जितनी मै उन आँखों में थी उतनी और कहाँ जितना सुरूर उन आँखों में था उतना और कहाँ रोज़ शाम दरवाज़े पे बैठता हूँ आज वह कहाँ नक़्शए-क़दम उड़ गये धूल में आज वह कहाँ उसने शहर बदला है या घर जानिब वह कहाँ यह सीना … more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: जितनी मै उन आँखों में थी उतनी और कहाँ जितना सुरूर उन आँखों में था उतना और कहाँ रोज़ शाम दरवाज़े पे बैठ … more →