आज फिर मुझको खिड़की से दिख रहा है चाँद आधा-आधा जिस तरह से मैं जी रहा हूँ वो भी कहीं जी रहा है आधा-आधा शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’ लेखन वर्ष: २००३ … more →
तख़लीक़-ए-नज़रPraful wrote 6 months ago: Installation - The first thing we need to do is extract the sourceballs so we can work with the file … more →
विनय wrote 9 months ago: आज फिर मुझको खिड़की से दिख रहा है चाँद आधा-आधा जिस तरह से मैं जी रहा हूँ वो भी कहीं जी रहा है आधा-आध … more →
विनय wrote 1 year ago: शबनम यूँ सुलगी रात सोते पत्तों पर जैसे वह मुझको मिले और मिले भी ना चाँद खिड़की पर बैठकर मुझे देखता ह … more →
विनय wrote 1 year ago: शाम गहरी हो रही थी सुनहरा चाँद बादलों से झाँक रहा था छत पे था मैं और पुरवाई बह रही थी तेरा ख़्याल और … more →
विनय wrote 1 year ago: वो तस्कीं न मेरे दर पे माथा टेके न ही रौज़न से झाँके सिर्फ़ - खा़बों को बे-रब्त किए घूमती है हर गली हर … more →