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Han

Jejegjsnjsnsj to the get go to the bed

दिल में तेरे

क्या जाने किस रास्ते से गुज़र के आये हैं दिल में तेरे
तुझे खबर क्या ओ बेखबर बिखर के आये हैं दिल में तेरे

तेरी तमन्ना तेरी गुजारिश तेरी मुहोब्बत तुझे मुबारक
हमे गिला है ओ जानेमन हम उतर के आये हैं दिल में तेरे

कभी कभी तो ये दिल है दरिया कभी ये दिल है जनम का प्यासा
कैसे बताएं तुझे ए हमदम किधर के आये हैं दिल में तेरे

है काली रातें मेरी सहेली सुबह से मुझको कुछ बैर यूँ हैं
झपक ले आँखें ये रस्म-ए-उल्फ़त के डर के आये हैं दिल में तेरे

है ‘पाकीज़ा’ ये दिलों की राहें इनमे मुकद्दर का रंग दूजा
अहल-ए-हुनर को आने न पाये नज़र के आये हैं दिल में तेरे

ग़ज़ल

क्या कीजिये

सर-ए-रहगुज़र मंज़िल का सवाल क्या कीजिये
कू-ए-यारा में दुश्मन का ख्याल क्या कीजिये

गर्मी-ए-फलक से तड़प गिर रहे हैं कबूतर सारे
दाना डाल फिर गिरफ्ता-ए-जाल क्या कीजिये 20 और  शब्द

ग़ज़ल

क्यों नहीं होती

बाग़ में मुस्कुराती हर कली फूल क्यों नहीं होती,
यादें जल बुझ कर कभी धूल क्यों नहीं होती।

प्यार भी तो तिरी इबादत का इक ज़रिया है,
प्यार की कोई दुआ फिर क़ुबूल क्यों नहीं होती

सुना है तेरा अक़्स आदम की जात जीता है
मेरी परछाई मेरे लिए रसूल क्यों नहीं होती

एक मुल्क़ है मेरे दिल में एक मुल्क में दिल है मेरा
दिलों के बीच की ये सरहदें फ़ुज़ूल क्यों नहीं होती

ज़िन्दगी बस मुफ़ाहमत का फलसफा है ‘पाकीज़ा’
तेरी तरह ये ज़िन्दगी हमसे मलूल क्यों नहीं होती

ग़ज़ल

हो न सकी

तू मेरे सफर में था मगर मैं तेरी मंज़िल हो न सकी
दिल में तो रही मैं तेरे मगर रूह में शामिल हो न सकी

तुम ढूंढ सको गर ढूंढ लो राहों में मिलूंगी तुमको कहीं
मेरी जितनी भी थी ख्वाइशें मुझको हांसिल हो न सकी

तुम थम लो दामन फिर कोई तुमको किसने है रोक रखा
मुझको तो है गम ये लाज़मी मैं तेरे काबिल हो न सकी

एक तूफाँ तेरे दिल में था जो ले गया पतवार मेरी
मुझे डूबना ही था मगर गम है तेरा साहिल हो न सकी

तू गैर है अब रब्ब खैर करें बोझिल मेरी बीनाई है
दिल में अब तू नहीं है मगर तुझसे मैं बे-दिल हो न सकी

ग़ज़ल

ज़िन्दगी तेरे लिए

ज़िन्दगी तेरे लिए चल नया आसमाँ तलाश करें,
तेरे विरानो को जो सँवारे ऐसा मेहरबाँ तलाश करें।

तू परेशां हो तो तेरी चेहरे की रंगत निखार दे जो
फिर कोई हमसफ़र फिर कोई कारवाँ तलाश करें।

तेरी खामोशियों को कोई आवाज़ों से पुकारे कभी,
दिल के दरवाज़ों को खोल कोई मेहमाँ तलाश करें।

है सितमगर रास्ते चले न चले मंज़िल की जानिब,
राहों से बिछड़कर चल कोई आशियाँ तलाश करें।

‘पाकीज़ा’ हसरतें कहती हैं जीने का कोई सहारा हो
जान जाए तो जाए पर कोई जान-ए-जाँ तलाश करें।

ग़ज़ल

गर्मी बहुत है

आजकल मेरे शहर में गर्मी बहुत है,
रात-दिन दोपहर में गर्मी बहुत है।

बरसे नहीं बादल पलकें भी सुखी हैं
तेरी मेरी नज़र में गर्मी बहुत है।

कबूतर ने घौंसला गमले में बनाया है,
बगीचे के शजर में गर्मी बहुत है

दिखते नहीं बच्चे ट्यूबवैल पे खेलते
नदियों-ओ-नहर में गर्मी बहुत है

पंखे से टपकता है छत का पसीना
बिन ऐसी के घर में गर्मी बहुत है

ग़ज़ल