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तुमको देखे हुए ग़ुज़रे हैं ज़माने आओ

तुमको देखे हुए ग़ुज़रे हैं ज़माने आओ
उम्र-ए-रफ़्ता का कोई ख़्वाब दिखाने आओ

मैं सराबों में भटकता रहूँ सहरा-सहरा
तुम मेरी प्यास को आईना दिखाने आओ। 9 more words

All Ghazal

अजनबी चाहत.....कमल भंसाली

कुछ दूर ही, हम चले
साथ कब बैठे
अजनबी राहों में
मिलकर जुदा ही है, होना
एक पल को
तुमको पाकर, है, खोना
दूसरे पल का रहेगा, इंतजार
फिर, कभी, इस राह गुजरना

अजनबी होकर भी
अच्छे लगे
कुछ कशिश है, तुम में
साथ ओर भी चलते
पर, सपने तो
कभी कभी
नयनों की झील में
हंस की तरह
धवल होकर तैर ते
किसी एक की
मुस्कान पर, दिल में
एक साथ, इतने
“कमल”
कभी कभी ही खिलतें

होता कोई, छोटा सा
एक ख्याल
जो, दिल रखता संभाल
फूल अज्ञेय प्यार का
जब खिलकर, कुम्हलाता
तो खुले आसमां को
चमकने की
फरेबी सी सौगात
दे जाता
फिर कभी मिलने की
आहत चाहों की
उलझन, भरी राहें
तय करने, छोड़ जाता
बिछोह के कितने
दर्द फिजा में, बिखेर जाता

एक अजनबी मुस्कान
सुर्ख होठों पर
जब स्पर्श करती
जिंदगी बिन स्पंदन
एक क्षण को
ठहर कर, उस क्षण कों
अनेकश, सलाम करती….

कमल भंसाली

तेरे एहसास है पास मेरे!!

ऐसा पहली बार हुआ नहीं,
कुछ नया हुआ नहीं,
सोच हर बार की तरह,
है उसी मोड़ पर खड़ी,
तेरी मौजूदगी है नहीं,
फिर भी तेरे एहसास है पास मेरे!!

सपना है ये जनता हूँ,
सच सा लगता है मुझे,
सपनो की दुनिया में जी रहा,
खुद को पूरा सा महसुस कर रहा,
तुझको न पाकर मैं हार रहा,
लेकिन ज्यादा गम न है दिल में मेरे!!

थी मेरे दिल में तू,
जिस दिन से मैंने देखा तुझे,
कोशिश की भुला दूँ तुझे,
बस मेरा न चला उसपर,
रहेगी तू दिल में मेरे,
जब तक चलेंगे साँस मेरे!!

कुछ नया है नहीं,
है सब कुछ वैसा ही,
देखा जिस दिन से तुझे,
चाहत मेरी गयी नहीं,
तेरी मौजूदगी है नहीं,
फिर भी तेरे एहसास है पास मेरे!!

Hindi Poem

चाहत

अभी तो तुझसे मिली हूँ मैं,
अभी तो हाँ खिली हूँ मैं.
अभी तो चाँद बनी हूँ मैं,
अभी तो महफ़िल में जली हूँ मैं.
अभी न मुझसे ऐसी बात कर,
ए मुसाफिर, मुझे बाँध कर.
अभी तो आँख लड़ी है ये,
अभी तो साँझ ढली हैं ये .
थोड़ा और खुमार चढ़ने दे,
अभी तो साँसे बहकी हैं ये.
मुझे ना, घर की राह दिखा,
ना, बाबुल का नाम बता.
अभी तो प्यास जगी है मेरी,
अभी तो चाहत बढ़ी है मेरी.

परमीत सिंह धुरंधर

Love

एक बचपन का जमाना था,
जिस में खुशियों का खजाना था..
चाहत चाँद को पाने की थी,
पर दिल तितली का दिवाना था..
खबर ना थी कुछ सुबहा की,
ना शाम का ठिकाना था..
थक कर आना स्कूल से,
पर खेलने भी जाना था…
माँ की कहानी थी,
परीयों का फसाना था..
बारीश में कागज की नाव थी,
हर मौसम सुहाना था..

चाँद

चाहत

तेरी पलकों में जी लूँ,
मैं अपने सपनों की साँसे.
मेरी पलकों में तू रख दे,
अपनी साँसों के सपनें.
अँधेरी राहों में तू चले,
मेरी बाहों को थाम के.
तेरी बाहों के सहारे,
मैं काटूं जीवन के अपने अँधेरे.
तेरे ख़्वाबों को,
मैं हकीकत बना दूँ.
तू मेरे हकीकत में,
ख़्वाबों का रंग भरें.

परमीत सिंह धुरंधर

Love