टैग्स » ग़ज़ल

दिल लगाकर कव किसी को चैन यारों मिल सका है

जिंदगी ने जिस तरह हैरान हमको कर रक्खा है
मन कभी करता है मेरा जिंदगी की जान ले लूँ

दिल लगाकर कव किसी को चैन यारों मिल सका है
पूजते पत्थर जहाँ में, मैं पत्थरों की शान ले लूँ

हसरतें पूरी हो जव तो खूब भाती जिंदगी है
ख्वाव दिल में पल रहे शख्श के अरमान ले लूँ

प्यार की बोली लगी है अब आज के इस दौर में
प्यार पाने के लिए क्या कीमती सामान ले लूँ

हर कोई अपनी तरह से यार जीवन जी रहा है
जानकर इसको “मदन “जिंदगी का गान ले लूँ

दिल लगाकर कव किसी को चैन यारों मिल सका है
मदन मोहन सक्सेना

Poem

प्यार ने तो जीबन में ,हर पल खुशियों को बिखेरा है

खुशबुओं की बस्ती में रहता प्यार मेरा है
आज प्यारे प्यारे सपनो ने आकर के मुझको घेरा है
उनकी सूरत का आँखों में हर पल हुआ यूँ बसेरा है
अब काली काली रातो में मुझको दीखता नहीं अँधेरा है

जब जब देखा हमने दिल को ,ये लगता नहीं मेरा है
प्यार पाया जब से उनका हमने ,लगता हर पल ही सुनहरा है
प्यार तो है सबसे परे ,ना उसका कोई चेहरा है
रहमते खुदा की जिस पर सर उसके बंधे सेहरा है

प्यार ने तो जीबन में ,हर पल खुशियों को बिखेरा है
ना जाने ये मदन ,फिर क्यों लगे प्यार पे पहरा है

मदन मोहन सक्सेना

Poem

दर्द मुझसे मिलकर अब मुस्कराता है

दर्द मुझसे मिलकर अब मुस्कराता है

बक्त कब किसका हुआ जो अब मेरा होगा
बुरे बक्त को जानकर सब्र किया मैनें

किसी को चाहतें रहना कोई गुनाह तो नहीं
चाहत का इज़हार न करने का गुनाह किया मैंने

रिश्तों की जमा पूंजी मुझे बेहतर कौन जानेगा
तन्हा रहकर जिंदगी में गुजारा किया मैंने

अब तू भी है तेरी यादों की खुशबु भी है
दूर रहकर तेरी याद में हर पल जिया मैनें

दर्द मुझसे मिलकर अब मुस्कराता है
जब दर्द को दबा जानकार पिया मैंने

मदन मोहन सक्सेना

Poem

मुकम्मल जहाँ

सपने, कविता ,ग़ज़ल, शायरी में तो जमीं आसमां अौ सारे जहाँ मिल जाते हैं..

पर उनसे बाहर निकलो , तब मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता ।

चंद पंक्तियाँ

एक ग़ज़ल 

जिस रोज़ मिलना मेरे सिरहाने,
आँखों में काजल मत लगाना
और ना ही दिल पर ताले।
फैल जाएगा काजल तुम्हारा
इन झील जैसी आँखों के किनारे ,
और टूट जाएँगे सारे ताले
चाहे दिल के हों या ज़ुबाँ पर।

– सहर

Shayri

ग़ज़ल : जिस तर्ह वो मिला...

जिस तर्ह वो मिला, गले से भी लिपट गया
कब ये लगा कि दिल वो कभी था उचट गया.

उसने बयाँ की राय कुछ ऐसी कि ज़ीस्त ये
जाने कहाँ भटक गई, मैं भी सिमट गया.

जब राफ़ स़ाफ़ हो गये रिश्तों के पेंचोख़म
फिर भी लगा कि कुछ न कुछ इस दिल में घट गया.

बच्चे भी बैट-बॉल रख आये कहीं पे अब
मेरा भी स़ह्न देख दो हिस्सों में बट गया.

जो अब्तरी ए ज़ीस्त से उकता के डट गये
तक़्दीर मे जो सा़फ़ था लिख्खा पलट गया.

अब्तरी_बुरी दशा, स़ह्न_आँगन

___ Su’neel

ग़ज़ल

ग़ज़ल :साथ मेरे कभी...

साथ मेरे कभी रहो भी मियाँ
कुछ सुनाओ तो कुछ सुनो भी मियाँ.

चाँद बन जाओ या सितारे तुम
पर कभी तो फ़लक बनो भी मियाँ.

क्या है तुझमें,नहीं है क्या तुझमें
ये कभी ख़ुद से पूछ लो भी मियाँ.

तुम बहुत बोलते हो बढ़ चढ़कर
ये कमी दूर तुम करो भी मियाँ.

अब ये दारोमदार है तुम पर
तुम जहाँ हो वहाँ टिको भी मियाँ.

राय क़ाइम न दूर से करते
पहले सबसे मिलो जुलो भी मियाँ.

ज़िंदगी में कहाँ सुकून कभी
ठीक हीं है,चलो! है जो भी मियाँ.

__By su’neel

ग़ज़ल