वह दिल में एक मस्जिद है जिसमें रोज़ नमाज़ अदा करता हूँ वह मन मन्दिर की देवी है जिसकी साँझ-सवेरे पूजा करता हूँ मैं ख़तावार हूँ गुनाहे-इश्क़ का उसके दर पे रोज़ सजदे करता हूँ वह संगदिल है नरम दिल भी अपनी जान… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: वह दिल में एक मस्जिद है जिसमें रोज़ नमाज़ अदा करता हूँ वह मन मन्दिर की देवी है जिसकी साँझ-सवेरे पूजा क … more →
विनय wrote 1 year ago: तेरी जो ख़ाहिश करता हूँ क्या कोई गुनाह करता हूँ चाहे जो भी समझ ले तू मैं तुझसे प्यार करता हूँ यह उम् … more →
विनय wrote 1 year ago: ‘नज़र’ वो नज़र जो लग जाये तो तबाह कर दे अपनी पे आये तो हर इक अदू को बरबाद कर दे उसका तैशो … more →