विनय wrote 1 year ago: बिन तुम्हारे मैं क्या हूँ तुम न समझोगे आप तन्हाई की सदा हूँ तुम न समझोगे तुम्हारे ग़मे-इश्क़ में जो च … more →
विनय wrote 1 year ago: और दाँव अपनी जाँ का किसने लगाया होगा फिर इश्क़ ने फ़रहाद कोई बुलाया होगा यूँ ही नहीं बिगड़ता है कोई कि … more →
विनय wrote 2 years ago: एक बार देखा था तुझे हाथों में चिराग़ लिए चौखट पर खड़ी थी चाँद की निगाहें तुझ पर टिकी थीं सारी ज़मीं नव … more →
विनय wrote 2 years ago: एक अधूरी ख़ाहिश लिए मैं भटक रहा हूँ दर-ब-दर, सुनसान ख़ाली सड़कों पर अँधेरा ही अँधेरा है, इन अँधेरों … more →
विनय wrote 2 years ago: बहुत उदास-सी एक शाम बैठी है मेरे साथ अपने ख़ामोश लबों से कह देती है अनकही बातें दोनों बहुत देर तक बै … more →