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	<title>web-navabharat &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "web-navabharat"</description>
	<pubDate>Sat, 19 Jul 2008 05:19:48 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[आम पाठक की प्रतिक्रिया की बन सकती है अंतर्जाल लेखकों की प्रेरणा-संपादकीय]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/?p=159</link>
<pubDate>Sat, 12 Jul 2008 07:22:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/?p=159</guid>
<description><![CDATA[इस सप्ताह मैंने कोई ऐसा पाठ या रचना नह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>इस सप्ताह मैंने कोई ऐसा पाठ या रचना नहीं लिखी जिसकी चर्चा की जा सके। वजह यह रही कि बरसात के मौसम में विद्युत प्रवाह की समस्या और फिर शादी विवाह में जाने के कारण व्यस्तता रही।  ऐसे में कुछ कवितायें लिखी जिनको कोई अधिक हिट नहीं मिल सके। संभवतः पाठक भी ऐसी ही समस्याओं से जूझ रहे होंगे। ब्लाग जगत में मेरे लिये कोई खास सप्ताह नहीं रहा। वैसे धीरे-धीरे मन अब ऊब रहा है क्योंकि पाठक संख्या में वृद्धि अब भी नहीं  हो पा रही। पांच सौ से छह सौ के बीच कुल पाठक मेरे ब्लाग/पत्रिकाओं को देख रहे हैं और यह क्रम करीब छह माह से बना हुआ है। पिछले सप्ताह एक दिन यह आंकड़ा सात सौ के पार पहुंचता लग रहा था पर नहीं हो पाया। शायद 695 तक ही पहुंचा था। </p>
<p>बहरहाल अब उन ब्लाग पर जिन पर पहले अध्यात्म से संबंधित पाठ रखता था- अब वहां बंद कर दिये है-वहां अभी तक अध्यात्म के पाठ अधिक पाठक संख्या लेते नजर आ रहे थे अब हास्य कविताएं और व्यंग्य भी अपने लिये अधिक पाठक जुटाने में लगे हैंं। मेरे दिमाग में कई प्रकार का गंभीर चिंतन है और कुछ अलग से कागज पर भी लिखा हुआ है पर, पर वह बड़े हैं और यहां बड़ा लिखने पर लोग उसकी उपेक्षा कर देते हैं। इसलिये अपनी कहानियां, व्यंग्य और चिंतन अभी भी यहां टाईप नहीं कर रहा। एक बात तय  है कि जब तक हाथ से लिखकर यहां टाईप नहीं करूंगा तक अच्छी रचनायें नहीं आयेंगी। इसलिये आम पाठकों की तरफ से भी अब प्रयास होने चाहिये कि लेखक प्रोत्साहित हो सके। इसलिये हर पढ़ने वाले को कमेंट भी देना चाहिये और लेखक द्वारा जब उसके वास्तविक होने की पुष्टि के लिये संदेश किसी भी रूप में भेजा जाये तो उसका जवाब मिले। वरना यह मानकर चलना पड़ता है कि किसी दोस्त ने ही छद्म नाम से यह दिया है।<br />
इस सप्ताह की कुछ रचनायें यहां दे रहा हूं।<br />
<strong>दीपक भारतदीप</strong></p>
<p><strong>कुछ गूगल के हिंदी-अंग्रेजी अनुवाद टूल से भी पूछ लो-व्यंग्य</strong><br />
जो कोई नहीं कर सका वह गूगल का हिंदी अंग्रेजी टूल करा लेगा। वह काम हैं हिंदी के लेखकों से शुद्ध हिंंदी लिखवाने का। दरअसल आजकल मैं अपने वर्डप्रेस के शीर्षक हिंदी में कराने के लिये उसके पास जाता हूं। कई बार अनेक कवितायें भी ले जाता हूं। उसकी वजह यह है कि हिंदी में तो लगातार फ्लाप रहने के बाद सोचता हूं कि शायद मेरे पाठ अंग्रेजों को पसंद आयें। इसके लिये यह जरूरी है कि उनका अंग्रेजी अनुवाद साफ सुथरा होना चाहिये। अब हिट होने के लिये कुछ तो करना ही है। अब देश के अखबार नोटिस नहीं ले रहे तो हो सकता है कि विदेशी अखबारों में चर्चा हो जाये तो फिर यहां हिट होने से कौन रोक सकता है? फिर तो अपने आप लोग आयेंगे। तमाम तरह के साक्षात्कार के लिये प्रयास करेंगे। </p>
<p>इसलिये उस टूल से अनुवाद के बाद उनको मैं पढ़ता हूं पर वह अनेक ऐसे शब्दों को नकार देता है जो दूसरी भाषाओं से लिये गये होते हैं या जबरन दो हिंदी शब्द मिलाकर एक कर लिखे जाते हैं। इसका अनुवाद सही नहीं है पर जितना है वह अंग्रेजी में पढ़ने योग्य हो ही जाता है। उसकी सबसे मांग शुद्ध हिंदी है। उस दिन चिट्ठा चर्चा में एक शब्द आया था जालोपलब्ध। मैंने इसका विरोध करते हुए सुझा दिया जाललब्ध। इस टूल पर प्रमाणीकरण के लिये गया पर उसने दोनों शब्दों को उठाकर फैंक दिया और मैं मासूमों की तरह उनको टूटे कांच की तरह देखता रहा। तब मैंने जाल पर उपलब्ध शब्द प्रयोग किया तब उसने सही शब्द दिया-जैसे शाबाशी दे रहा हो। मतलब वह इसके लिये तैयार नहीं है कि तीन शब्दों को मिलाकर उसक पास अनुवाद के लिये लाया जाये। </p>
<p>इधर बहुत सारे विवाद चल रहे हैं। कोई कहता है कि हिंदी में सरल शब्द ढूंढो और कोई कहता है कि हिंदी में उर्दू शब्दों का प्रयोग बेहिचक हो। कोई कहता हैं कि उर्दू शब्दों में नुक्ता हो। कोई कहता है कि जरूरत नहीं। इन बहसों में हमारे अंतर्जाल लेखक-जिनमें मैं स्वयं भी शामिल हूं-इस बात पर विचार नहीं करते कि कुछ गूगल के हिंदी अग्रेजी टूल से भी तो पूछें कि उसे यह सब स्वीकार है कि नहीं।<br />
आप कहेंगे कि इससे हमें क्या लेना देना? भई, हिंदी में भी अंतर्जाल पर लिखकर हिट होने की बात तो अब भूल जाओ। भाई लोग, अब बाहर के लेखकों के लिये क्लर्क का काम भी करने लगे हैं। उनकी रचनायें यहां लिख कर ला रहे हैं और बताते हैं कि उन जैसा लिखो। अब इनमें कई लेखक ऐसे हैं जिनका नाम कोई नहीं जानता पर उनको ऐसे चेले चपाटे मिल गये हैं जो उनकी रचनाओं को अपने मौलिक लेखन क्षमता के अभाव में अपना नाम चलाने के लिये इस अंतर्जाल पर ला रहे हैं। सो ऐसे में एक ही चारा बचता है कि अंतर्जाल पर अंग्रेजी वाले भी हिंदी वालों को पढ़ने लगें और अगर वह प्रसिद्धि मिल जाये तो ही संभव है कि यहां भी हिट मिलने लगें। </p>
<p>मैं यह मजाक में नहीं कह रहा हूं। यह सच है कि भाषा की दीवारें ढह रहीं हैं और ऐसे में अपने लिखे के दम पर ही आगे जाने का मार्ग यही है कि हम इस तरह लिखें कि उसका अनुवाद बहुत अच्छी तरह हो सके। हालांकि मैंने प्रारंभ में कुछ पाठ वहां जाकर देखे पर फिर छोड़ दिया क्योंकि उस समय कुछ अधिक हिट आने लगे थे। अब फिर वेैसी कि वैसी ही हालत हो गयी है और अब सोच रहा हूं कि पुनः गूगल के हिंदी अंग्रजी टूल पर ही जाकर अपने पाठ देखेंे जायें वरना यहां तो पहले से ही अनजान लेखकों को यहां पढ़कर अपना माथा पीटना पड़ेगा। अखबार फिर उन लेखकों और उनको लिखने वाले ब्लाग लेखकों के नाम छापेंगे। अगर अपना नाम कहीं विदेश में चमक जायेगा तो यहां अपने आप हिट मिल जायेंगे। वैसे भी यहां हिंदी वाले अंग्रेजी की वेबसाईटें देखना चाहते है और उनके लिये हिंदी में पढ़ना एक तरह से समय खराब करना है ऐसे में हो सकता है कि जब यहां प्रचार हो जाये कि अंग्रेजी वाले भी हिंदी में लिखे पाठों को पढ़ रहे है तब हो सकता है कि उनमें रुचि जागे। यहां के लोग विदेशियों की प्रेरणा पर चलते हैं स्वयं का विवेक तो बहुत बाद में उपयोग करते हैं।</p>
<p>--------------------------<br />
<strong>चिराग की रौशनी और उम्मीद-हिंदी शायरी</strong><br />
शाम होते ही<br />
सूरज के डूबने के बाद<br />
काली घटा घिर आयी<br />
चारों तरफ अंधेरे की चादर फैलने लगी थी<br />
मन उदास था बहुत<br />
घर पहुंचते हुए<br />
छोटे चिराग ने दिया<br />
थोड़ी रौशनी देकर दिल को तसल्ली का अहसास<br />
जिंदगी से लड़ने की उम्मीद अब जगने लगी थी<br />
.........................................</p>
<p><strong>रिश्तों के कभी नाम नहीं बदलते-हिन्दी ग़ज़ल</strong></p>
<p>दुनियां में रिश्तों के तो बदलते नहीं कभी नाम<br />
ठहराव का समय आता है जब, हो जाते अनाम<br />
कुछ दिल में बसते हैं, पर कभी जुबां पर नहीं आते<br />
उनके गीत गाते हैं, जिनसे निकलता है अपना काम<br />
जो प्यार के होते हैं, उनको कभी गाकर नहीं सुनाते<br />
ख्यालों मे घूमते रहते हैं, वह तो हमेशा सुबह शाम<br />
रूह के रिश्ते हैं, वह भला लफ्जों में कब बयां होते<br />
घी के ‘दीपक’ जलाकर, दिखाने का नहीं होता काम </p>
<p><strong>अपने अंदर ढूंढे, मिलता तभी चैन है-हिंदी शायरी</strong><br />
घर भरा है समंदर की तरह<br />
दुनियां भर की चीजों से<br />
नहीं है घर मे पांव रखने की जगह<br />
फिर भी इंसान बेचैन है</p>
<p>चारों तरफ नाम फैला है<br />
जिस सम्मान को भूखा है हर कोई<br />
उनके कदमों मे पड़ा है<br />
फिर भी इंसान बेचैन है</p>
<p>लोग तरसते हैं पर<br />
उनको तो हजारों सलाम करने वाले<br />
रोज मिल जाते हैं<br />
फिर भी इंसान बेचैन है</p>
<p>दरअसल बाजार में कभी मिलता नहीं<br />
कभी कोई तोहफे में दे सकता नहीं<br />
अपने अंदर ढूंढे तभी मिलता चैन है<br />
---------------------<br />
<strong>रह जाते बस जख्मों के निशान-हिन्दी शायरी</strong></p>
<p>मोहब्बत में साथ चलते हुए<br />
सफर हो जाते आसान<br />
नहीं होता पांव में पड़े<br />
छालों के दर्द का भान<br />
पर समय भी होता है बलवान<br />
दिल के मचे तूफानों का<br />
कौन पता लगा सकता है<br />
जो वहां रखी हमदर्द की तस्वीर भी<br />
उड़ा ले जाते हैं<br />
खाली पड़ी जगह पर जवाब नहीं होते<br />
जो सवालों को दिये जायें<br />
वहां रह जाते हैं बस जख्मों के निशान<br />
.................................<br />
जब तक प्यार नहीं था<br />
उनसे हम अनजान थे<br />
जो किया तो जाना<br />
वह कई दर्द साथ लेकर आये<br />
जो अब हमारी बने पहचान थे<br />
................................</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्या प्रसिद्धि पाने का विचार बुरा है-इस पत्रिका का द्वितीय अंक]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/?p=158</link>
<pubDate>Sat, 05 Jul 2008 06:40:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/?p=158</guid>
<description><![CDATA[जब आप किसी ऐसे विषय पर लिखते हैं जिसका ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जब आप किसी ऐसे विषय पर लिखते हैं जिसका संबंध लेखकों से होता है तो उसकी प्रतिक्रिया जन सामान्य में कम होने के बावजूद अधिक प्रतिध्वनित होती है। ऐसे विषयों पर चूंकि लेखक ही अपनी प्रतिक्रिया देते हैं तो संख्या कम होने के बावजूद उनमें वजन अधिक  होता और जन सामान्य तो स्वयं प्रभावित होने के बावजूद मुखर होकर  अपनी प्रतिक्रिया नहीं देता इसलिये उसकी प्रतिध्वनि का सुनाई देती है।</p>
<p>कल मेरे द्वारा लिखे गये एक लेख<a href="http://deepakraj.wordpress.com/2008/07/04/in-hindi-urdu-words-of-caution-must-use-stories/">-जो हिंदी में उर्दू शब्दों के उपयोग को लेकर था</a>-पर प्रतिक्रियायें आयीं वह ऐसे ब्लाग लेखकों की आयी जो वाकई गंभीर लेखक हैं और इसलिये मैंने अपने अंदर उनकी प्रतिध्वनि अधिक महसूस की। ऐसी बहसें तो कई बरसों से चल रहीं हैं पर निष्कर्ष निकलना कठिन होता है पर इससे लिखने वाले अपनी भाषा पर नियंत्रण रखने का मन बनाते हैं इसलिये भाषा के मूल स्वभाव बने रहने की आशा पैदा होती है।<br />
साहित्य में ऐसी बहसें भले ही निर्णायक न हों पर वह भाषा का स्तर बनाये रखने में सहायक होती हैं पर अन्य क्षेत्रों में ऐसी बहसें केवल मुद्दे बनाये रखने के लिये होती हैं और उनका कोई निष्कर्ष इसलिये नहीं निकाला जाता क्योकि बहस करने वालों की रुचि लोगों को उसमें उलझाकर अपने हित साधने होते हें। मेरा इसी सप्ताह लिखा गया एक लेख-<a href="http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/07/04/written-on-the-subjects-of-politics-is-quickly-losing-its-influence-stories/">जिसमें मैंने राजनीतिक विषयों पर लिखने के कारण बताये थे</a>-फ्लाप हो गया। उसी तरह एक अन्य लेख-<a href="http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/07/05/the-difference-in-terms-of-great-scholars-stories/">जो मैंने ऐसे ही भेदात्मक दृष्टि वाले विद्वानों पर लिखा था</a> -उसे भी अधिक समर्थन नहीं मिला। मुझे भी लग रहा है कि वह हिट होने लायक नहीं था।<br />
मेरे एक मित्र श्री ललितमोहन त्रिवेदी ने ब्लाग लिखना शूरू किया। उस पर मैंने एक <a href="http://dpkraj.blogspot.com/2008/06/blog-post_29.html">समीक्षा लिखी</a> जिसे वाकई मैंने दिल से लिखा है।<br />
वैसे इस सप्ताह कोई बहुत जोरदार हिट पाठ नहीं आया। पुराने हिट पर ही नाम चल रहा है और अमेरिका-भारत संबंधों पर लिखा गया एक लेख अभी तक लोगों को पढ़ता हुआ देख अच्छा लग रहा है वह आज भी प्रासंगिक है यही कारण है कि मैंने अभी तक इस पर कुछ नहंी लिखा।<br />
इस बार दो व्यंग्य अच्छे लिखे पर वह भी फ्लाप रहे पर आगे पाठक उसे आम पाठक हिट बनायेंगे। एक तो था <a href="http://rajlekh.wordpress.com/2008/07/02/mud-on-the-fly-no-thought-was-sweet-will-comic-satire/">कीचड़ उछालने पर मिठाई मिलने पर</a>, दूसरा था <a href="http://deepakraj.wordpress.com/2008/06/26/it-is-satire-a-sort-of-ad-comic-satire/">व्यंग्य को विज्ञापन की तरह सजाने का</a>। इन दोनों को आगे पाठक हिट बनायेंगे इसमें कोई संशय नहीं है।<br />
कुछ कवितायें लिखीं। इनमें कुछ संजीदा थीं तो कुछ हास्य से सराबोर। थोड़े बहुत हिट लेकर मैं संतुष्ट था। आखिर मुझ जैसे लेखक को इससे अधिक हिट मिल भी कहां सकते है।<br />
कुल मिलाकर यह सप्ताह ठीक ठाक ही रहा। अब इस पत्रिका को बहुत गंभीरता से लिखने का विचार बना रहा हूं क्योंकि यहां अंतर्जाल पर मुझे कोई घास भी नहीं डाल रहा। लोग सम्मान तो देंगे नहीं, इसलिये मैंने महाकवि की उपाधि स्वयं ही धारण कर ली। इस पर लिखी कविता पर मेरे एक मित्र की टिप्पणी थी कि‘ अरे, नहीं आप अकेले नहीं। यह पदवी धारण करने वाले’। वह स्वयं भी इसमें शामिल हैं यह बात मुझे मालुम हैं पर स्वयं डरेंगे क्योंकि वह इस अंतर्जाल पर हिंदी के प्रसिद्ध ब्लाग लेखक बन चुके हैं पर हमें तो फोरमों पर अधिक लोग पढ़ते नहीं और आम पाठक कौन हमसे कहने वाला है कि आपने हमसे पूछ बगैर यह उपाधि क्यों धारण कर ली। बहुत समय तक लेखक के रूप में लिखते रहने के बाद मुझे प्रसिद्धि नहीं मिली तो हो सकता है कि संपादक  के रूप में मिल जाये। क्या प्रसिद्धि पाने का विचार कोई बुरा है? मेरे ख्याल से तो नहीं!<br />
--------------------------------------------------------------------</p>
<p><strong>अपनी कुछ कवितायें यहां प्रस्तुत कर रहा हूं<br />
दीपक भारतदीप</strong></p>
<p>बेजान पत्थरों में ढूंढते हैं आसरा<br />
फिर भी नहीं जिंदगी में मसले हल नहीं होते<br />
कोई हमसफर नहीं होता इस जिंदगी में<br />
अपने दिल की तसल्ली के लिये<br />
हमदर्दों की टोली होने का भ्रम ढोते<br />
सभी जानते हैं यह सच कि<br />
अकेले ही चलना है सभी जगह<br />
पर रिश्तों के साथ होने का<br />
जबरन दिल को अहसास करा रहे होते<br />
कहें महाकवि दीपक बापू<br />
क्यों नहीं कर लेते अपने अंदर बैठे<br />
शख्स से दोस्ती<br />
जिससे हमेशा दूर होते<br />
वह तुम ही होते</p>
<p>-----------------<br />
इश्क में भी अब आ गया है इंकलाब<br />
हसीनाएं ढूंढती है अपने लिए कोई<br />
बड़ी नौकरी वाला साहब<br />
छोटे काम वाले देखते रहते हैं<br />
बस माशुका पाने का ख्वाब</p>
<p>वह दिन गये जब<br />
बगीचों में आशिक और हसीना<br />
चले जाते थे<br />
अपने घर की छत पर ही<br />
इशारों ही इशारों में प्यार जताते थे<br />
अब तो मोबाइल और इंटरनेट चाट<br />
पर ही चलता है इश्क का काम<br />
कौन कहता है<br />
इश्क और मुश्क छिपाये नहीं छिपते<br />
मुश्क वाले तो वैसे हुए लापता<br />
इश्क हवा में उडता है अदृश्य जनाब<br />
जाकर कौन देख सकता है<br />
जब करने वाले ही नहीं देख पाते<br />
चालीस का छोकरा अटठारह की छोकरी को<br />
फंसा लेता है अपने जाल में<br />
किसी दूसरे की फोटो दिखाकर<br />
सुनाता है माशुका को दूसरे से गीत लिखाकर<br />
मोहब्बत तो बस नाम है<br />
नाम दिल का है<br />
सवाल तो बाजार से खरीदे उपहार और<br />
होटल में खाने के बिल का है<br />
बेमेल रिश्ते पर पहले माता पिता<br />
होते थे बदनाम<br />
अब तो लडकियां खुद ही फंस रही सरेआम<br />
लड़कों को तो कुछ नहीं बिगड़ता<br />
कई लड़कियों की हो गयी है जिंदगी खराब<br />
------------------------------</p>
<p>यूं तुम अपने लिये<br />
कुछ भी मांग लिया करो<br />
सिवाय प्यार के<br />
क्योंकि यह मांगने की नहीं<br />
अहसास कराने की शय है<br />
अगर होती किसी के लिये दिल में जगह कही<br />
आंखों से जाहिर हो जाता है<br />
जिनके दर्द से आंखों में आंसू आयें नहीं<br />
जिनकी खुशी पर होंठ मुस्कराये नहीं<br />
लफ्जों में चाहे कितनी भी जतायें<br />
झूठी हमदर्दी का बयां जगजाहिर हो जाता है<br />
किसी के दिल में लिखा कौन पढ़ पाया<br />
लफ्जों के मतलब गहरे हैं या उथले<br />
सुरों की धारा से पता चल जाता<br />
चाहे जितनी भी कोशिश कर लो<br />
जब तक दिल में है<br />
प्यार को सलामत समझ लो<br />
जो जुबां से निकला तो कभी कभी<br />
वहां से भी बाहर हो जाता है<br />
फिर लौटकर नहीं आता<br />
अहसास भी बदन से निकल कर<br />
बाहर बदहाल हो जाता है<br />
प्यार है वह अहसास जो बस किया जाता है<br />
........................................<br />
गीत और संगीत से<br />
दिल मिल जाते हैं पर<br />
अब तो उसकी परख के लिये<br />
प्रतियोगितायें को अब वह<br />
महायुद्ध कहकर जमकर प्रचार कराते<br />
वाद्ययंत्र हथियारों की तरह सजाये जाते<br />
जिन सुरों से खिलना चाहिये मन<br />
उससे हमले कराये जाते<br />
मद्धिम संगीत और गीत से<br />
तन्मय होने की चाहत है जिनके ख्याल में<br />
उन पर शोर के बादल बरसाये जाते</p>
<p>कहें महाकवि दीपक बापू<br />
‘अब गीत और संगीत<br />
में लयताल कहां ढूंढे<br />
बाजार में तो ताल ठोंककर बजाये जाते<br />
महफिलें तो बस नाम है<br />
श्रोता तो वहां भाड़े के स</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इस पत्रिका के पहले औपचारिक अंक का विमोचन]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/?p=157</link>
<pubDate>Sat, 28 Jun 2008 07:38:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/?p=157</guid>
<description><![CDATA[
आज से यह पत्रिका प्रत्येक शनिवार को न]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>
आज से यह पत्रिका प्रत्येक शनिवार को नियमित रूप से प्रकाशित होगी। इसका लेखन एवं संपादन  एक स्वयंसेवी प्रयास है। आज सभी जगह पत्र पत्रिकाओं के नाम पर अपने साथ पाठक जोड़कर अपनी शक्ति दिखाते हुए उसका उपयोग अपने धन संग्रह तथा सम्मान अर्जित करने के लिये प्रयास किये जा  रहे हैं। इसी कारण लोग उन पत्रिकाओं से संतुष्ट न होने की शिकायत कर रहे हैं। पहले यह प्रयास प्रकाशन जगत में हो रहा था अब यह अंतर्जाल पर भी शुरू हो गया है।  चूंकि इसका संपादक और लेखक  एक आम  आदमी और सामान्य लेखक है इसलिये इस पत्रिका को ऐसे पाठकों के लिये प्रारंभ किया जा रहा है जो एकांत में अपना अध्ययन और ंिचंतन करते हैं। </p>
<p>भारत में पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन कोई आर्थिक दृष्टि से लाभदायक नहीं है पर फिर भी अनेक लोग इस कार्य को इसलिये करते हैं क्योंकि इसकी आड़ में उनको अन्य प्रकार से आर्थिक और सामाजिक उपलब्धियां प्राप्त होतीं हैं।  इसके अलावा अधिकतर पत्र पत्रिकाओं में राजनीति, फिल्म और क्रिकेट के विषयों को ही महत्व दिया जाता है। हम अपनी इस पत्रिका में इन विषयों से परे रहेंगे और अति आवश्यक होने पर ही इनकी भी चर्चा करेंगेे। अपना पूरा ध्यान सार्थक विषयों के  अध्ययन, चिंतन और मनन पर  केंद्रित करेंगे। उच्च कोटि के साहित्य का सृजन भले ही न कर पायें पर सार्थक  लेखन का सृजन करते हुए हुए ही इस पत्रिका आगे बढ़ायेंगे।</p>
<p>इस संबंध में निवेदन है कि सुधि पाठक अपनी टिप्पणियां अपने पूरे पते के साथ रखें और अपने प्रश्न का उत्तर मिलने की पुष्टि करें। मैंने अपने अंतर्जाल पर अनुभव से यह सीखा है कि यहां मित्र और विरोधी नाम बदल बदलकर अपनी टिप्पणियां देते हैं तब यह भ्रम हो जाता है कि अधिक पाठक हैं। इसलिये मेरे द्वारा संदेश भेजे जाने के बाद पाठक उसका उत्तर दें तभी यह मान सकता हूं कि लोग इसे पढ़ रहे हैं। अर्थात मेरे साथ पाठकों को भी इस पत्रिका के विकास और स्वरूप के लिये तकलीफ उठानी होगी। हां, बेहतर बेहतर और पठनीय सामग्री का जिम्मा मैं स्वयं लेता हूं।  इस पत्रिका को चलाने का दायित्व मेरा अकेले का नहीं है और पाठकों को अपनी टिप्पणियां रखकर मुझे प्रोत्साहित करना पड़ेगा तभी इसमे नित्य औन  नया स्वरूप आ पायेगा। मेरे पास अधिक आर्थिक शक्ति नहीं है और न ही मेरे पास प्रबंध कौशल है और जो लोग चाहते हैं कि अंतर्जाल पर सार्थक पत्रिका निरंतर छपती रहे तो वह अपना सहयोग दें। इसमें मैं अपने अन्य ब्लाग/पत्रिकाओं की वह हिट रचनायें भी रखूंगा जिन पर अनेक लोगों ने अपनी टिप्पणियां रखीं है। यह पत्रिका प्रत्येक शनिवार को दोपहर के समय प्रकाशित होगी। जिन लोगों को नियमित पढ़ना है वह इस पत्रिका साइडबार में दिख रहे मेरे ब्लाग@पत्रिकाएं पढ़ सकते हैं।  प्रयास वह यही करें कि वह इसी पत्रिका से जाकर पढ़ें ताकि मुझे यह आभास होता रहे कि लोग इस पत्रिका को पढ़ रहे हैं। इसके साथ ही हम इस पत्रिका के पहले अंक को विमोचन करते हैं। जय श्री कृष्ण</p>
<p>दीपक  ‘भारतदीप’, ग्वालियर<br />
लेखक संपादक</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[यह कौनसी अक्लमंदी है-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/?p=152</link>
<pubDate>Thu, 07 Feb 2008 16:17:54 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/?p=152</guid>
<description><![CDATA[चंद पलों की खुशी की खातिर
पूरी जिन्दगी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>चंद पलों की खुशी की खातिर<br />
पूरी जिन्दगी दाव पर लगा देना<br />
भला कौनसी अक्लमंदी है<br />
सब कुछ करते हैं हम<br />
अपने नाम के लिए<br />
लेते हैं इसका और उसका नाम<br />
हम करतार नहीं है<br />
सब जानते हैं<br />
फिर भी हर पर अपना काम<br />
लिखा हो यही मानते हैं<br />
आजाद लगती हैं अक्ल<br />
पर वह तो रूढियों और रीति रिवाजों को<br />
निभाने के लिए समाज की बंदी है</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनु स्मृति: दंड का उचित उपयोग न करने वाला अपयश का भागी]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/?p=151</link>
<pubDate>Wed, 30 Jan 2008 14:38:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/?p=151</guid>
<description><![CDATA[१. जो व्यक्ति ऐसे लोगों को दंड देता है ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१. जो व्यक्ति ऐसे लोगों को दंड देता है जिन्हें दंड नहीं देना चाहिए  तथा जिनको देना चाहिऐ उनको नहीं देता उसे जगत में बहुत अपयश मिलता है और मरने के बाद वह नरक भोगता है.<br />
२.सबसे पहले अपराध करने को समझाना चाहिऐ, जब उसका प्रभाव न पड़े तब उसकी भर्त्सना करनी चाहिए. जब इससे  भी वह न समझे तो उस पर अर्थ दंड लगाना चाहिए, जब इसका भी अनुकूल प्रभाव नहीं पड़े तो उसे शारीरिक दंड देना चाहिऐ. उसके बाद भी प्रभाव न पड़े तो चारों डंडों का प्रयोग करना चाहिए.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अंतर्जाल पर सम्मान-हिन्दी हास्य कविता ]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/?p=150</link>
<pubDate>Mon, 28 Jan 2008 15:31:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/?p=150</guid>
<description><![CDATA[बहुत शोर सुनते थे
कोई तरकश चलता
ब्लोग ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत शोर सुनते थे<br />
कोई तरकश चलता<br />
ब्लोग जगत में सजा रहा है<br />
किसी सम्मान की दुकान<br />
देखा तो निकले दस तीर<br />
निकले उसमें थे दस वीर<br />
दावा यह किया कि बस<br />
यही लिखते हैं अंतर्जाल पर अच्छा<br />
बाकी   पेश करते हैं कच्चा<br />
बस इनका ब्लोग ही हमें<br />
ब्लोग की तरह हमेशा फबता  </p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
चल पडी हैं हिन्दी ब्लोग में<br />
एक और दुकान<br />
अंतर्जाल पर आयी है हिन्दी तो<br />
साथ लाई है साहित्य से वैसे  लोग भी<br />
जो हर साल बाटेंगे और<br />
बटोरेंगे कई इनाम<br />
लिखने से अधिक पायेंगे सम्मान<br />
अपने  ही तर्कों का करेंगे  अपमान<br />
जो वेब साईट नहीं उठा पा रही<br />
अपने पाठको को बोझ<br />
उन्हें ही ब्लोग जगत पर सजाएंगे<br />
इनाम पाने के लिए ब्लोगर  कहलायेंगे<br />
आज यह सम्मानित करेंगे तो<br />
तो  कल  उनसे सम्मानित हो जायेंगे<br />
हम तो ठहरे छोटे शहर के ब्लोगर<br />
भला कहाँ बडे शहर वालों से जीते पायेंगे<br />
पर देख-देख कर अपना मन बहलायेंगे<br />
हास्य का रस यहाँ बिखेरते जायेंगे<br />
उन्मुक्त हास्य भाव दिखाएँगे<br />
उनके एक  तरकश में है<br />
केवल तीर दस<br />
हमारे बारह तरकश में<br />
कई हैं शब्दों के तीर<br />
हमने पसंद  उनकी  चलते देखना<br />
सम्मान पाना तो उनको ही फबता<br />
--------------------------------------</p>
]]></content:encoded>
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<item>
<title><![CDATA[भोर में ही शुरू शोर -हिन्दी कविता साहित्य ]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/?p=149</link>
<pubDate>Mon, 28 Jan 2008 04:13:09 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/?p=149</guid>
<description><![CDATA[अभी हुई है भोर
शुरू कर दिया उन्होने शो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अभी हुई है भोर<br />
शुरू कर दिया उन्होने शोर<br />
कैसे न होंगे दिन भर बोर </p>
<p>जहाँ मौन रखकर ध्यान करना था<br />
वहाँ लगा रहे हैं दिमाग पर जोर<br />
कुछ सीखना था प्रात:<br />
परमात्मा का नाम लेकर<br />
डाल दिया मुहँ में रोटी का कोर<br />
आदमी सुख तो चाहता है<br />
पर दिल में उसके अहसास के लिए<br />
कोई कोना बाकी नहीं  है<br />
चारों तरफ भरा है शोर<br />
---------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रौशनी और अँधेरे का व्यापार-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/2008/01/27/roshni-aur-andhere-ka-vyapar-hasya-kavita/</link>
<pubDate>Sun, 27 Jan 2008 09:27:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/2008/01/27/roshni-aur-andhere-ka-vyapar-hasya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[वादों के बादल बरसने का
मौसम जब आता है
य]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>वादों के बादल बरसने का<br />
मौसम जब आता है<br />
यादों पर ग्रहण लग जाता है<br />
जजबातों के सौदागर तय करते हैं कि<br />
कौनसा सा वादा बरसाया जाये<br />
किस याद को लोगों के दिमाग<br />
से  भुलाया जाये<br />
तमाम के लगाते नारे रचकर<br />
हवाई किला   किया जाता है खडा<br />
जो  कभी खुद नहीं चलते<br />
उसके  दरवाजे कितने भी हों  आकर्षक<br />
रास्ता एक कदम बाद ही<br />
दीवार से टकरा जाता है<br />
लुभावने वाद और वादों के झुंड अपनी जुबान पर लिए<br />
अभिनय करते हुए जजबातों के<br />
व्यापारी चलते हैं साथ लेकर चलते हैं बुझे दिए<br />
अँधेरे का डर दिखाकर<br />
अपना  करते हैं व्यापार<br />
कहते हैं कि दूध का जला<br />
छांछ भी फूंक कर पी जाता है<br />
पर यहाँ तो आदमी कई बार<br />
जलने के बाद भी आदमी<br />
फिर पीने के लिए  जीभ जलाने आ जाता है<br />
---------------------------------------------------------</p>
<p>अँधेरे न होते तो<br />
रौशनी का व्यापार कौन करता<br />
रोशनी ही न होती अंधेरों से कौन डरता<br />
जिन्दगी इसी घूमते पहिये का नाम है<br />
एक करता जेब खाली दूसरा भरता<br />
--------------------------------------<br />
नोट-यह पत्रिका कहीं भी लिंक कर दिखाने की अनुमति नहीं है. दीपक भारतदीप, ग्वालियर</p>
]]></content:encoded>
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<item>
<title><![CDATA[हम छोड़ आये अंतर्जाल की वह गलियाँ-हास्य आलेख ]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/2008/01/27/ham-chhod-aaye-antarjaal-kee-vah-galiyaan/</link>
<pubDate>Sun, 27 Jan 2008 08:25:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/2008/01/27/ham-chhod-aaye-antarjaal-kee-vah-galiyaan/</guid>
<description><![CDATA[जब मैंने शुरू  में अंतर्जाल पर लिखना श]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जब मैंने शुरू  में अंतर्जाल पर लिखना शुरू किया तब पता नहीं था की ब्लोग क्या होता है पर इस पर हमारे लिखे को दूसरे भी पढ़ सकते हैं यह सोचकर मैंने इसे अपनी पत्रिका की तरह उपयोग करने का निश्चय किया. इसकी वजह यह थी कि हम जिन अंतर्जाल पत्रिकाओं को अपनी रचनाएं भेज रहे थे वह अपने अंकों में हमेशा ही स्थान नहीं दे सकतीं थी, और फिर हम कुछ ऐसे सम-सामायिक विषयों पर लिखते हैं जिन्हें साहित्य तो माना ही नहीं जा सकता. इसलिए अपने इसी ब्लोग पर भी  नियमित रूप से लिखना शुरू किया. इन सब ब्लोग को एक जगह दिखाने के लिए फोरम बना हुआ था नारद. </p>
<p>हम नारद को अंतर्जाल की पत्रिका 'अभिव्यक्ति' पर लिंक देखते थे. इसमें कई लोगों के ब्लोग थे पर हम यह समझे थे कि इनको कोई स्तंभ दिया गया है. तब हमने इसके लिए अपना एक व्यंग्य भेजा. इधर हम ब्लोग स्पॉट और वर्डप्रेस पर भी पता नहीं कैसे जुट गए.  पता नहीं हमारी नजर ब्लोग स्पॉट काम के ब्लोग पर  पड़ गयी. उसका लेखक कोई मुस्लिम ही था. इस्लाम मजहब के प्रवर्तक हजरत पैगंबर के कार्टून को लेकर जब प्रदर्शन हो रहे थे तब उस संबंध में उस मुस्लिम लेखक ने व्यंग्य लिखा था कि किस तरह इसके लिए भीड़ जुटाई जा रही थी. उसके लेखन में शब्दों की बहुत त्रुटियाँ थीं पर कथ्य इतना दमदार लगा कि हमने सोचा कि यह अपनी अभिव्यक्ति का  एक बहुत बढिया साधन है. हमने ब्लोग बनाने के प्रयास शुरू किये. उसमें लगभग एक माह लग गया. ब्लोग बना तो समझ में आया कि नारद पर उसे फोरम पर दिखाना जरूरी है-तभी पाठक मिल पायेंगे. हमें इसके लिए प्रयास शुरू किये. हमारा ब्लोग सादा हिन्दी फॉण्ट में था और दूसरे लोग इसे यूनीकोड में लिख रहे थे. दूसरी समस्या यह थी कि हमें तो ब्लोग का पता लिखना ही नहीं आता था. इसी अफरातफरी में हम पता नहीं क्या  करते थे कि दूसरों को परेशानी होने लगी. नारद ने हमारा ईमेल बैन करने की धमकी दी. हम चुप कर अपना ब्लोग लिखने लगे. इसी बीच कोई एक महिला की नजर में हमारा ब्लोग आया. उसने बताया कि हमारा लिखा उसकी पढाई में नहीं आ रहा है. तब हमने सोचा कि मजाक कर रही होगी. इसी बीच हमारा ब्लागस्पाट के हिन्दी टूल पर  पर नजर पड़ गयी पर उससे हम अपने लेख का पहला पैर लिखते थे ताकि वर्डप्रेस के डैशबोर्ड पर लोगों को पढाई आये. लोगों की नजर पड़ती तो वह उसे खोलते और फिर कहते थे कि बाकी तो कूडा ही दिखाई दे रहा है.तब हमने ब्लागस्पाट कॉम के ही हिन्दी टूल से कवितायेँ लिखकर वर्डप्रेस पर रखने लगे. पहली ही कविता पर ही हमें कमेन्ट मिला. तब तो फिर धीरे-धीर हम यूनीकोड में ही लिखने लगे. इतना लिख गए कि लोग आये कि आप इसे नारद पर पंजीकृत क्यों नहीं करा रहे. तब हमें ईमेल किया और नारद पर एक नहीं तीन ब्लोग पंजीकृत कराये.</p>
<p>इस तरह हम लेखक से ब्लोगर बन गए. शुरूआत में हमें लगा कि शायद यह अभिव्यक्ति का ही भाग है पर बाद में यह साफ समझ में आ गया कि कुछ उत्साही लोगों का समूह है जो इस तरह की  चौपाल बनाकर हिन्दी के ब्लोगरों को एकत्रित कर रहा है. हमनें  लिखना शुरू किया तो मजा आने लगा. पंजीकरण के १० माह तक निर्बाध रूप से लिखते रहे. वहाँ दरअसल बहुत सारी चीजें हमारे स्वभाव के विपरीत थी पर हम सोचते थे हमें क्या? लोगों का प्यार मिलता रहा तो लिखते चले जा रहे थे. कई बार सोचा कि छोड़ जाएं पर फिर सोचा कि यार इतना सारा प्यार करने वाले लोगों को किस कारण से छोडें. क्या बताएं?फिर सोच रहे थे कि धीरे-धीरे लिखना कम करते चले जाएं पर वह भी नहीं हो रहा था. इससे हमारा रचनात्मक लेखन प्रभावित हो रहा था. </p>
<p>आखिर वह अवसर आया और हमने पतली गली से निकलने का विचार बनाया. इस तरह कि कोई मित्र फिर हमें यह कहने नहीं आये कि तुमने लिखना बंद कर दिया है. वह जगह छोड़ने का कारण यह था कि हमें वहाँ से आगे के लिए कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था. ऐसा लगा रहा है कि हम रुक गए हैं. के तरह भीड़ में बैठकर लिख रहे हैं जो कि संभव नहीं है. अब होना यह है कि हमारे लिखे को पाठक एकदम नहीं मिलेंगे पर मिलेंगे जरूर. हालांकि आम पाठक इस पर प्रतिक्रिया नहीं दे पाते पर हम भी क्या करते?  वहाँ हमें कोई गंभीरता से पढ़ने वाला नहीं था और इस चक्कर में हमारा ध्यान अपने पाठको से हट रहा था. (क्रमश:)   </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नकली खोये की मिठाई, हो गयी प्यार से जुदाई-हास्य व्यंग्य ]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/2008/01/26/nakali-khoye-ki-mithae-pyar-se-ho-gayi-judai-hasya-vyangya/</link>
<pubDate>Sat, 26 Jan 2008 12:22:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/2008/01/26/nakali-khoye-ki-mithae-pyar-se-ho-gayi-judai-hasya-vyangya/</guid>
<description><![CDATA[वह सड़क पर रोज खडा होकर उस लड़की से प्रे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>वह सड़क पर रोज खडा होकर उस लड़की से प्रेम का इजहार करता था और कहता''-आई लव यू।<br />
''कभी कहता-''मेरे प्रपोजल का उत्तर क्यों नहीं देती।'<br />
वह  चली जाती और वह देखता रह जाता था। आखिर एक दिन उसने कहा कहा-''मुझे ना कर दो, कम से कम अपना वक्त खराब तो नहीं करूं।''<br />
वह लडकी आगे बढ़ गयी और फिर पीछे लौटी-''तुम्हारे पास प्यार लायक पैसा है।''<br />
वह बोला-''हाँ, गिफ्ट में मोबाइल, कान की बाली और दो ड्रेस तो आज ही दिलवा सकता हूँ।''<br />
लड़की ने पूछा-''तुम्हारे पास गाडी है।''<br />
लड़के न कहा-''हाँ मेरे पास अपनी मोटर साइकिल है, वैसे मेरी मम्मी और पापा के पास अलग-अलग कार हैं। मम्मी की कार मैं ला सकता हूँ।''<br />
लड़की ने पूछा-"तुम्हारे पास अक्ल है?"<br />
लड़के ने कहा-''हाँ बहुत है, तभी तो इतने दिन से तुम्हारे साथ प्रेम प्रसंग चलाने का प्रयास कर रहा हूँ। और चाहो तुम आजमा लो।"<br />
लड़की ने कहा-''ठीक है। धन तेरस को बाजार में घूमेंगे, तब पता लगेगा की तुम्हें खरीददारी की अक्ल है कि नहीं। हालांकि तुम्हें थोडा धन का त्रास झेलना पडेगा, और बात नहीं भी बन सकती है।''<br />
लड़का खुश हो गया और बोला-''ठीक, आजमा लेना।धन तेरस को दोनों खूब बाजार में घूमें। लड़के ने गिफ्ट में उसे मोबाइल,कान की बाली और ड्रेस दिलवाई। जब वह घर जाने लगी तो उसने पूछा-''क्या ख्याल है मेरे बारे में?''<br />
लड़की ने कहा-''अभी पूरी तरह तय नहीं कर पायी। अब तुम दिवाली को घर आना और मेरी माँ से मिलना तब सोचेंगे। वहाँ कुछ और लोग भी आने वाले हैं।''<br />
लड़का खुश होता हुआ चला गया। दीपावली के दिन वह बाजार से महंगी खोवे की मिठाई का डिब्बा लेकर उसके घर पहुंचा। वहाँ और भी दो लड़के बैठे थे। लड़की ने उसका स्वागत किया और बोली-''आओ मैं तुम्हारा ही इन्तजार कर रही थी, आओ बैठो।''<br />
लड़का दूसरे प्रतिद्वंदियों को देखकर घबडा गया था और बोला -''नहीं मैं जल्दी में हूँ। मेरी यह मिठाई लो और खाओ तो मेरे दिल को तसल्ली हो जाये।''<br />
लड़की ने कहा-''पहले मैं चेक करूंगी की मिठाई असली खोये की की या नकली की। यह दो और   भी लड़के  बैठे हैं इनकी  भी मिठाई  चेक कर करनी है। यही तुम्हारे अक्ल की परीक्षा होगी। ''<br />
लड़के ने कहा-''असली खोवे की है, उसमे बादाम और काजू भी हैं। ''<br />
लडकी ने आँखें नाचते और उसकी मिठाई की पेटी खोलते हुए पूछा-''खोवा तुम्हारे घर पर बनता है।''<br />
 लड़का सीना तान कर बोला-''नहीं, पर मुझे पहचान है।''<br />
लडकी ने मिठाई का टुकडा मुहँ पर रखा और फिर उसे थूक दिया और चिल्लाने लगी-''यह नकली खोवे की है।''<br />
लड़का घबडा गया और बोला-''पर मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ।''<br />
लडकी ने कहा-'तभी यह नकली खोवे की मिठाई लाये हो। तुम फेल हो गए। अब तुम जाओ इन दो परीक्षार्थियों की भी परीक्षा लेनी है।''<br />
लड़का अपना मुहँ लेकर लौट आया और बाहर खडा रहा। बाद में एक-एक कर दोनों प्रतिद्वंद्वी भी ऐसे ही मुहँ लटका कर लौट आये। तीनों एक स्वर में चिल्लाए-''इससे तो मिठाई की जगह कुछ और लाते, कम से कम जुदाई का गम तो नहीं पाते।''<br />
हालांकि तीनों को मन ही मन में इस बात की तसल्ली थी की उनमें से कोई भी पास नहीं हुआ था।<br />
नोट- यह  एक काल्पनिक व्यंग्य है और किसी व्यक्ति या घटना से इसका कोई लेना-देना नहीं है और किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसके लिए जिम्मेदार होगा।</p>
]]></content:encoded>
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