टैग्स » चाहत

मै चाहता हूँ

सारे बंधन वफाओ के अब तोड़ना चाहता हूँ

ये दिल तड़पना छोड़ दे उसके लिए मै चाहता हूँ

 

आते है ख्वाब उसके शब् भर यूं के

नींद को ही मै अब भुलाना चाहता हूँ

 

नसीब में है नहीं वो जानकर ये

हाथो की लकीरों को मिटाना चाहता हूँ

 

चाहतो की हवा चलती नहीं यहाँ अब

गमो का रुख ही अपनी ओर मोड़ना चाहता हूँ

कुछ ग़ज़ल जैसा

हर कोई चाहता है ।

हर कोई चाहता है प्रेम मगर,
क्या हर कोई करता है प्यार ?
अगर करोगे प्यार तो पाओगे प्यार ।

हर कोई चाहता है सहारा आपत्तिमें,

POEM