टैग्स » ग़ज़ल

मंज़िले एक दिन हमसे मुस्कुरा के बोलेंगी

मंज़िले एक दिन हमसे मुस्कुरा के बोलेंगी,
राहें जो छूट गयी है मुड़ के फिर वो लौटेंगी

किलकारियाँ जो औंधे मुह गिर रही यहाँ-वहाँ
देखना वो एक दिन खिलखिला के दौड़ेंगी।

न दो इतनी तव्वजो इन बेरहम हवाओं को,
हवाएँ जो संग है कल अपना रुख वो मोडेंगी।

कुछ सपने शहर छोड़ जाने को आमादा हैं,
कुछ उम्मीदें हैं जो इसी घर में दम तोड़ेंगी।

पाकीज़ा-निगाहें तसव्वुर की प्यासी हैं,
नमकीन बूँदे फिर दिल में मिठास घोलेंगी।

ग़ज़ल

बाद मुद्दत के गम से निज़ात मिली

बाद मुद्दत के गम से निज़ात मिली,
तुम मिले क्या मुझे कायनात मिली।

रात की थाली से गिर गयी बदलियाँ
कितनी रातों में तारों वाली रात मिली।

खुद को हार के हमने दिल जीता तेरा
हाय जीत मिली है या मात मिली।

उनसे नज़रे मिली तो मिली इस तरह
दिल की बंज़र जमीं को बरसात मिली।

अब कसीदों की झड़ी न रुके ‘पाकीज़ा’,
तेरी खामोशियों को उनकी बात मिली।

ग़ज़ल

मैं तेरे प्यार की तलबगार रहना चाहती हूँ

न जाने क्यों इतना बेकरार रहना चाहती हूँ।
मैं तेरे प्यार की तलबगार रहना चाहती हूँ।।

दवा न कर मेरी, न कर खिदमत तू रहने दे।
मैं कुछ देर और बीमार रहना चाहती हूँ।।

बुझा दो शम’आ मेरे दिल को जलने दो अभी।
गुज़रती रात की मैं पहरेदार रहना चाहती हूँ।।

तुम्हे डर है तुम्हारे घर में रहता कौन है पीछे।
मैं बेघर हूँ सर-ए-बाज़ार रहना चाहती हूँ।।

कोई हिस्सा मेरी रूह का खोगया है ‘पाकीज़ा’
बेगुनाह हूँ मगर गुनहगार रहना चाहती हूँ।

ग़ज़ल

खुद से मुलाकात हो गयी

उसकी तलाश में भटकते भटकते
एक दिन खुद से मुलाकात हो गयी।

मैं दिन भर खामोशियाँ तोलती रही,
रात आई तो सितारों से बात हो गयी।

बादल थे तो सूखा पड़ा था ये घर,
सावन बीता तो बरसात हो गयी।

किसी को हाँसिल न हुआ कफ़न ज़रा,
किसी की मुट्ठी में कायनात हो गयी।

जख़्म मेरा हस्ती-ओ-हयात ‘पाकीज़ा’
दर्द मेरा सानी, मेरी जात हो गयी।

ग़ज़ल

ज़िन्दगी इससे बेहतर होती तो क्या होती

ज़िन्दगी इससे बेहतर होती तो क्या होती,
ज़िन्दगी इससे बदत्तर होती तो क्या होती।

हादसों से टकरा के लौट आते हैं घर
ज़िन्दगी गर बेघर होती तो क्या होती।

रंजिश-ए-बहाराँ भी खिलाती हैं गुलिस्ताँ
ज़िन्दगी यूँ बंज़र होती तो क्या होती।

साहिल खड़ा सोच रहा देख लहरों को,
ज़िन्दगी तू समंदर होती तो क्या होती।

उनका हर सितम नज़र-ए-करम ‘पाकीज़ा’
ज़िन्दगी मेरी नज़र होती तो क्या होती।

ग़ज़ल

रोज़ नया तमाशा है

रोज़ नया तमाशा है इन आँखों का,
एक पर्दा गिरता है एक उठ जाता है।

कितने भी करीने से बाँध लो डोर को,
इक सिरा जुड़ता है इक टुट जाता है।

अजब सफ़र है जिसे कहते हैं ज़िन्दगी,
लूटने वाला भी अक्सर लुट जाता है।

नाम रेत पे लिखो य पत्थर पे सनम,
मिटना है एक दिन, मिट जाता है।

घरोंदा तिनका जोड़ बनाया ‘पाकीज़ा’,
बुलावा आता है तो छुट जाता है।

ग़ज़ल

भगवान् लोग हैं..

अपनी मर्ज़ीे है के भगवान् लोग हैं,
अपनी मर्ज़ी है के शैतान लोग हैं।

इत्र लगा कर गुलशन में जाते हैं,
गुल की ख़ुश्बू से अनजान लोग हैं।

अक्ल की राहों न पूछो है क्या जीना,
ईमान वाले लोग बईमान लोग हैं।

मेरी खद-ओ-खाल को मैं समझते हैं,
लोग सयाने भी नादान लोग हैं।

हवादिस है के हम इंसाँ हैं ‘पाकीज़ा’
खुद के मातम से ही परेशान लोग हैं।

ग़ज़ल