सच्च मे भारत कभी विश्व गुरु ही था ,नीचे के स्कैन को डबल क्लिक कर देखें-

हिंदुस्तान-6 जनवरी2012

जब यूरोप के लोग नग्न रहते थे और पेड़ों पर शरण लेते थे हमारे भारत देश मे ज्ञान-विज्ञान का काफी विस्तार हो चुका था। उपरोक्त विवरण हमे बताता है कि लार्ड मैकाले की शिक्षा-व्यवस्था भारत के इसी ज्ञान-विज्ञान को गौड़ बनाने का उपक्रम थी। हमारे आज के विद्वान इस आधुनिक शिक्षा का गुण गाँन करते नहीं थकते हैं लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि जर्मनी के मैक्स मूलर साहब हमारे देश मे आकर 30 वर्ष रह कर पहले ‘संस्कृत’ सीख कर फिर मूल पांडु लिपियों को लेकर चले गए। उन्हीं के जर्मन अनुवादों से भौतिकी का परमाणु-विज्ञान और ‘दर्शन’ का मार्क्स वाद सृजित हुआ जिन्हें यूरोपीय सिद्धान्त कहा गया। वस्तुतः यह सब हमारे अतीत के ज्ञान का ही प्रतिफल था जिसका श्रेय बड़ी चालाकी से यूरोप के गोरे लोगों ने ले लिया। 20 more words