सहने दे ग़म थोड़ा – थोड़ा जो तुमने रुख़ मोड़ा-मोड़ा जान यह जाने दे ज़रा-ज़रा रहने दे आँखों को भरा-भरा सपने सारे मेरे टूटे जो साथी तुम मुझसे रूठे मरना गर मेरा वफ़ा हो तो मेरी जान क्यों ख़फ़ा हो आना त… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: सहने दे ग़म थोड़ा – थोड़ा जो तुमने रुख़ मोड़ा-मोड़ा जान यह जाने दे ज़रा-ज़रा रहने दे आँखों को भर … more →
विनय wrote 1 year ago: यूँ तो दिल में इक ख़ला बसा रखी है हमने, लेकिन कभी-कभी सितारों के टुकड़े भी गुज़रते हैं इधर से मैंने उ … more →
विनय wrote 1 year ago: वक़्त का पहना उतार आये कुछ लम्हे मरके गुज़ार आये ख़ाबों में सही अपना तो माना दिल को मेरे अपना तो जाना … more →
विनय wrote 1 year ago: हमने तो कभी दिल की अंधी ख़ला में किसी चाँद को रोशन होते नहीं देखा शायद आतिशी इंतकाल था सितारे का शाय … more →