अपने विरोधी पर शब्द प्रहार करते हुए उन्होंने कहा ‘वह बरसों जनता की सेवा में लगे हैं लोग भी अब उनके चेहरे से थके हैं नया चेहरा सामने नहीं आने देते जहां मौका मिलता वहीं अपने लिये हाथ फैला लेते हैं। हमें… more →
दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिकादीपक भारतदीप wrote 5 hours ago: इंसान के चेहरे बदल जाते हैं नहीं बदलती चाल। खून खराबा करने वाले हाथ बदल जाते हैं वही रहती तलवार और ढ … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 day ago: अपने विरोधी पर शब्द प्रहार करते हुए उन्होंने कहा ‘वह बरसों जनता की सेवा में लगे हैं लोग भी अब उनके च … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 week ago: अब यह फिल्मों का ही प्रभाव कहा जा सकता है कि रास्ते पर गाड़ी चलाने वाले लड़के लड़कियां अपने आपको नायक न … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 week ago: शाम के समय दीपक बापू अपने घर से बाहर निकल एक निकट के उद्यान में हवा खाने पहुंचे। अंदर प्रवेश करने से … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 week ago: किताबों में लिखे शब्द कभी दुनियां नहीं चलाते। इंसानी आदतें चलती अपने जज़्बातों के साथ कभी रोना कभी ह … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 week ago: गिला शिकवा खूब किया दिन भर पूरे जमाने का फिर भी दिल साफ हुआ नहीं। इतने अल्फाज मुफ्त में खर्च किये फि … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 weeks ago: वह धर्मजुद्ध से करने निकले जमाने भर की सफाई। अमन का नारा लगाते किया शोर शीतलता के लिये चहुं ओर आग लग … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: दीपावली पर घर में आले में बने मंदिर से लेकर गली के नुक्कड़ तक प्रकाश पुंज सभी ने जला दिये। अंतर्मन मे … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: सपने जैसे शहर में ख्वाब लगती उस इमारत की छत के नीचे रौशनी की चमक से आंखें चुंधिया गयी हैं फिर याद आत … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: कहो कुछ भी करो कुछ और। बन जाओगे जमाने के सिरमौर। सभी को सुनने में अच्छा लगे ऐसे शब्द अपने मुख से कहो … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: हिंदी की सेवा करने का दावा करने वाले बहुत हैं। इनके नाम भी आपने देखे होंगे। यह लोग हिंदी के नाम पर क … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: आज के बच्चे अपने माता पिता के बाल्यकाल से अधिक तीक्ष्ण बुद्धि के पाये जाते यह सच कहा जाता है। किस ना … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: अजीब लगता है धर्म विषयक उन बहसों से एक आम व्यक्ति के रूप में जुड़कर जो समय समय पर प्रचारतंत्र में सुन … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: हमने देखा था उगता सूरज उन्होने देखा डूबता हुआ वह कर रहे थे चंद्रमा की रौशनी में जश्न मनाने की तैयारी … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: दुखिया भूखा दुख कीं, सुखिया सुख कौं झूरि सदा अजंदी राम के, जिनि सुख-दुख गेल्हे दूरि संत शिरोमणि कबीर … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: नायिका ने बहुत किया अभिनय पर चलचित्रों में सफलता का दौर नहीं चल पाया। नंबर वन की दौड़ में न पहुंचने प … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: अखबार में छपी हर खबर पुरानी नहीं हो जाती है। कहीं धर्म तो कहीं भाषा और जाति के झगड़ों में फंसे इंसानी … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: लो आ गया हिन्दी दिवस नारे लगाने वाले जुट गये हैं। हिंदी गरीबों की भाषा है यह सच लगता है क्योंकि वह भ … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: परकार्यविहन्ता च दाम्भिकः स्वार्थसाधकः। छली द्वेषी मृदः क्रूरो विप्रो मार्जार उच्यते।। हिंदी में भाव … more →