बात पिछले साल की है जब स्कूल की परंपरा के अनुसार मैंने भी अपनी बेटी  को उसके  जन्मदिन पर चोकोलेट और gift के साथ स्कूल  भेजा | स्कूल को पता नानी क्या बुरा लगा उन्होंने मुझे बुलाया और कहा की स्कूल  में विभिन्न आर्थिक वर्ग के लोग पढ़ते हैं और ऐसी परिस्थिति में गिफ्ट (मूल्य ३० रु) बांटना उचित नहीं है | मुझे उनका विचार अत्यंत सराहनीय , प्रशंसनीय तथा उल्लेखनीय लगा और अगली बार से  ऐसा नहीं होगा ; ऐसे शपथ लेकर  शर्मिंदगी के साथ  वापस घर  आ गया |

मगर ये क्या  अभी  स्कूल में book fair लगवाया गया है और  बच्चों को घर  से  पैसा  लाने  को  कहा  जा  रहा  है  ; ऐसा  भी  सुनने  में आया  है  की  बच्चों  में  ज्यादा  किताब  खरीदने की प्रतिस्पर्धा कराइ जा  रही है  | ये  सन्देश  बच्चों में  प्रसारित  किया  जा  रहा है  की जो  क्लास सबसे  ज्यादा  किताब  खरीदेगा  वो  प्रथम आएगा|  एक और विशेष बात ये  है  की  साड़ी  किताब  एक  ही प्रकाशन की  हैं  वो  भी  विदेशी |   अब  कहाँ गया  आर्थिक  समरसता का  विचार |

तीसरी  कक्षा  के  विद्यार्थी  की  अभिभावक  से  पैसा मांगने  के  लिए उकसाना  कहाँ तक  तर्कसंगत  है ?

क्या  इसमें स्कूल प्रबंधन का  व्यक्तिगत  आर्थिक  लाभ  तो  नहीं  है ?

क्या विदेशी ताकतों को आर्थिक  सहायता  पहुँचाने की  शाजिश  तो  नहीं ये ?

क्या हमारे  देश में बच्चों के लिए  किताबों का आभाव  है ?

क्या  ऐसा  कर  बच्चों  के  मन  में अपने  देश  के  प्रति  हीन भावना  का  बीज तो  नहीं  बोया  जा रहा  ?

मजेदार  बात  ये  है  की  ये  वही  स्कूल  है  जहाँ  मैंने  एक  अभिभावक  को  घिघटते हुए  देखा  की   मेरे  बच्चे  को  संस्कृत  पढने  दो  और  प्रबंधन  उसपर   जर्मन  या  फ्रेंच  पढने  का  दवाव  बना  रहा  था |

कौन  सी  शिक्षा  देना  चाह  रहे  है  ये ?

हमारे  राष्ट्र  के  भविष्य  के  बीज  को  भुनकर उससे  कौन  सी  फसल  तैयार  करना  चाहते  है ये ?

ऐसा प्रतीत  होता  है की स्कूल  आज बस परीक्षा  लेने  का कार्यालय मात्र  रह  गया  है |