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जब याद....

छोड़कर हमें जब तुम दूर जाओगे,

क्या इस पागल को फिर भूल जाओगे,

मेरी आँखों से गिरोगे यूँ आँसू बनके,

जब कभी याद मुझे तुम आओगे..
बेहद हूँ बेकरार मैं फूर्कत की बात सोच-सोचकर,

सीने से दिल जुदा है ..ऐसा लग रहा है..

क्या करके वफ़ा बेइन्तहाँ..फिर मुझसे जुदा हो जाओगे,

मेरी आँखों से गिरोगे यूँ आँसू बनके,

जब कभी याद मुझे तुम आओगे….

ग़ज़ल

रोक लेना....

ऐ मेरे दिले-नाखुद़ा तुम ,इस दिल को रोक लेना,

देखो आगे हुस्ने-दरिया,तुम मुझको डुबा न देना,

ज़िया-ए-चाँद है उधर,सरोद-ए-शबाऩा भी,

तिशऩगी है…बस तिशऩगी है….

उन चश्म़-ए-कैफ़ में,तुम मुझको खपा न देना, 11 और  शब्द

ग़ज़ल

मालूम

मुझे पता है मंजिल मेरी, मगर रास्ता नहीं मालूम,

किस और से निकालू मेरा कारवां, नहीं मालूम।

मैं पहुंचूंगा मंजिल तक, ऐतबार पक्का है,

कितना होगा मगर इंतज़ार? नहीं मालूम।

चलते रहे संभल के मगर उस गड्डे से ना बच सके

किसी ओर के गलतियों पर हम क्यों गिरे, क्या मालूम?

क्यों तोड़ गए दम ओर टूटे मेरे सपने

कहा छोड़ी हमने कसर नहीं मालूम|

हर कोई कह जाता है “हम तुम्हारेै हैं, अधीर”

मगर रुकता क्यों नहीं कोई, नहीं मालूम।

हजार आंसू छुपाए हंसते है लाख हंसी

किसे बताए, क्योंकि, मन का हाल नहीं मालूम|

Hindi

दिल लगाकर कव किसी को चैन यारों मिल सका है

जिंदगी ने जिस तरह हैरान हमको कर रक्खा है
मन कभी करता है मेरा जिंदगी की जान ले लूँ

दिल लगाकर कव किसी को चैन यारों मिल सका है
पूजते पत्थर जहाँ में, मैं पत्थरों की शान ले लूँ

हसरतें पूरी हो जव तो खूब भाती जिंदगी है
ख्वाव दिल में पल रहे शख्श के अरमान ले लूँ

प्यार की बोली लगी है अब आज के इस दौर में
प्यार पाने के लिए क्या कीमती सामान ले लूँ

हर कोई अपनी तरह से यार जीवन जी रहा है
जानकर इसको “मदन “जिंदगी का गान ले लूँ

दिल लगाकर कव किसी को चैन यारों मिल सका है
मदन मोहन सक्सेना

Poem

प्यार ने तो जीबन में ,हर पल खुशियों को बिखेरा है

खुशबुओं की बस्ती में रहता प्यार मेरा है
आज प्यारे प्यारे सपनो ने आकर के मुझको घेरा है
उनकी सूरत का आँखों में हर पल हुआ यूँ बसेरा है
अब काली काली रातो में मुझको दीखता नहीं अँधेरा है

जब जब देखा हमने दिल को ,ये लगता नहीं मेरा है
प्यार पाया जब से उनका हमने ,लगता हर पल ही सुनहरा है
प्यार तो है सबसे परे ,ना उसका कोई चेहरा है
रहमते खुदा की जिस पर सर उसके बंधे सेहरा है

प्यार ने तो जीबन में ,हर पल खुशियों को बिखेरा है
ना जाने ये मदन ,फिर क्यों लगे प्यार पे पहरा है

मदन मोहन सक्सेना

Poem

दर्द मुझसे मिलकर अब मुस्कराता है

दर्द मुझसे मिलकर अब मुस्कराता है

बक्त कब किसका हुआ जो अब मेरा होगा
बुरे बक्त को जानकर सब्र किया मैनें

किसी को चाहतें रहना कोई गुनाह तो नहीं
चाहत का इज़हार न करने का गुनाह किया मैंने

रिश्तों की जमा पूंजी मुझे बेहतर कौन जानेगा
तन्हा रहकर जिंदगी में गुजारा किया मैंने

अब तू भी है तेरी यादों की खुशबु भी है
दूर रहकर तेरी याद में हर पल जिया मैनें

दर्द मुझसे मिलकर अब मुस्कराता है
जब दर्द को दबा जानकार पिया मैंने

मदन मोहन सक्सेना

Poem

मुकम्मल जहाँ

सपने, कविता ,ग़ज़ल, शायरी में तो जमीं आसमां अौ सारे जहाँ मिल जाते हैं..

पर उनसे बाहर निकलो , तब मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता ।

चंद पंक्तियाँ