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अच्छा लगा

आज फिर मुस्कुराना अच्छा लगा
आज फिर चाँद का आना अच्छा लगा

अच्छा लगा तुमसे मिलकर मुझे
आज फिर खुद से बिछड़ जाना अच्छा लगा

नींद की डिबिया से निकाले है ख़्वाब पुराने
आज फिर खुद को सुलाना अच्छा लगा

फूल पत्तियों से सजाई है मेहँदी मैंने
आज फिर लकीरें मिटाना अच्छा लगा

ग़ज़ल

सर्द हाल सर्दी का

होली से पहले गर हमे नहाना होगा
समझो ये शरीर छोड़ कर जाना होगा

जिनकी छतों पे आयेगी धुप सुनहरी
अब बस उनके घर ही आना जाना होगा

पकोड़ी-चाय टिक्की समोसा गुलाब जामुन
अब इन के सिवा कुछ भी न खाना होगा

आ जाना आग तापने चाहे जब दोस्तों
मूंगफली का छिकल तुमको ही उठाना होगा

आगाज़-ए-मौसम है सर्द इतना अगर
कहो फिर कैसे अंजाम तक निभाना होगा

#पाकीज़ा

ग़ज़ल

मैंने

तारीख़ बन कर काटा है फांसला
तेरे जनवरी से दिसंबर होने का मैंने

हर वजह को बे-वजह बताया है
तेरी याद में दिन रात रोने का मैंने

धड़कनों को बना कर रेशम रेशम
सीखा है हुनर ग़म पिरोने का मैंने

दुनिया की हर शय है मिली मगर
पाया है लाइलाज़ ज़ख्म खोने का मैंने

भीगी रातों में तकिये से छुप कर
किया है झूठा बहाना सोने का मैंने

ग़ज़ल

क़ुबूल हो जायेगी

झुका है सजदे में जो सर क़ुबूल हो जायेगी
दुआ भी क़र्ज़ है उस पर वसूल हो जायेगी

अना को झाड़ के लाना तुम अपने फूलों से
ये गुल-ओ-गुलशन हैं जो फ़ुज़ूल हो जायेगी

चलोगे दिल के जो ज़ानिब तो देख पाओगे
ये ज़िन्दगी ही तुम्हारी उसूल हो जायेगी

बचा सको तो बचा लो तुम अपने ईमां को
रवायतों का है क्या ये धूल हो जायेगी

हैं ‘पाकीज़ा’ जो निगाहें वो उसका आईना
जो देखो गौर से धड़कन रसूल हो जायेगी

ग़ज़ल

अच्छा

प्यार में रूठना मनाना अच्छा
प्यार है तो खुद को मिटाना अच्छा

बहती हैं जो हवायें बे-सबब बे-निशाँ
उन हवाओं का रुक जाना अच्छा

रात की चादर को फेंक कभी
चाँद का मुँह मोड़ के जाना अच्छा

चंद फांसलें भी गर न मिटा पाये कदम
तो सदियों का फांसला रह जाना अच्छा

ज़िन्दगी क़ैद है उम्र भर के लिए
हम महोब्बत वालों का मर जाना अच्छा

ग़ज़ल

क्या

बात थी कोई बात से निकली, बात ही थी बात का क्या
दिल में था कोई आधा-अधूरा जो भी था ज़ज़्बात का क्या

साँझ की आख़री बाज़ी पर, मैंने लगाया रात का दाव
जीत गए तो सुबह मिलेगी, हार गये तो रात का क्या

हमने जिसको समझा था साथी,वो निकला भटका सा मुसाफ़िर
दिल के बदले मिली जो हमको, ग़म की उस सौगात का क्या

तेरे ही दर पे, तेरी शिक़ायत, कैसे करूँ, तू ही है मसीहा
जीने की तूने मुझको सज़ा दी, क़ातिल तेरी जात का क्या

मिल जाए तो कब्र में अपनी ‘पाकीज़ा’ तेरी चाहत रख लूँ
बीत गयी है जितनी थी मेरी, बाक़ी बची हयात का क्या

ग़ज़ल

तमाम हों

शिकायतें तमाम हों, अदावतें तमाम हो
मिलो अगर तो इस कदर, मुहोब्बतें तमाम हों

मेरी नज़र के रूबरू तेरी नज़र जो आ टिके
कहे ये दिल या न कहे, हिकायतें तमाम हों

कभी अगर जो ऐसा हो कि तुम बनो मेरे हमसफ़र
रहे कोई फिर रहगुज़र, जसारतें तमाम हों

सर सज़दे में झुके रहे, तेरे दर पे ही खड़े रहे
सुने जो तू इक आरज़ू, सखावतें तमाम हों

तेरा ख़्वाब जिस निगाह मे वो ‘पाकीज़ा’ निगाह है
तेरा नूर जो मिले हमे, क़यामतें तमाम हों

ग़ज़ल