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	<title>vidur-niti &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/vidur-niti/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "vidur-niti"</description>
	<pubDate>Mon, 07 Jul 2008 10:15:02 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[विदुर नीति:शरीर रथ, इन्द्रियां घोडे और बुद्धि होती है सारथि]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=390</link>
<pubDate>Sat, 12 Apr 2008 05:22:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[1. मनुष्य का शरीर रथ है, बुद्धि सारथि और ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>1. मनुष्य का शरीर रथ है, बुद्धि सारथि और इंद्रियां घोड़े है। इनको सावधानी से नियंत्रण करने वाला  ही जीवन की इस यात्रा में  सुख और आनंद के साथ अपनी यात्रा पूरी कर पाता है<br />
2.  जिस तरह अप्रशिक्षित और अनियंत्रित घोड़े अपने सारथि को गिराकर हताहत कर देते है वैसे ही अपने वश में इंद्रियां को न रख पाने लोग जीवन यात्रा के बीच में ही नष्ट हो जाते हैं।<br />
3. जिनका अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण नहं रहता वह  अर्थ और अनर्थ के ज्ञान से वंचित रहकर अपने दुःख और सुख का ज्ञान नहीं कर पाते। </strong></p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>सच तो यह है अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखने की बात कहना बहुत सरल है पर करना कठिन है। आजकल देश में अनेक प्रकार की दुर्घटनाएं होती है। इसका कारण यह है कि लोगों का अपने बुद्धि रूपी सारथि को प्रशिक्षित नहीं करते। वैसे तो कहा जाता है कि जब मृत्यु आनी होती  तभी आती है पर अगर आजकल देश में सड़क हादसों की संख्या को देखें तो उनके युवाओं की मृत्यु देखकर यह भ्रम टूट जाता है। लोगों के पास वाहन आ जाता है तो अक्ल मारी जाती है। ऐसे समझते हैं कि सड़क पर बस हम ही चल रहे हैं। ऊबड़-खाबड़ सड़कों पर तेज गाड़ी चलाने की निरर्थक कोशिश कर अपनी जान गंवाना इस बात का प्रतीक है कि लोग अपनी बुद्धि से काम नहीं लेते और अपनी इंद्रियों के अनियंत्रित घोड़े को सरपट दौड़ाए जाते है।</p>
<p>अतः आजकल जिस तरह का वातावरण बन गया है उसमें तो अपने आप पर नियंत्रण रखना बहुत जरूरी है।</p>
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<title><![CDATA[विदुर नीति:धनियों में नहीं होती भोजन करने की शक्ति ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=98</link>
<pubDate>Tue, 26 Feb 2008 04:15:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१.संसार में धनियों को प्राय: भोजन करने ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.संसार में धनियों को प्राय: भोजन करने की शक्ति नहीं होती किन्तु दरिद्रों के पेट में लकडी भी पच जाती है.<br />
२.अधम पुरुषों को जीविका न होने का भय रहता है. मध्यम पुरुषों को मृत्यु का भय होता है  परन्तु उत्तम पुरुषों को अपमान से ही बहुत भय लगता है.<br />
३.यों तो मदिरा के पीने का नशा भी होता है किन्तु धन-दौलत  और एश्वर्य का नशा  तो बहुत ही बुरा है.धन-दौलत और ऐश्वर्ष का नशा जिस व्यक्ति को होता है वह बहुत जल्दी भ्रष्ट हो जाता है.<br />
४.वश में  न होने के कारण विषय में रमने वाले इन्द्रियों से यह संसार उसी भांति कष्ट पाता है, जैसे सूर्य आदि ग्रहों से नक्षत्र तिरस्कृत हो जाते हैं.<br />
५.जो जीवों को वश में करने वाले सहज पांच इन्द्रियों से जीत लिया गया उसकी आपत्तियां शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की भांति बढ़ती है.</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[विदुर नीति:जिसकी वाणी रूखी वह महादरिद्र]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=89</link>
<pubDate>Tue, 12 Feb 2008 04:03:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=89</guid>
<description><![CDATA[1.दूसरों से गाली सुनकर भी स्वयं उन्हें ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.दूसरों से गाली सुनकर भी स्वयं उन्हें गाली न दे। क्षमा करने वाले का रोका हुआ कोर्ध  ही गाली देने वाले को जला डालता है और उसके पुण्य भी ले लेता है।<br />
२.दूसरों को न तो गाली दे और न उसका अपमान करे, मित्रों से द्रोह तथा नीच स्वभाव के व्यक्ति की सेवा न करे। सदाचार से हीन एवं अभिमानी न हो। रूखी तथा रोष भरी वाणी का परित्याग करे।<br />
३.इस जगत में रूखी बातें मनुष्य के मर्मस्थान, हड्डी, ह्रदय तथा प्राणों को दग्ध करती रहती हैं इसलिए धर्मानुरागी पुर्ष जलाने वाली रूखी बातों को सदा के लिए परित्याग करें।<br />
४.जिसकी  वाणी रूखी और स्वभाव कठोर है, जो मर्म पर आघात करता और वाग्बाणों से मनुष्य को पीडा पहुंचाता है, उसे ऐसा समझना चाहिए  कि वह मनुष्यों में महादरिद्र है और वह अपने मुख में दरिद्रता अथवा मौत को बांधे हुए ढो रहा है।<br />
५.यदि दूसरा कोई इस व्यक्ति को अग्नि और सूर्य के समान दग्ध करने वाली तीखे वाग्वाणों से बहुत चोट पहुँचाए तो वह विद्वान व्यक्ति चोट खाकर अत्यंत  वेदना सहते हुए भी ऐसा समझे के वह मेरे पुण्यों को पुष्ट कर रहा है।</p>
]]></content:encoded>
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