गिर जायेगा इस बरसात में घर तुम हो उधर हम हैं इधर जंगल ही जंगल है सब वीराना-सा जिस सिम्त दौड़ती है नज़र न तुम हो मेहरबाँ न हक़ ही है होता नहीं किसी पे दुआ का असर ख़ाली दिल में साँसें बोझ लगती हैं और मुसक… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: गिर जायेगा इस बरसात में घर तुम हो उधर हम हैं इधर जंगल ही जंगल है सब वीराना-सा जिस सिम्त दौड़ती है नज़ … more →
विनय wrote 1 year ago: सिवा इससे जो भी हो, करेंगे महब्बत तुझ बिन किसी से न करेंगे क़ज़ा ने भी हमसे ताक़त आज़माई की तुझ बिन हम ज … more →
विनय wrote 1 year ago: मैं वो आग हूँ जो लग जाऊँ तो जंगल का तिनका-तिनका जला दूँ फैल जाऊँ चंद लम्हों में कुछ इस तरह जैसे आग क … more →