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ग़ज़ल : रिश्तों में जो थीं दरारें...

रिश्तों में जो थीं दरारें, भरने लगीं
पहले सा मैं, आप तब सी लगने लगीं.

चुप्पी सी थी इक ख़ला सा था बीच में
उम्मीद की वां शुआऐं दिखने लगीं.

अब ये जहाँ तेरी ज़़द में लगता है, लो!
आँचल में तेरे फ़िज़ाऐं छुपने लगीं.

जब फ़ासलों में पड़ीं थोड़ी सलबटें
ये क़ुर्बतें अपनी सब को खलने लगीं.

तू मेरी होगी, यकीं ये था क्योंकि इन
हाँथो में तुम सी लकीरें बनने लगीं.

किस जज्बे से तुम दुआएं करती हो वां
पहलू से अब यां बलायेें टलने लगीं.
__By su’neel

ग़ज़ल

ग़ज़ल : है शाद दिल ये बहुत...

है शाद दिल ये बहुत, पास पर सुबू ही नहीं
बगै़र मय के रगों में लगे लहू ही नहीं.

अब इश्क़ है तो ज़माने की देख ज़ू़दरसी
वो राज़ जान गया जिसपे गुफ़्तगू ही नहीं.

तुम्हारे शह्र में इक ऐब दिख रहा है मुझे
कि यां तो कू ए सनम सा कोई भी कू ही नहीं.

हजा़र लफ्ज़ हैं उल्फ़त के इस फ़साने में
अ़जीब ये कि कहीं लफ्ज़ ‘आरजू ही नहीं.

दो चार गाम पे मंज़िल मिली है किसको यहाँ
मेरे हिसाब से तुमने की जुस्तुजू ही नहीं.

__By su’neel

ज़ूदरसी – तह तक जाना
सुबू – शराब आदि का मटका
कू-गली, गाम-कदम

ग़ज़ल

पहले पहले


तेरी इक इक बात भुलाने से पहले
जलाया है खुद को तेरे खत जलाने से पहले

तुझको तो याद भी न होगा तू तो रूठ ही रहा

ग़ज़ल

ग़ज़ल: यूँ ख़फ़ा भी...

यूँ ख़फ़ा भी कहाँ थे तब हम पर
तुम बहुत जाँ फ़िशाँ थे तब हम पर.

उन दिनों खेलते थे तारों से
तुम हुए आस्मां थे तब हम पर.

मन मुताबिक़ जहाँ में जी लेंगे
त़ारी कितने गुमां थे तब हम पर.

याद आई गली वो रूस्वाई
चीखते सब दहां थे तब हम पर.

हम तरद्दुद न इश्क़ के माने
वो जुनूं,हाँ जी हाँ थे तब हम पर.
__su’neel

ग़ज़ल

तुम्हारी यादें


इतवार का दिन, मीठी सुबह और नमकीन तुम्हारी यादें
खुशनुमा मौसम को कर के गयी ग़मगीन तुम्हारी यादें

फ़लक तक उड़ के जाये क्यों दिल परिंदा बे-पर मेरा
परवाज़ मेरी आवाज मेरी फिर शाहीन तुम्हारी यादें

भूला किये बरसों मगर भूला नहीं दिल तुमको कभी
तकल्लुफ़ करे या तअल्लुक़ रखे मिस्कीन तुम्हारी यादें

सर्द मौसम भीगी रातें सुर्ख़ चेहरा ज़र्द आँखें चाँद आलम
बिन पीये बहका किये झूमा किये रंगीन तुम्हारी यादें

सज़दे में पहरों बैठा किये हम सर झुका कर ‘पाकीज़ा’
हाज़िर रही पर काफ़िर रही ये बे-दीन तुम्हारी यादें

#पाकीज़ा

(शाहीन-बाज़, मिस्कीन-खामोश रहना)

ग़ज़ल

ग़ज़ल :आसान राहों पे ले आती है...

आसान राहों पे ले आती है मुझे
उसकी दुआ है, लग हीं जाती है मुझे.

ये शोर दिन का चैन लूटे है मेरा
औ’ रात की चुप्पी जगाती है मुझे.

किस किस को रोकूं कौन सुनता है मेरी
ये भीङ पागल जो बताती है मुझे.

कूचे में जो मज्कूर है उस्से अलग
दहलीज़ तो कुछ औ’ सुनाती है मुझे.

पहलू में मेरे बैठी है मुँह मोङ कर
ये ज़िन्दगी यूँ आजमाती है मुझे.

___Su’neel

ग़ज़ल

ग़ज़ल:कुछ हरी हैं कुछ हैं पीली...

कुछ हरी हैं कुछ हैं पीली कुछ हैं नीली तितलियाँ
कुछ तो इनमें हू ब हू दिखती हैं तुम सी तितलियाँ.

हम पकड़ लाते थे जो बचपन में जंगल से कभी
इन लबों की तितलियों सी थीं वो सारी तितलियाँ.

ये सुनहरी धूप औ’ ठंढी दिसम्बर की हवा
देखते बनतीं हैं ऐसे में ये प्यारी तितलियाँ.

झूमने बच्चे लगे हैं झुरमुटों को देख कर
कुछ हैं टूटे पंख वाँ औ’ कुछ सुहानी तितलियाँ.

एक मुद्दत से चमन में तुम न आये हो मेरे
आ भी जाओ राह तकतीं हैं तुम्हारी तितलियाँ.

…. Su’neel

ग़ज़ल