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ट्विटर शायरी

तुम इतना जो ट्विटवा रहे हो
किसका लिखा चुरा रहे हो

फॉलो बैक के लिए, फॉलो करी
क्या मकड़ जाल बिछा रहे हो

न बनोगे शायर यूँ लिख लिख के,
क्यों फरे को ग़ज़ल बता रहे हो

जिन लोगों को म्यूट कर रखा है
उनको ही डीएम में चाटे जा रहे हो

फॉलोवर का खेल है ये ट्विटर
फोल्लोविंग अपनी बढ़ा रहे हो

ग़ज़ल

ग़ज़ल : जिस तर्ह वो मिला...

जिस तर्ह वो मिला, गले से भी लिपट गया
कब ये लगा कि दिल वो कभी था उचट गया.

उसने बयाँ की राय कुछ ऐसी कि ज़ीस्त ये
जाने कहाँ भटक गई, मैं भी सिमट गया.

जब राफ़ स़ाफ़ हो गये रिश्तों के पेंचोख़म
फिर भी लगा कि कुछ न कुछ इस दिल में घट गया.

बच्चे भी बैट-बॉल रख आये कहीं पे अब
मेरा भी स़ह्न देख दो हिस्सों में बट गया.

जो अब्तरी ए ज़ीस्त से उकता के डट गये
तक़्दीर मे जो सा़फ़ था लिख्खा पलट गया.

अब्तरी_बुरी दशा, स़ह्न_आँगन

___ Su’neel

ग़ज़ल

मुझको ज़िन्दगी की आदत है

ज़िन्दगी को मेरी मुझको ज़िन्दगी की आदत है
शिक़वा, ग़िला न मुहब्बत, फ़क़त रवायत है

एक शाम थी जो ताकती थी कभी राह मेरी
कुछ दिनों से उसने भी करी मुझसे बगावत है

तेरी आँखें रात गहरी, बिंदिया चाँद अधूरा सा
तेरी जुल्फें बहता दरिया, चाल उफ़्फ़ क़यामत है

सच को फेंक, अखबार को खोल, ले चाय की चुस्की
खबरों का ये खेल भी देखो जैसे कोई सियासत है

कही होली के रंग में भंग, कहीं ग़म ही मसर्रत है
कहीं बहती हैं मय की धारा, कहीं पानी भी हसरत है

एक अधूरी तेरी कहानी लिखे न कोई रोशनाई
सफ़हा-ए-दिल भी मेरी “पाक़ीज़ा” ज़रूरत है

ग़ज़ल

ग़ज़ल :साथ मेरे कभी...

साथ मेरे कभी रहो भी मियाँ
कुछ सुनाओ तो कुछ सुनो भी मियाँ.

चाँद बन जाओ या सितारे तुम
पर कभी तो फ़लक बनो भी मियाँ.

क्या है तुझमें,नहीं है क्या तुझमें
ये कभी ख़ुद से पूछ लो भी मियाँ.

तुम बहुत बोलते हो बढ़ चढ़कर
ये कमी दूर तुम करो भी मियाँ.

अब ये दारोमदार है तुम पर
तुम जहाँ हो वहाँ टिको भी मियाँ.

राय क़ाइम न दूर से करते
पहले सबसे मिलो जुलो भी मियाँ.

ज़िंदगी में कहाँ सुकून कभी
ठीक हीं है,चलो! है जो भी मियाँ.

__By su’neel

ग़ज़ल

ग़ज़ल : रिश्तों में जो थीं दरारें...

रिश्तों में जो थीं दरारें, भरने लगीं
पहले सा मैं, आप तब सी लगने लगीं.

चुप्पी सी थी इक ख़ला सा था बीच में
उम्मीद की वां शुआऐं दिखने लगीं.

अब ये जहाँ तेरी ज़़द में लगता है, लो!
आँचल में तेरे फ़िज़ाऐं छुपने लगीं.

जब फ़ासलों में पड़ीं थोड़ी सलबटें
ये क़ुर्बतें अपनी सब को खलने लगीं.

तू मेरी होगी, यकीं ये था क्योंकि इन
हाँथो में तुम सी लकीरें बनने लगीं.

किस जज्बे से तुम दुआएं करती हो वां
पहलू से अब यां बलायेें टलने लगीं.
__By su’neel

ग़ज़ल

ग़ज़ल : है शाद दिल ये बहुत...

है शाद दिल ये बहुत, पास पर सुबू ही नहीं
बगै़र मय के रगों में लगे लहू ही नहीं.

अब इश्क़ है तो ज़माने की देख ज़ू़दरसी
वो राज़ जान गया जिसपे गुफ़्तगू ही नहीं.

तुम्हारे शह्र में इक ऐब दिख रहा है मुझे
कि यां तो कू ए सनम सा कोई भी कू ही नहीं.

हजा़र लफ्ज़ हैं उल्फ़त के इस फ़साने में
अ़जीब ये कि कहीं लफ्ज़ ‘आरजू ही नहीं.

दो चार गाम पे मंज़िल मिली है किसको यहाँ
मेरे हिसाब से तुमने की जुस्तुजू ही नहीं.

__By su’neel

ज़ूदरसी – तह तक जाना
सुबू – शराब आदि का मटका
कू-गली, गाम-कदम

ग़ज़ल

पहले पहले


तेरी इक इक बात भुलाने से पहले
जलाया है खुद को तेरे खत जलाने से पहले

तुझको तो याद भी न होगा तू तो रूठ ही रहा

ग़ज़ल