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रिश्तों के ताजमहल

रिश्ते,
जो कभी
दिल की ज़मीन पर
भावनाओं की नमी पाकर
अंकुर की तरह फूट कर
बढ़ते थेऔर फिर
बरगद की तरह
ज़िन्दगी पर छा जाते थे,
अब दिल की जगह
फिट हो गयी मशीनों में बनते हैं।
अब रिश्ते उगते नहीं,
धीरे-धीरे बढ़ते नहीं,
अब उन्हें
नमी की भी ज़रूरत नहीं।
अब हर पल
बनते-बिगड़ते
और ख़त्म होते हैँ रिश्ते।
रिश्ते,
जो ज़िन्दगी के बाद भी
ज़िन्दा रहते थे
अब ज़िन्दगी भर भी साथ नहीं देते।
हर पल चोला बदलते हैं,
स्वार्थ की डोर पर
चमगादड़ से लटकते हैं,
अब रिश्ते दिलों में
महसूस नहीं किये जाते,
नुमायश में सजाये जाते हैं।
मेरे दोस्त!
आँखें खोल कर तो देखो
कैसे हर घर,
हर गली-मोहल्ले,
चौक-चौराहे
और हर मोड़ पर
शान से खड़े हैं आज
रिश्तों के ताजमहल !!

Rutba-E-Mohabbat - रुतबा-ऐ-मोहब्बत

उस पाक हुस्न की हर तारीफ, नापाक शरारत नही होती

हर बार सनम पे हक जतला देना, कोई हिमाकत नही होती

 

रहता है आशिकों के दिल में मोहब्बत का रुतबा बहुत ऊँचा

The Ghost

ताजमहल

ताजमहल

ताज तेरे लिए इक मज़हर-ए-उल्‍फ़त ही सही
तुमको इस वादी-ए-रंगीं से अक़ीदत ही सही
मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझसे

बज़्म-ए-शाही में ग़रीबों का गुज़र, क्या मानी ? 18 और  शब्द