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समर्पण

एक क्षण मे बदल जाता है जीवन जब समर्पण का होता है| एक माला, एक शब्द, एक तस्वीर| गुरु स्थान गुरु शब्द गुरु धर्म बन जाता है साधक का जीवन| जो इस अनमोल पल को भी ना समझ पाए तो वह जीवन जी कर भी विफल रहता है| समर्पण मन चित्त और खुलेपन का है|

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भाषा और मौन की परिभाषा.

भाषा क्या है.

इसे मैं आपको कुछ एस प्रकार समझाता हूँ. जैसे सामने कोई जापानीस आ जाये और वो कुछ बोलने लगे तो हम नहीं समझ सकते हैं. जिस प्रकार अगर कोई हिंदी बोलने वाला हमारे पास आ जाये  हमे समझ आता है. इसे भाषा कहते हैं.

अब मैं आपको अपने शब्दों मैं मौन का अर्थ बताता हूँ.

समझ लो हमारा दिमाग एक कंप्यूटर है. और एक कंप्यूटर सिर्फ जीरो और वन की भाषा समझता है. ऐसे ही कंप्यूटर मैं दो प्रकार की लैंग्वेज होती है. high लेवल प्रोग्रामिंग और लो लेवल प्रोग्रामिंग. ये दोनों प्रोग्रामिंग ही हमे स्क्रीन पर आउटपुट बताता है.

लो  लेवल प्रोग्रामिंग वो भाषा है जिसे हम आम बातचीत मैं इस्तेमाल करते हैं. और हाई लेवल पोर्ग्रम्मिंग वो भाषा है. जिसे हम समझते हैं. और अपने दिमाग को सही और गलत का फैसला लेने के लिए छोड़ देते है. दिमाग उसे समझता है और हमे सही और गलत का फैसला देता है.

अगर हम मों रहते हैं. तो दिमाग उसे अच्छे से समझ सकता है. इसलिए एक शिक्षक अपनी कक्षा मैं मौन रहने को कहता है. ताकि मन उसे अच्छे से समझ सके.

आगे मैं अपने ब्लॉग मैं कुछ नया लिखूंगा एस सम्बन्ध मे.

(16) चींटियों का दर्शन

लेखक :- अरुण गुप्ता

बाग़  में मेरी दृष्टि चींटियों को खाने में व्यस्त तीन चार चिड़ियों पर पड़ीI ऐसा करते देख मैंने उन्हें टोका तथा ज्ञान देते हुए कहा, “क्यों इन बेचारी चींटियों को खा रही होI ऐसा कर तुम पाप कर रही हो? तुम्हें पता है जिन्हें आज तुम खा रही हो कल तुम्हारे मरने के बाद यें ही तुम्हारे शरीर को खायेंगीI”

उन चिड़ियों ने मेरी और कुछ ऐसे देखा जैसे मैंने कोई विचित्र बात कह दी होI उनमें से एक बोली, “हम तो वही खा रहे है जो प्रकृति ने हमारे लिए निर्धारित किया हैI फिर इस बात की भी क्या गारंटी है यदि हम इन्हें खाना छोड़ दे तो यें भी हमारे मृत शरीर को नहीं खायेंगी क्योंकि हमारा मृत शरीर भी तो इनके लिए प्रकृति द्वारा निर्धारित भोजन मात्र ही हैI”

“और जहां तक पाप की बात है हम तो अपने मृत शरीर को इन चींटियों की आने वाली पीढ़ियों को खाने के लिए सौंपकर अपने पाप का कुछ तो प्रायश्चित्त अवश्य कर लेते हैं लेकिन क्या मृत्युपरांत तुम्हारा यह शरीर भी तुम्हारे द्वारा सताए गए किसी जीव या उसके किसी सगे संबंधी के काम आकर तुम्हारे पापों का कुछ भी प्रायश्चित्त करने में सक्षम है?”

उस चिड़िया की बात का मेरे पास कोई उत्तर नहीं था इसीलिए मैं वहां से चुपचाप हट गयाI

        

                            

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