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भूख मरती नहीं, मर जाता है आदमी

भूख मरती नहीं, मर जाता है आदमी

पेट भरा हो तो तर जाता है आदमी

भूख जब तक है, जिन्दा रहेगी दुनिया

पेट थकती नहीं, थक जाता है आदमी.

आग ये किसने लगाई कुछ पता नहीं

धधकता पेट है, जल जाता है आदमी

रोटी छीनने वालों की है भीड़ यहां

चांद पर टकटकी लगाता है आदमी

धोखा भूख को देने का हुनर सीख लिया

अब ग़म पीता, ग़म खाता है आदमी।

बचपन के खेलों में

आ पास ज़रा टटोल कर देख तो मुझको,
शायद मुझमें भी कहीं तुझ जैसी रोशनी हो |
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बचपन के खेलों में छुपा इक मासूम सा जहाँ है
ये सोच क्या था चाहा, ये भी देख क्या मिला है |

हर तरफ तमाशबीन, अलग अलग ऐनकें लगाए,
आँखों में काश चुभता, जो घर जलने का धुँआ है |

ना तय हो सका कि कुछ हमारे बीच था क्या,
कोई रंजिश नहीं है उस से, बस इक यही गिला है |

चुनिंदा लफ़्ज़ों में ही ये पूरी दास्तां बयाँ है,
मैं बिजली की कौंध सा हूँ, अभी है अभी फ़ना है |

Poetry

हम गुनहगार हो गए

वो जुल्म करता रहा
बदनाम ना हुआ,
हम इक सवाल करके
गुनहगार हो गए।

वो मिलाता रहा नज़रें
हर इक कमसिन से,
हमने इक नज़र क्या देखा
बेज़ार हो गए।

उसने किए सवाल
कई गफ़लत में,
मिरे सवाल सारे
तलवार बन गए।

उसके लिए थे फूल
बिछे गलियों में,
मिरे ख़ातिर
काँटों के हार बन गए।

उसकी गालियाँ भी
लगती थीं नेमतें,
और मिरे सजदे भी
ख़ार बन गए।

वो जुल्म करता रहा
बदनाम ना हुआ,
हम इक सवाल करके
गुनहगार हो गए।

कविताएँ, Poetry

ज़ुल्मते-शब की सहर हो जाएगी
शिद्दते-ग़म चारागर हो जाएगी

रोनेवाले यूँ मुसीबत पर न रो
ज़िंदगी इक दर्दे-सर हो जाएगी

बाद-ए-तामीर-ए-मकाँ ज़ंजीरे-ग़म
उल्फ़त-ए-दीवार-ओ-दर हो जाएगी 31 और  शब्द

ग़ज़ल

नज़रों में हया दिल में मोहब्बत बन के रहते हैं।

नज़रों में हया दिल में मोहब्बत बन के रहते हैं।
हम तुझमें सनम आदत बन के रहते हैं॥

जी चाहे तब खोल के पढ़ लेना हमें।
तेरे तकिये के नीचे हम ख़त बन के रहते हैं॥

इश्क उस पाक अहद का नाम है।
दो शख़्स इक दूजे की ज़रूरत बन के रहते हैं॥

ये मेरी मोहब्बत नहीं तो फिर क्या कहूँ।
हम उन के चेहरे की ज़ीनत बन के रहते हैं॥

ज़माना सरे राह टोकने लगा है उन्हें।
क्यों आजकल वो हम सा बन के रहते हैं॥

जिधर भी रुख़ करोगे हमें ही पाओगे।
हम दिलजलों की महफिल में रंगत बन के रहते हैं॥

दोस्तों में महकते हैं साँसें बनकर।
दुश्मनों के ज़ेहन में अदावत बन के रहते हैं॥

ग़ज़ल

इन निगाहों में मोहब्बत का नूर नज़र आता है।

इन निगाहों में मोहब्बत का नूर नज़र आता है।
तू कभी पास नज़र आता है कभी दूर नज़र आता है॥

मेरी ज़िन्दगी में तेरी अहमियत क्या बताऊँ तुझे।
तेरे नाम से चेहरा सुर्ख़ दिल में सुरूर नज़र आता है॥

ये पलकों की नमी बेवजह नहीं है।
तू मुझे कहीं से टूट कर चूर नज़र आता है॥

तेरा हर ज़ख्म मेरे जिस्म का ज़ेवर बना दे ए दोस्त।
तू मुझे बङा बेबस, मजबूर नज़र आता है॥

कुछ कहना चाहती हैं पर कह नहीं पाती।
तेरी आँखों में एक सवाल ज़रूर नज़र आता है॥

तेरी हस्ती को अपनी दहलीज़ का  पत्थर समझ लिया।
यहाँ हर शख्स मुझे बङा मगरूर नज़र आता है॥

ग़ज़ल

इश्क में पहले से अन्दाज़ नहीं होते।

इश्क में पहले से अन्दाज़ नहीं होते।
जज़्बात लफ्ज़ों के मोहताज नहीं होते॥

ये वो ज़ुबाँ है जो आँखों से बयाँ होती है।
इसमें हर्फ-ओ-अल्फाज़ नहीं होते॥

मुफ़लिसी तो मुस्कुराने का हुनर सिखाती है।
कौन कहता है गमजदा खुशमिज़ाज़ नहीं होते॥

सफ़र की हद हौसले तय करते हैं।
परों से कभी परवाज़ नहीं होते॥

हम उनसे जो उनसा बन के मिल लेते।
तो शायद वो हमसे नाराज़ नहीं होते॥

दिलों के बाज़ार में खुद को बेच ना पाए।
वरना हम भी मोहब्बत के मोहताज नहीं होते॥

ग़ज़ल