मेरी हर नज़र बेक़रार’ और रूह बेताब है, लबों को भी न तस्लीम एक बूँद आब है रोज़-रोज़ की मुश्किली, यही वह अज़ाब है शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’ लेखन वर्ष: २००४ … more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: मेरी हर नज़र बेक़रार’ और रूह बेताब है, लबों को भी न तस्लीम एक बूँद आब है रोज़-रोज़ की मुश्किली, यह … more →
विनय wrote 1 year ago: क्यों? बेशर्म क़तरा-क़तरा ज़हन नहीं ढलता क्यों? मुझे बेक़रारियों से क़रार नहीं मिलता क्यों? ढल रहा हूँ दि … more →