अंतरजाल के बजार मे, बेजार भइल मनई

हर बेरा गूगल के शिकार भइल मनई ॥

घरी घरी टुकुर टुकुर वेभ के निहारत रहे

छितिराइल वेभ क, औंजार भइल मनई ॥

रक्तचाप बढ़ल जाता रोज रोज हिट से

किडनी भी केहु से , उधार लेही मनई ॥

दुनिया के गाँव लेखा, बुझे मे टटोले मे

संवेदनों के अरथी ,निकार देही मनई ॥

शुगर के होस नईखे मदिरा क संग साथ

सर्च करत कुरसी निढाल भइल मनई ।

कफन भा फूल अब मेल से भेजाए लागल

अपनन के बिकट सवाल भइल मनई ॥

दिन बा कि रात बा कहाँ केकर साथ बा

घरहीं मे बड़का बवाल भइल मनई ॥

बोल चाल बंद अब गुमसुम रहे लागल

बाबू खाति जिनगी जवाल भइल मनई ॥

खुद मे सवाल जे, जवाब ढूँढे निकलल

मन भा बेमन के , कहांर भइल मनई ॥

प्रेम के प्रतीति जब सूझत बुझत नाही

सुभीति पर कहवाँ निसार भइल मनई ॥

ढेरका के फेर मे , अबेर ना सबेर देखे

बिहने से बइठल , अधेर भइल मनई  ॥

वाइरस के फेरा मे, घर के बेगाना अस

सर्वर लेखा ट्रैफिक मे, ढेर भइल मनई ॥

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी