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दर्द 


ये जो दर्द है बेदर्द है
इस दर्द का न हमदर्द है

बड़ी सुर्ख़ हैं खामोशियाँ
मेरे लफ्ज़ सब अब ज़र्द है

कुछ रौशनी भी सुस्त है
हवा भी तो अब सर्द है

सब ख़्वाब मेरे खो गए
केसी वक़्त की ये गर्द है

मेरा ज़िस्म ग़म ‘पाकीज़ा’
मेरी रूह मेरा दर्द है

ग़ज़ल

कोई सूरज फिर ज़िला दो


कोई सूरज फिर जिला दो मन ये सीला सीला है
अबके सावन जम के बरसा अब्र गीला गीला है

सुर्ख़ रंग की चांदनी और रात ज़ाफ़रानी है
आज अम्बर के ही जैसा ग़म भी नीला नीला है

इश्क कोई खार जैसा दिल पे मेरे चुभ गया
जख़्म तो हर भर गया पर दाग़ पीला पीला है

मेरे पहलु में सिमट कर बैठी हैं खामोशियाँ
कोई आवाज़ें लगाओ ख्वाब छीला छीला है

तेरे पेच-ओ-ख़म के सदके जाऊँ मैं ‘पाकीज़ा’
तेरी आँखें हैं समंदर, दिल ख़ुश्की-ए-साहिला है

ग़ज़ल

दिल की कहानी


दिल की कहानी, दिल की जुबानी
दिल तक जो पहुँचे, आये रवानी

साहिल जो छूटा, सागर ने लूटा
मौजों में बह गया, नदिया का पानी

सपने अधूरे , किस्से अधूरे
आधा था बचपन, आधी जवानी

कोई क्या जाने, क्यों हम दीवाने
सहते ही रहते हैं, पीड़ बेगानी

कान्हा की राधा, राधा का मोहन
गलियों में नाचे क्यों, मीरा दीवानी

ग़ज़ल

मैं आज़ाद नहीं हूँ

जश्न आज़ादी का मनाती हूँ मगर मैं आज़ाद नहीं हूँ
यूँ तो खुशहाल नज़र आती हूँ मगर मैं आज़ाद नहीं हूँ

मेरे चेहरे को जो देखोगे तो पाओगे बंटवारे के निशाँ
ग़म गुज़रा भूल जाती हूँ मगर मैं आज़ाद नहीं हूँ

मुझे गैरों से शिकायत नहीं बस अपनों से गिला है
कहने को माँ कहलाती हूँ मगर मैं आज़ाद नहीं हूँ

मुझे कोख़ में दफना कर करते हैं सरहदों की लड़ाई
मिट्टी आज़ाद दिखाती हूँ मगर मैं आज़ाद नहीं हूँ

मेरी नदियों का पाक पानी भी अब रोता है ‘पाकीज़ा’
खुद को आज़ाद बताती हूँ मगर मैं आज़ाद नहीं हूँ

ग़ज़ल

जिसे अहदे-वफ़ा मालूम होगा
उसे मेरा पता मालूम होगा !!

निगाहें फेर कर गुज़रा हैं मुझसे
यक़ीनन वो खफ़ा मालूम होगा !!

गिरेंगें अश्क़ मेरे जिस जगह भी
वहाँ जलता दिया मालूम होगा !!

हमारे बाद तुमको ज़िंदगी में
हमारा मर्तबा मालूम होगा !!

कभी मुझसे गुज़र कर देख लेना
वहाँ भी रास्ता मालूम होगा !!

उसे तुम मुँह ज़ुबानी याद रक्खो
वो कलमा और दुआ मालूम होगा !!

उसे ग़ैरों में गर शामिल करूँगा
उसे कितना बुरा मालूम होगा !!

मुझे गहराई से समझोगे जितना
नया ही फलसफ़ा मालूम होगा !!

वही समझेंगा यूसुफ़ लफ्ज़े-माँ को
कि जिसको तर्ज़ुमा मालूम होगा !!

ग़ज़ल

दिल में तेरे

क्या जाने किस रास्ते से गुज़र के आये हैं दिल में तेरे
तुझे खबर क्या ओ बेखबर बिखर के आये हैं दिल में तेरे

तेरी तमन्ना तेरी गुजारिश तेरी मुहोब्बत तुझे मुबारक
हमे गिला है ओ जानेमन हम उतर के आये हैं दिल में तेरे

कभी कभी तो ये दिल है दरिया कभी ये दिल है जनम का प्यासा
कैसे बताएं तुझे ए हमदम किधर के आये हैं दिल में तेरे

है काली रातें मेरी सहेली सुबह से मुझको कुछ बैर यूँ हैं
झपक ले आँखें ये रस्म-ए-उल्फ़त के डर के आये हैं दिल में तेरे

है ‘पाकीज़ा’ ये दिलों की राहें इनमे मुकद्दर का रंग दूजा
अहल-ए-हुनर को आने न पाये नज़र के आये हैं दिल में तेरे

ग़ज़ल