ज़हर पीकर जीने चले कच्चे-पक्के ज़ख़्म सीने चले आँसू सूखे हुए थे पलकों से बरसते हैं सितारे सारी रात चाँद को तरसते हैं एक पूरा दिन पीने चले कच्चे-पक्के ज़ख़्म सीने चले महके-महके लगते हैं गीले पलाश के पल उड… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: ज़हर पीकर जीने चले कच्चे-पक्के ज़ख़्म सीने चले आँसू सूखे हुए थे पलकों से बरसते हैं सितारे सारी रात चाँ … more →