विनय wrote 1 year ago: ख़िज़ाँ मुस्कुराने लगी सूखे पत्ते उड़ाने लगी दरख़्त की शाख़ों पर धूप की बूँदें नहीं सूरज का दरिया है … more →
विनय wrote 1 year ago: हम भी पागल थे ग़ैरों को अपना जानते थे रुसवा किये जायेंगे इस क़दर यह न जानते थे बेवफ़ा गर वह होता दर्द श … more →
विनय wrote 1 year ago: दिल के दाग़ सभी ज़ख़्म हुए वह ख़फ़ा हुआ हम ख़त्म हुए कोसूँ क्या अपनी क़िस्मत को हमें भी कुछ नये इल्म हुए … more →
विनय wrote 1 year ago: देखो ज़रा स्याह रात पे चाँद का पैबंद कितना खिल रहा है मेरे चाँद पे सितारों वाला नीला लिबास जितना खिल … more →