मैं ज़हर का असर ढूँढ़ता फिरा वह शामो-सहर ढूँढ़ता फिरा जिस बाज़ार में ग़म बिकते हों उसे दिनो-दोपहर ढूँढ़ता फिरा आस एक बुझी-बुझी है दिल में मैं हर गली शरर ढूँढ़ता फिरा कोई खोदे वह यहीं दफ़्न है ‘नज़र… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: मैं ज़हर का असर ढूँढ़ता फिरा वह शामो-सहर ढूँढ़ता फिरा जिस बाज़ार में ग़म बिकते हों उसे दिनो-दोपहर ढूँढ … more →