विनय wrote 1 year ago: क्यों? बेशर्म क़तरा-क़तरा ज़हन नहीं ढलता क्यों? मुझे बेक़रारियों से क़रार नहीं मिलता क्यों? ढल रहा हूँ दि … more →
विनय wrote 1 year ago: उफ़! यह छाँव की उमस तौबा यह झूठे फ़साने उम्मीद की धूप रिस गयी है शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’ लेखन वर्ष: … more →
विनय wrote 1 year ago: मैं तेरे इश्क़ की छाँव में जल-जलकर कितना काला पड़ गया हूँ, आकर देख तू मुझे हुस्न की धूप का एक टुकड़ा … more →