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ज़िन्दगी ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मैं तुम तक आ गया
ज़िन्दगी ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मैं तुम तक आ गया सरे-राह मैं अपनी मंज़िल पा गया चराग़… more »
तख़लीक़-ए-नज़र
ज़िन्दगी ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मैं तुम तक आ गया
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विनय प्रजापति wrote 1 month ago: ज़िन्दगी ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मैं तुम तक आ ग … more »
शबनमी सर्द रात है और ख़्याल तेरा
विनय प्रजापति wrote 2 months ago: शबनमी सर्द रात है और ख़्याल तेरा चाँद … more »
ज़हराब में बुझाते हैं तीर क्यूँ
विनय प्रजापति wrote 2 months ago: ज़हराब में बुझाते हैं तीर क्यूँ शिकार क … more »
हम भी पागल थे ग़ैरों को अपना जानते थे
विनय प्रजापति wrote 4 months ago: हम भी पागल थे ग़ैरों को अपना जानते थे रु … more »
सूखे हुए तिनकों को आशियाँ कहिए
— 1 comment
विनय प्रजापति wrote 4 months ago: सूखे हुए तिनकों को आशियाँ कहिए जो सबपे … more »
अब 'विनय' तेरे ग़म से ग़ाफ़िल नहीं रहा
विनय प्रजापति wrote 7 months ago: अब ‘विनय’ तेरे ग़म से ग़ाफ़िल नहीं रहा दे … more »
