टैग्स » ग़ज़ल

खार-ओ-खस तो उठें, रास्ता तो चले - कैफ़ि आज़मी

खार-ओ-खस तो उठें, रास्ता तो चले
मैं अगर थक गया, काफ़ला तो चले

चांद, सूरज, बुजुर्गों के नक्श-ए-क़दम
खैर बुझने दो उनको हवा तो चले 15 और  शब्द

उर्दू शायरी

नज़राना - कैफ़ि आज़मी

तुम परेशान न हो बाब-ए-करम वा न करो
और कुछ देर पुकारूँगा चला जाऊँगा
इसी कूचे में जहाँ चाँद उगा करते हैं
शब-ए-तारीक गुज़ारूँगा चला जाऊँगा 24 और  शब्द

उर्दू शायरी

दो-पहर - कैफ़ि आज़मी

ये जीत-हार तो इस दौर का मुक्द्दर है
ये दौर जो के पुराना नही नया भी नहीं
ये दौर जो सज़ा भी नही जज़ा भी नहीं 26 और  शब्द

उर्दू शायरी

दायरा - कैफ़ि आज़मी

रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे
फिर वहीं लौट के आ जाता हूँ
बारहा तोड़ चुका हूँ जिन को
इन्हीं दीवारों से टकराता हूँ
रोज़ बसते हैं कई शहर नये

उर्दू शायरी

तुम परेशां न हो - कैफ़ि आज़मी

दस्तूर[1] क्या ये शहरे-सितमगर[2] के हो गए ।
जो सर उठा के निकले थे बे सर के हो गए ।

ये शहर तो है आप का, आवाज़ किस की थी 14 और  शब्द

उर्दू शायरी

तुम परेशां न हो - कैफ़ि आज़मी

तुम परेशां न हो बाब-ए-करम-वा न करो
और कुछ देर पुकारूंगा चला जाऊंगा
इसी कूचे में जहां चांद उगा करते थे
शब-ए-तारीक गुज़ारूंगा चला जाऊंगा 20 और  शब्द

उर्दू शायरी

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो - कैफ़ि आज़मी

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो

आँखों में नमी हँसी लबों पर
क्या हाल है क्या दिखा रहे हो

उर्दू शायरी