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मै चाहता हूँ

सारे बंधन वफाओ के अब तोड़ना चाहता हूँ

ये दिल तड़पना छोड़ दे उसके लिए मै चाहता हूँ

 

आते है ख्वाब उसके शब् भर यूं के

नींद को ही मै अब भुलाना चाहता हूँ

 

नसीब में है नहीं वो जानकर ये

हाथो की लकीरों को मिटाना चाहता हूँ

 

चाहतो की हवा चलती नहीं यहाँ अब

गमो का रुख ही अपनी ओर मोड़ना चाहता हूँ

कुछ ग़ज़ल जैसा

हर कोई चाहता है ।

हर कोई चाहता है प्रेम मगर,
क्या हर कोई करता है प्यार ?
अगर करोगे प्यार तो पाओगे प्यार ।

हर कोई चाहता है सहारा आपत्तिमें,

POEM

ख़याल

मैं चाहता तो हूँ कि ज़मीं आसमां एक कर दूँ,
इनकी मोहब्बत की दूरियां मिटा दूँ,
पर क्या करूँ मैं खुदा नहीं हूँ ना।
और खुदा होता तो भी
इंसान का ये कारनामा देख कर तो वाकई सिहर जाता,
रूह कांप जाती मेरी।।
पर क्या करूँ मैं इंसान हूँ।
मेरी फितरत है चीजों को भुलाना,
वक़्त को इस काबिल बनाना
कि वो मेरे जख्म भर सके।
मेरी ही फितरत है मतलबपरस्ती की ज़िंदगी बसर करना,
कौन कहता है सिर्फ जानवर ऐसा करते हैं,
नजरें उठाये, कोई मेरी तरफ भी तो देखे।।
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