="left"><strong><u>समाजवादी जनपरिषद मानती है कि उत्तर प्रदेश के सही विकास के लिए :</u></strong></p>
<ol>
<li>
<p align="left"> शहरीकरण और बड़े उद्योगों के बजाय गाँव, छोटे उद्योग व हस्तशिल्प व खेती के विकास पर ज्यादा ध्यान देना होगा । गाँव और खेती को देश के विकास के केन्द्र में रखना होगा और उसकी खुशहाली को सर्वोच्च प्राथमिकता देना होगा । <strong>खेत बचेगा तो देश बचेगा । </strong>जो खेती अभी घाटे का धन्धा और कर्ज का जाल है , उसे लाभकारी बना कर गाँव की समृद्धि का आधार बनाना होगा ।बढ़ती लागत और उपज के कम दामों के बीच किसान पिस रहा है । विश्वव्यापार संगठन के हुक्म से आयातों से प्रतिबन्ध हटाने, आयात शुल्क कम करने और अंतर्राष्ट्रीय बाजार खुला कर देने से कृषि उपज के दाम या तो गिर रहे हैं या उस अनुपात में बढ़ नहीं रहे हैं । किसानों को इस हालत में ला खड़ा करने के लिए केन्द्र व प्रदेश सरकार तथा मुख्यधारा के दल दोषी हैं ।</p>
</li>
<li>
<p align="left">भारी मशीनों तथा भारी पूँजी वाली तकनालाजी के स्थान पर <strong>श्रम-प्रधान व स्थानीय संसाधनों व हुनर पर आधारित उद्योग धन्धों अपनाने चाहिए ।</strong> बड़ी परियोजनाओं की जगह छोटी योजनाओं को ही प्राथमिकता देना होगा ।</p>
</li>
<li>
<p align="left"><strong>शान-शौकत , विलासिता और मंहगे उपभोक्ता सामानों के बजाय</strong> आम लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने पर जोर देना चाहिए । भोजन , आवास , पेयजल ,सिंचाई , शिक्षा और इलाज की उचित एवं न्यूनतम व्यवस्था हर नागरिक के लिए होनी चाहिए ।</p>
</li>
<li>
<p align="left">विदेशी कर्ज , विदेशी पूँजी , विदेशी तकनीक तथा विदेशी कम्पनियों से मुक्ति पा कर <strong>देश को स्वावलम्बी बनाना होगा</strong> ।</p>
</li>
<li>
<p align="left"><strong>जल-जंगल-जमीन</strong> व अन्य प्राकृतिक संसाधनों का <strong>प्रबन्धन स्थानीय लोगों को</strong> देना होगा और उनकी जरूरतों को प्राथमिकता देनी होगी ।</p>
</li>
<li>
<p align="left">पंचायत-राज और स्थानीय निकायों के कानून व अन्य नियम कम से कम और इतने सरल और छोटे बनाये जाँए कि नौकरशाही अपने दाँव-पेंच न चला सके । इन निकायों के स्वयं के आय के पर्याप्त स्रोत हों और वे स्वावलम्बी हों ।</p>
</li>
</ol>
<h4>समाजवादी जनपरिषद की मान्यता है कि प्रदेश की राजनीति में कोई भी नया मोर्चा तभी सार्थक हो पायेगा जब वैश्वीकरण के शिकंजे से देश को मुक्त कराने का ठोस प्रस्ताव रखेगा तथा सार्वजनिक जीवन में नैतिकता के मानदण्डों को स्थापित करने के लिए आचार संहिता बनाकर सब से पहले अपने ऊपर लागू करेगा ।</h4>
<h4>देश के समक्ष आसन्न खतरों का मुकाबला करने के लिए एक वैकल्पिक राजनैतिक खेमा बनाना   ऐतिहासिक जरूरत है । समाजवादी जनपरिषद इस दिशा में कोशिश कर रही है । सफलता तब मिलेगी जब देश के जागरूक नागरिक प्रचलित राजनीति की निन्दा के साथ-साथ बेहतर राजनीति का सम्र्थन भी करेंगे। प्रदेश के नागरिको से अपील करते हैं कि वैकल्पिक राजनीति खड़ा करने के हमारे प्रयासों को समर्थन दें , सफल बनायें ।</h4>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नन्दीग्राम की शहादत से उठे बुनियादी सवाल]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/03/23/%e0%a4%a8%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b6%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%a4-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%89%e0%a4%a0/</link>
<pubDate>Fri, 23 Mar 2007 10:22:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
<guid>http://samatavadi.wordpress.com/2007/03/23/%e0%a4%a8%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b6%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%a4-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%89%e0%a4%a0/</guid>
<description><![CDATA[Technorati tags: sez, nandigram, sjp
    [इन्डोनेशिया के साले]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/sez">sez</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/nandigram">nandigram</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/sjp">sjp</a></p>
<p align="left">    [इन्डोनेशिया के सालेम ग्रुप द्वारा नन्दीग्राम में विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने की योजना का क्षेत्रीय किसान और बटाईदार विरोध कर रहे हैं।नन्दीग्राम का विधान-सभा में प्रतिनिधित्व भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का है।बंगाल में पंचायती राज में दलीय आधार पर चुनाव लड़ा जाता है और नन्दीग्राम के प्रखण्ड स्तर के प्रतिनिधियों में(वार्ड सदस्य,ग्राम-प्रधान,ब्लॉक समिति व जिला परिषद सदस्य) मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का ही बोलबाला है।किसानों द्वारा विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाये जाने के विरोध में जो संघर्ष समिति बनी है उस में  माकपा समर्थक किसान और बटाईदार अच्छी तादाद में हैं ।बुद्धदेब दासगुप्त कहते हैं कि वे आने वाली पूँजी का रंग नहीं देखेंगे। यह दान की बछिया वाला भाव उन्होंने तब प्रकट किया जब यह ध्यान दिलाया गया कि सालेम कम्पनी के हाथ इन्डोनेशिया में कम्युनिस्टों के कत्ल के ख़ून से रंगे हैं। सांसदों के वेतन-भत्ते बढ़ाने के प्रस्तावों पर सांसदों में जितनी एकता हो जाती है उतनी एकजुटता के साथ विशेष आर्थिक क्षेत्र कानून संसद में मंजूर हुआ था ।ऐसे में नदीग्राम में बहे किसानो-मजदूरों के खून से जो बुनियादी सवाल उठने चाहिए उन्हें यहाँ दिया जा रहा है ।शहीद किसानों के संघर्ष की बुनियाद में जो मसायल हैं,उन्हें नजरांदाज करना अन्याय होगा।समाजवादी जनपरिषद के १६-१८ मार्च को बरगढ़ , उड़ीसा में हुए राष्ट्रीय सम्मेलन में पारित आर्थिक प्रस्ताव के नीचे लिखे अंश इन सवालों को उठाते हैं ।]</p>
<p align="left">    सरकार की देशविरोधी , जनविरोधी , दिवालिया नीतियों का सबसे बड़ा उदाहरण पिछले समय विशेष आर्थिक क्षेत्रों के रूप में सामने आया है । अभी तक सरकार २६७ विशेष आर्थिक क्षेत्रों को मंजूरी दे चुकी है । इन क्षेत्रों को विकसित करने वाली कम्पनियों और इनके अन्दर लगने वाली इकाइयों को लगभग सारे करों व शुल्कों से छूट होगी । इन्हें कम्पनियों के लिए करमुक्त स्वर्ग कहा जा सकता है । इसलिए देश में विशेष आर्थिक क्षेत्र स्थापित करने की होड़ व लूट मची है ।ज्यादातर विशेष आर्थिक क्षेत्र महानगरों के आसपास पहले से विकसित इलाकों में ही लग रहे हैं । राज्य सरकारें इसमें पूरा सहयोग कर रही हैं और सस्ती दरों पर जमीन अधिग्रहीत करके कम्पनियों को दे रही हैं । जमीन-जायदाद और निर्माण का धन्धा करने वाली बहुत-सी कम्पनियाँ भी इसमें कूद पड़ी हैं । जमीन के विशाल घोटाले भी इस खेल में हो रहे हैं ।</p>
<p align="left">    निर्यात और विदेशी पूँजीनिवेश बढ़ाने के नाम पर शुरु किए गए इन विशेष आर्थिक क्षेत्रों से देश का विकास और औद्योगीकरण नहीं होगा , बल्कि औद्योगिक विनाश होगा । विशेष आर्थिक क्षेत्रों के बाहर की औद्योगिक इकाइयों को करों में छूट नहीं होने से वे प्रतिस्पर्धा में नहीं टिक पायेंगी और या तो बन्द हो जायेंगी या विशेष आर्थिक क्षेत्रों में स्थानान्तरित हो जायेंगी । नतीजा यह होगा कि विशेष आर्थिक क्षेत्रों में तो प्रगति और समृद्धि दिखायी देगी , लेकिन बाकी विशाल देश में मक्खियाँ उड़ेंगी । क्षेत्रीय असंतुलन तेजी से और बढ़ेगा। पहले पिछड़े इलाकों में उद्योगों को रियायतें , मदद व प्रोत्साहन देने की सरकार की नीति होती थी। अब ठीक उल्टी दिशा में सरकार जा रही है ।</p>
<p align="left">    विशेष आर्थिक क्षेत्रों, कई हिस्सों में बड़े कारखानों और नई खदानों से एक बड़ा सवाल देश में खड़ा हो गया है, वह है जमीन का सवाल। बहुत तेजी से खेती , चरागाह तथा जंगल की भूमि इन कम्पनियों को जा रही है , विस्थापन की बाढ़ आ गयी है तथा कई जगह विरोध में प्रबल आन्दोलन भी खड़े हो गये हैं । सवाल सिर्फ किसानों को पर्याप्त मुआवजे एवं पुनर्वास का नहीं है वह तो होना ही चाहिए । सवाल यह भी नहीं कि ये क्षेत्र एवं कारखाने , उपजाऊ या दो-फसली भूमि पर नही बनाए जाएँ , क्योंकि तब पिछड़े पठारी व आदिवासी इलाकों में विस्थापन सही मान लिए जाएंगे । सवाल यह है कि जो जमीन इस देश में करोड़ों ग्रामीण परिवारों की एकमात्र सम्पत्ति और सहारा है , वह बहुत तेजी से देशी-विदेशी कम्पनियों और बड़े पूँजीपतियों के पास जा रही है । इस मामले में भी देश को पीछे ले जाया जा रहा है। जमींदारी उन्मूलन और भूमि हदबन्दी कानून इस देश के आजादी आन्दोलन की महत्वपूर्ण विरासत थी । अब एक नए किस्म की जमींदारी देश में कायम हो रही है । रिलायन्स(या अम्बानी) आज इस देश में बहुमूल्य जमीन का सबसे बड़ा मालिक व जमींदार बन गया है ।</p>
<p align="left">    सवाल यह भी है कि बड़े पैमाने पर जमीन को खेती से हटा लिए जाने पर हमारे कृषि उत्पादन और खाद्य-सुरक्षा का क्या होगा ? यह भी तथ्य सामने आ रहा है कि आधुनिक औद्योगीकरण और आधुनिक सभ्यता की प्राकृतिक संसाधनों की भूख जबरदस्त है, जिससे नए-नए संकट खड़े हो रहे हैं । जल-जंगल-खनिज का इतना बड़ा शोषण , दोहन एवं विनाश इस आधुनिक विकास में निहित है , यह अनुभव और अहसास आज बहुत स्पष्ट रूप से हो रहा है ।</p>
<p align="left">    कलिंगनगर , दादरी , सिंगुर और नन्दीग्राम के संघर्षों और विवादों ने यह जाहिर कर दिया है कि देश की सारी प्रमुख पार्टियों और सरकारों की नीतियाँ और सोच एक ही हैं, एवं तथाकथित वामपंथ ने भी आज पूरी तरह पलटी खा ली है । जो कम्युनिस्ट कल तक हर मामले में कारण-अकारण टाटा-बिड़ला को गाली देते थे , उन्हीं की सरकार आज टाटा के साथ गले में हाथ डालकर खड़ी है और किसानों-मजदूरों-बटाईदारों पर लाठी-गोली चला रही है । लेकिन पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ने एक सवाल खड़ा किया है, जिसका जवाब आज के भारत को खोजना होगा । उन्होंने तथा माकपा ने कहा है कि सिर्फ खेती से सबको रोजगार नहीं दिया जा सकता और उन्नति नहीं हो सकती है । उन्होंने यह भी कहा है कि किसान जब तक किसान रहेगा , खुशहाल नहीं होगा । उन्होंने ने पूछा है कि क्या किसान का बेटा किसान ही रहेगा ? उन्हों यह भी पूछा है कि सिंगुर-नन्दीग्राम का विरोध करने वाले क्या बंगाल का औद्योगीकरण और विकास नहीं चाहते ? इस सवाल का जवाब ममता बनर्जी और नक्सलियों को भी देना होगा ।<strong> इस सवाल का जवाब साम्यवादी और पूँजीवादी दोनों विचारधाराओं में नहीं है ।</strong> <strong>यह जवाब गाँधी-लोहिया के दर्शन में ही मिलेगा ।</strong> यह सही है कि सिर्फ खेती में सबको रोजगार नहीं मिल सकता । लेकिन खेती करने वाला किसान खुशहाल क्यों नहीं हो सकता । गाँव-खेती के शोषण का अन्त क्यों नहीं हो सकता । खेती देश की अर्थव्यवस्था की एक प्रमुख और केन्द्रीय गतिविधि हो सकती है , लेकिन देश की आबादी के एक बड़े हिस्से को , ग्रामीण आबादी के भी बड़े हिस्से को , विकेन्द्रित छोटे-ग्रामीण उद्योगों लगाना होगा । इस तरह का औद्योगीकरण ही भारत जैसे देशों के लिए विकास का एकमात्र रास्ता है ।</p>
<p align="left">    कई प्रकार के प्रतिकूल प्रभाव और विकृतियाँ सामने आने के बावजूद भारत सरकार वैश्वीकरण-उदारीकरण-निजीकरण की आत्मघाती नीतियों पर आगे बढ़ती जा रही है । अर्थव्यवस्था के सारे दरवाजे विदेशी पूँजी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए खोलने के निर्णय लिए गए हैं । खुदरा व्यापार में पहले ही कई देशी कम्पनियाँ कूद चुकी हैं और शहरों में बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल आ रहे हैं । वॉल मार्ट जैसी विदेशी कम्पनियों को पूरी छूट मिलने पर यह प्रवृत्ति तेजी से बढ़ेगी । खुदरा व्यापार भारत के बेरोजगारों की आखिरी शरणस्