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हर जगह नफ़रत टटोलता है

झूठ ही झूठ हर बार बोलता है

फायदे के तराजू पे सच तोलता है।

जुबां पे उसके प्यार का छलावा

हर जगह नफ़रत टटोलता है।

सर झुकाता है रोज मंदिर में

बेझिझक आस्था से खेलता है।

अमृत पर टिकी नज़र उसकी

हर दिल में ज़हर घोलता है।

ग़ज़ल

नज़रों में हया दिल में मोहब्बत बन के रहते हैं।

नज़रों में हया दिल में मोहब्बत बन के रहते हैं।
हम तुझमें सनम आदत बन के रहते हैं॥

जी चाहे तब खोल के पढ़ लेना हमें।
तेरे तकिये के नीचे हम ख़त बन के रहते हैं॥

इश्क उस पाक अहद का नाम है।
दो शख़्स इक दूजे की ज़रूरत बन के रहते हैं॥

ये मेरी मोहब्बत नहीं तो फिर क्या कहूँ।
हम उन के चेहरे की ज़ीनत बन के रहते हैं॥

ज़माना सरे राह टोकने लगा है उन्हें।
क्यों आजकल वो हम सा बन के रहते हैं॥

जिधर भी रुख़ करोगे हमें ही पाओगे।
हम दिलजलों की महफिल में रंगत बन के रहते हैं॥

दोस्तों में महकते हैं साँसें बनकर।
दुश्मनों के ज़ेहन में अदावत बन के रहते हैं॥

ग़ज़ल

इन निगाहों में मोहब्बत का नूर नज़र आता है।

इन निगाहों में मोहब्बत का नूर नज़र आता है।
तू कभी पास नज़र आता है कभी दूर नज़र आता है॥

मेरी ज़िन्दगी में तेरी अहमियत क्या बताऊँ तुझे।
तेरे नाम से चेहरा सुर्ख़ दिल में सुरूर नज़र आता है॥

ये पलकों की नमी बेवजह नहीं है।
तू मुझे कहीं से टूट कर चूर नज़र आता है॥

तेरा हर ज़ख्म मेरे जिस्म का ज़ेवर बना दे ए दोस्त।
तू मुझे बङा बेबस, मजबूर नज़र आता है॥

कुछ कहना चाहती हैं पर कह नहीं पाती।
तेरी आँखों में एक सवाल ज़रूर नज़र आता है॥

तेरी हस्ती को अपनी दहलीज़ का  पत्थर समझ लिया।
यहाँ हर शख्स मुझे बङा मगरूर नज़र आता है॥

ग़ज़ल

इश्क में पहले से अन्दाज़ नहीं होते।

इश्क में पहले से अन्दाज़ नहीं होते।
जज़्बात लफ्ज़ों के मोहताज नहीं होते॥

ये वो ज़ुबाँ है जो आँखों से बयाँ होती है।
इसमें हर्फ-ओ-अल्फाज़ नहीं होते॥

मुफ़लिसी तो मुस्कुराने का हुनर सिखाती है।
कौन कहता है गमजदा खुशमिज़ाज़ नहीं होते॥

सफ़र की हद हौसले तय करते हैं।
परों से कभी परवाज़ नहीं होते॥

हम उनसे जो उनसा बन के मिल लेते।
तो शायद वो हमसे नाराज़ नहीं होते॥

दिलों के बाज़ार में खुद को बेच ना पाए।
वरना हम भी मोहब्बत के मोहताज नहीं होते॥

ग़ज़ल

अंधेरों में एक चिराग का सफर था।

अंधेरों में एक चिराग का सफर था।
सूने बयाबाँ में जैसे कोई शजर था॥

अच्छे भले धङकते दिल को पलभर में तोङ दिया।

वल्लाह! तुम्हारा भी क्या हुनर था॥

तुम तो फिराक में थे मेरी जीस्त नोंचने के।
ज़िन्दा हूँ अबतलक जाने किसकी दुआओं का असर था॥

मुझे इल्ज़ाम देन वाले तू इस बात से वाक़िफ़ है।
मैं जैसा भी था तुमसे तो बेहतर था॥

ग़ज़ल

इबादत

तेरी सरपरस्ती में खुदा सारा जहाँ है।
हम सब तेरे मोमीन हैं तू रहनुमा है॥

हर शख्स है गुमराह इस शहर में तेरे वास्ते।
तू ख़ुद बता दे कौन सा तेरा मकां है॥

कोई अब्र का टुकङा बरस जाए मरहम की तरह।
हर नज़र में तल्खी है, ज़ख्मों के निशाँ है॥

मेरी बेअसर होती दुआओं ने मुझे समझा दिया।
इस ज़मीं से दूर कितना आसमां है॥

मैं मिन्नतें करता हूँ ज़ालिम बख्श दे इसको।
इस शजर पे परिन्दों का आशियाँ है॥

ग़ज़ल

मुहब्बत किस बला का नाम है पूछो ज़रा हम से।

मुहब्बत किस बला का नाम है पूछो ज़रा हम से।
यहाँ हर शख़्स है वाकिफ़ इसके शोख़ सितम से॥

ज़मीं पर रहने वालों भला इल्ज़ाम कैसे दूं।
फ़रिश्ते भी नहीं बच पाए इसके अहले-करम से॥

निगाहों में हया और थरथराहट सी लबों पे होती है।
सरे महफिल कोई करता है तेरा ज़िक्र जब हम से॥

उसने हर्फ़-बा-हर्फ़ खुद ग़ज़ल का रूप ले लिया।
तेरा नाम मैंने जब-जब लिखा कागज़ पे कलम से॥

मुहब्बत के फ़साने का यही अंजाम होना था।
हम आँखें चार कर बैठे पत्थर के सनम से॥

कोई ताश की बाज़ी सा था दिल का लगाना ये मेरा।
मुझे मात भी हासिल हुई अपनी ही ‘बेगम’ से॥

ग़ज़ल