तुझ से रुख़सत की वो शाम-ए-अश्क़-अफ़्शां हाए हाए, वो उदासी वो फ़िज़ा-ए-गिरिया सामां हाए हाए, यां कफ़-ए-पा चूम लेने की भिंची सी आरज़ू, वां बगल-गीरी का शरमाया सा अरमां हाए हाए, वो मेरे होंठों पे कुछ कहने की हसर… more →
कुछ पल जगजीत सिंह के नामwrote 2 years ago: तुझ से रुख़सत की वो शाम-ए-अश्क़-अफ़्शां हाए हाए, वो उदासी वो फ़िज़ा-ए-गिरिया सामां हाए हाए, यां कफ़-ए-पा च … more →