सहर-ब-सहर1 मैं ढूँढ़ता रहा शुआएँ2 कहाँ छिप गयीं नूर-सी रोशन निगाहें न कोई घर रहा मेरा न कोई ठिकाना मेरी मंज़िल तो बन गयीं अब ये राहें है जो दर्द सो अब तन्हाई से है मुझे असरकार हों, कुछ काम आयें दुआएँ3 … more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 8 months ago: सहर-ब-सहर1 मैं ढूँढ़ता रहा शुआएँ2 कहाँ छिप गयीं नूर-सी रोशन निगाहें न कोई घर रहा मेरा न कोई ठिकाना म … more →
विनय wrote 9 months ago: यह सोज़गाह1 है कि मेरा दिल है मुझको जलाने वाला मेरा क़ातिल है जिसे देखकर उसे रश्क़2 आता है वह कोई और नह … more →
विनय wrote 2 years ago: वो जिसे इश्क़ कहता था वाइज़1 हम उसमें फँस गये बहाये इतने आँसू कि जहाँ खड़े थे वहीं धँस गये न जिगर से ल … more →
विनय wrote 2 years ago: वह मुझे चाहती है या यूँ ही मुझसे बात करनी थी उसे कोशिश तो उसने मुझ तक पहुँचने की बहुत की थी और फिर व … more →