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ज़िन्दगी तेरे लिए

ज़िन्दगी तेरे लिए चल नया आसमाँ तलाश करें,
तेरे विरानो को जो सँवारे ऐसा मेहरबाँ तलाश करें।

तू परेशां हो तो तेरी चेहरे की रंगत निखार दे जो
फिर कोई हमसफ़र फिर कोई कारवाँ तलाश करें।

तेरी खामोशियों को कोई आवाज़ों से पुकारे कभी,
दिल के दरवाज़ों को खोल कोई मेहमाँ तलाश करें।

है सितमगर रास्ते चले न चले मंज़िल की जानिब,
राहों से बिछड़कर चल कोई आशियाँ तलाश करें।

‘पाकीज़ा’ हसरतें कहती हैं जीने का कोई सहारा हो
जान जाए तो जाए पर कोई जान-ए-जाँ तलाश करें।

ग़ज़ल

गर्मी बहुत है

आजकल मेरे शहर में गर्मी बहुत है,
रात-दिन दोपहर में गर्मी बहुत है।

बरसे नहीं बादल पलकें भी सुखी हैं
तेरी मेरी नज़र में गर्मी बहुत है।

कबूतर ने घौंसला गमले में बनाया है,
बगीचे के शजर में गर्मी बहुत है

दिखते नहीं बच्चे ट्यूबवैल पे खेलते
नदियों-ओ-नहर में गर्मी बहुत है

पंखे से टपकता है छत का पसीना
बिन ऐसी के घर में गर्मी बहुत है

ग़ज़ल

तुम्हारा नाम लेकर के

मैं अब खुद को हँसाती हूँ तुम्हारा नाम लेकर के
मैं अब खुद को रुलाती हूँ तुम्हारा नाम लेकर के

कभी फुरसत मिले गर तो तुम आजाना मेरे घर में
मैं हर रोज़ दीया जलाती हूँ तुम्हारा नाम लेकर के

तुम्हारी निगाहों में है देखी हर शय ज़माने की,
मैं ये दिल आज़माती हूँ तुम्हारा नाम लेकर के

तुम से क्या बिछड़े हम सब तुम से ही दिखते हैं,
मैं अब सबको बुलाती हूँ तुम्हारा नाम लेकर के

मेरे मद्द-ए-मुक़ाबिल तुम्हारा रुख-ए-जमाल है
मैं क्यों खुद को सजाती हूँ तुम्हारा नाम लेकर के

ग़ज़ल

माँ

कर पाऊँ जो तेरे लिए तो बस इतना करना है माँ
तुझको अपनी खुशियाँ देके तेरा गम हरना है माँ

तू है मेरा समंदर सारा, तू नैय्या तू ही पतवार
तेरे साथ ही डूबना मुझको तेरे साथ तरना है माँ

तेरी आँख के झरते मोती गिनके बड़ी हुयी हूँ मैं,
तेरे जैसे हर चेहरे को खुश मुझको करना है माँ

तेरे पाँव के छाले जैसे मेरे दिल में बसे रहते हैं
हर माँ के झखमो पे अब मरहम मुझे धरना है माँ

तू माँ है तू चुप रहती है, कहती नहीं है कुछ भी माँ
हम बच्चों को तेरे लिए अब तो कुछ करना है माँ

ग़ज़ल

समझो

समझो जो मुझे तो नरम-दिल समझो ।
न समझो गर मुझे तो संग-दिल समझो ।।

ये जो ग़ज़ल है मिरी जिसपे तुम मरते हो ।
इसको ही मिरा इज़हार-ए-दिल समझो ।।

जब कभी ठहर जाऊँ मैं किसी भी सम्त ।
उस मकाम को तुम मेरी मंज़िल समझो ।।

मेरा हर्फ़ मेरे लफ्ज़ मेरी नज़्म है तुम से ।
तुम सुनो कलाम तो मेरी महफ़िल समझो ।।

वो जो रो रहा है मेरी मय्यत पे चुपके से ।
उस जान-ए-जाँ को मेरा कातिल समझो ।।

डूब जाना है मुझे तो लहरों में ‘पाकीज़ा’ ।
उठते हुए भँवर को मेरा साहिल समझो ।।

ग़ज़ल

ये ज़रूरी तो नहीं

जो दिखता हो सही वही सच्चा हो ये ज़रूरी तो नहीं
कच्ची उम्र का हर शख्स बच्चा हो ये ज़रूरी तो नहीं।

नुमाईश की जालसाज़ी से निकल आओ तो समझोगे,
जो बिका धड्ड्ले से वही अच्छा हो ये ज़रूरी तो नहीं

पतझड़ के मौसम ने गिरा दिये सब सूखे पत्ते दरख्तों के,
एक पत्ता जो बच गया है वो कच्चा हो ये ज़रूरी तो नहीं

हर आदमी है चोर, हर आदमी की नीयत में खराबी है,
अंदर बाहर एक जैसा शोर मचा हो ये ज़रूरी तो नहीं।

कैफियत कोई हो अपने दिल पे रख ऐतबार ‘पाकीज़ा’
उजड़े हुए शहर में कोई न बचा हो ये ज़रूरी तो नहीं।

ग़ज़ल

कागज़-कलम दवात-किस्सा

कागज़-कलम दवात-किस्सा सब कुछ तो बेगाना है।
जो दिल में था वो दिल में है जो लिखा वो अफ़साना है।।

साकी तेरे मयखाने का ये किस्सा बड़ा पुराना है।
जो पी लिया वो पानी था जो छलका वो पैमाना है।।

चाँद फलक पर आधा-पौना तारों का शामियाना है
जो देखा चेहरा तेरा था जो खोया वो अनजान है।।

पीली शाम की सुर्ख़ आँखों में नारंगी सा बहाना है,
जो डूबा सूरज दिल था मेरा जो जी उठा वो ज़माना है।।

रेत के ऊपर रेत की चादर, रेत का महल बनाना है,
जो हाथ से छूटी रेत ‘पाकीज़ा’, रेत में वो मिल जाना है।।

ग़ज़ल