शाम गहरी हो रही थी सुनहरा चाँद बादलों से झाँक रहा था छत पे था मैं और पुरवाई बह रही थी तेरा ख़्याल और मैं और मेरी तन्हाई थी मौसम भी आ गया था बादल भी आ गये थे जो नहीं आयी वो थी तू और बारिश मकानों की खिड… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: शाम गहरी हो रही थी सुनहरा चाँद बादलों से झाँक रहा था छत पे था मैं और पुरवाई बह रही थी तेरा ख़्याल और … more →