विनय wrote 1 year ago: हम में जीतने का हौसला है ‘नज़र’ यह बाज़ी भी हम मारकर जायेंगे यह ज़ख़्म जाविदाँ नहीं रहने वा … more →
विनय wrote 1 year ago: ख़लिश को जगह न दो दिल में नासूर बन जायेगी मरहम भी न लगा पाओगे साँस घुट के मर जायेगी ज़ीस्त अलग है, ज़ी … more →
विनय wrote 1 year ago: ज़ख़्मे-जिगर भर आये, कहाँ हो तुम? बदरा सावन बुलाये, कहाँ हो तुम? अपने हश्र तक पहुँचा ‘नज़र … more →
विनय wrote 1 year ago: ख़राश ज़ख़्म बनेगी, घाव करेगी और मवाद के दरिये बहेंगे हमने हमेशा ‘वफ़ा’ से लाग रखा एक दिन … more →
विनय wrote 1 year ago: दिल ख़ुद ख़ला है उसमें दूसरी ख़ला क्या होगी मैंने सय्यारों की तरह भटककर देखा है इसमें दूर-दूर तक इसम … more →
विनय wrote 1 year ago: और दाँव अपनी जाँ का किसने लगाया होगा फिर इश्क़ ने फ़रहाद कोई बुलाया होगा यूँ ही नहीं बिगड़ता है कोई कि … more →
विनय wrote 1 year ago: इस जानिब य उस जानिब कौन ‘नज़र’ है कौन ‘ग़ालिब’ एक बला है दर्दे-निहाँ कौन बुरा … more →
विनय wrote 1 year ago: वह जो मेरे ज़ख़्म गिनता है तो कहता है बस इतने ही! ख़िज़ाँ आयी बहार लौट गयी निशान रह गये इतने ही उसने न … more →
विनय wrote 1 year ago: न रखो वह तस्वीरें हरी जिनसे दिल दुखता हो कर दो वह ज़मीनें बंजर जिनमें घाव उगता हो क्यों सीने में साँस … more →
विनय wrote 2 years ago: इम्तिहाँ मेरी मोहब्बत को मुदाम देने हैं दीजिए अगर आपको इल्ज़ाम देने हैं और कौन दूसरा सितम-परस्त होगा … more →