विनय wrote 2 months ago: बारहा पिरोये हैं कई ज़ख़्म साँस के एक ह … more →
विनय wrote 6 months ago: हम में जीतने का हौसला है ‘नज़र’ यह बा … more →
विनय wrote 6 months ago: ज़ख़्मे-जिगर भर आये, कहाँ हो तुम? बदरा सा … more →
विनय wrote 6 months ago: ख़राश ज़ख़्म बनेगी, घाव करेगी और मवाद क … more →
विनय wrote 6 months ago: दिल ख़ुद ख़ला है उसमें दूसरी ख़ला क्या … more →
विनय wrote 6 months ago: आसमाँ को आज उसका हक़ पहुँचा यह तीर जो मे … more →
विनय wrote 6 months ago: इस जानिब य उस जानिब कौन ‘नज़र’ है कौन … more →
विनय wrote 6 months ago: वह जो मेरे ज़ख़्म गिनता है तो कहता है बस … more →
विनय wrote 7 months ago: ज़हर पीकर जीने चले कच्चे-पक्के ज़ख़्म सी … more →
विनय wrote 7 months ago: ख़िज़ाँ मुस्कुराने लगी सूखे पत्ते उड़ … more →
विनय wrote 9 months ago: हम भी पागल थे ग़ैरों को अपना जानते थे रु … more →
विनय wrote 9 months ago: मक़सद है मेरे पास क्या जीने को कहाँ से ल … more →
विनय wrote 9 months ago: दिल के दाग़ सभी ज़ख़्म हुए वह ख़फ़ा हुआ हम … more →
विनय wrote 10 months ago: इम्तिहाँ मेरी मोहब्बत को मुदाम देने ह … more →
विनय wrote 1 year ago: सौंधी हुई एक खु़शबू मेरी आँखों में आकर … more →
विनय wrote 1 year ago: आज महसूस किया मैंने गर तुम्हें किसी और … more →