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  सपने - कविता #Dream - Poetry

सपने तो सपने है

        कभी हँसाते , रूलाते , डराते , जगाते,

              जाने अनजाने सपने .
                     फ़िर भी  सपने तो सपने है.

                           पर बेहद अपने है.

लोहड़ी और मकर संक्रान्ति पर्व की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ आज का शुभ प्रभात

अरुण भोर सूरज की मनुहार सी करती

काँपती धूप को आगे करती

धुँध से छिपती छिपाती प्रकट होती |

मनों में नई उमंगें लिए नन्हे शिशु समान पंछी

मीठी चहचहाट के तार झनकारते

शरद धूप के साथ उतर आते अँगना में |

अरुण भोर की मनुहार से चमकता मुखमण्डल लिए

शीत प्रियतमा के साथ अठखेलियाँ करते

माघ के कोहरे का कम्बल लपेटे

उत्तरदिशा की ओर प्रस्थान करते भगवान भास्कर

अभिनन्दन करती ठिठुरती पवन को

भेंट में दे देते अपना कोहरे का कम्बल |

काँपती धूप के साथ आँखमिचौली खेलते / नृत्य दिखाते

ओस जमी घास पर पहर भर विश्राम करते |

नहीं सहन कर पाती शीत प्रियतमा

अपने प्रियतम से प्रहर भर का भी विछोह

पुनः ठिठुराती लास्य सा दिखाती आ जाती निकट

छीन लाती सौतन पवन से

प्रियतम सूर्य का कोहरे का कम्बल

छोड़ आती उसे रोने के लिए ओस के आँसू |

ले चलती निजं प्रियतम को रश्मि पथ से

दूर उत्तर दिशा में / प्यार से सहलाती / पुचकारती

दुबक जाते दोनों रात की गोद में

रचने को प्रेम का नवीन अध्याय |

और तब नीचे झाँकता चाँद

प्रेयसि चन्द्रिका के साथ रास रचाता

ओस के मोतियों से उसे सजाता

माघ की ठिठुरती काँपती रात को भी बाहों में भरता

हो जाता मगन प्रकृति के साथ रासलीला में |

उधर अरुण भोर

रात्रि शयन के बाद पुनः करती मनुहार अरुणदेव की

रात भर की रासलीला से थकित ठिठुरती प्रकृति को

नीचे आ दे दें जीवनदान…

हम सब भी साथ मिलकर मकर राशि में गोचर कर रहे उत्तरपथगामी भगवान भास्कर का अभिनन्दन करें, ताकि इस कड़ाके की ठण्ड में समस्त जड़ चेतन को धूप की गर्माहट के रूप में नवजीवन प्राप्त हो…  अग्नि प्रज्वलित कर खील-मूँगफली-रेवड़ी से हर सुबह उदित होने वाले दिनकर का स्वागत करें – ताकि सबके ही जीवन में सुखों की धूप खिल उठे… सूर्यदेव की उपासना करें कि हम सबकी बुद्धि से अज्ञान का अन्धकार दूर भगा ज्ञान का प्रकाश प्रसारित करें… और फिर लोहड़ी तथा मकर संक्रान्ति के पर्व की मस्तियों में खो जाएँ… सभी को आज लोहड़ी और कल मकर संक्रान्ति के पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ…

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमही धियो यो नः प्रचोदयात…

हिन्दी साहित्य

दिल में उतरेगी तो पूछेगी जुनूँ कितना है

दिल में उतरेगी तो पूछेगी जुनूँ कितना है
नोक-ए-ख़ंजर ही बताएगी कि ख़ूँ कितना है

आँधियाँ आईं तो सब लोगों को मालूम हुआ
परचम-ए-ख़्वाब ज़माने में निगूँ कितना है 18 और  शब्द

Poetry

सहचर

प्रेम – जो नहीं विकसित होगा अनायास ही |

रोपित करना होगा बीज परस्पर विश्वास का

देनी होगी खाद निस्वार्थ स्नेह की

सींचना होगा उसे समर्पण के जल से |

हो सकता है भाग्य साथ दे न दे

हो सकता है समय अनुकूल हो न हो

हो सकता है झकझोर दें इस पौधे को

अनिश्चितता और दुर्भावनाओं के भीषण झँझावात

हृदय बन जाएँ आवास अहंकार के अन्धकार का

आँखों पर पड़ जाए आवरण अधिकार भाव का |

किन्तु समस्त अनिश्चितताओं और दुर्भावनाओं के साथ ही

प्रवाहित होती रहती है / सद्भावों की भी मलय पवन

बस अहसास करना होगा उसकी मधुर गन्ध का |

अहम् के अन्धकार के साथ ही चलती है

प्रेम के प्रकाश की भी एक पतली सी किरण

बस देखना होगा उसे पूरे मनोयोग से |

अधिकार के आवरण के पीछे / कहीं बहुत भीतर

कहीं बहुत गहरे / हृदय की असीम गहराइयों में

छिपा होता है ऐसा कुछ विशिष्ट / ऐसा कुछ मधुर

जिसे चाहते हैं हम बाँटना / परस्पर / एक दूजे के साथ

बस करना होगा प्रयास उसे पहचानने का

और प्रयास नहीं होता सदा ही सरल |

किन्तु सत्य है यह भी

कि तज दिया प्रयास / तो नहीं होगा हासिल कुछ भी |

करेंगे सतत प्रयास पहचानने का / अपने भीतर के उस “विशिष्ट” को

जिसे चाहते हैं हम बाँटना आपस में

तो विकसित होगा परस्पर सामंजस्य

छंट जाएगा अहंकार का घना अन्धकार

हट जाएगा अधिकार भाव का भी आवरण

और तब रोप देंगे बीज परस्पर विश्वास का

डालेंगे उसमें खाद परस्पर स्नेह की

सींचेंगे उसे समर्पण के जल से |

और तब प्रस्फुटित होंगी प्रेम की नवीन कोंपलें

जिनसे विकसित होगा स्नेह का नन्हा पौधा

जो बन जाएगा धीरे धीरे प्रेम का विशाल वृक्ष |

प्रेम – जो है ईश्वर की दी हुई एक ऐसी भेंट

जिसका नहीं कोई मोल / और न ही कोई अहंकार

जहाँ नहीं भावना किसी पर अधिकार की

यदि कुछ है तो वह है

केवल और केवल अलौकिक प्रेम का भाव

जो होता है मासूम बच्चों जैसा / अल्हड़ किशोर जैसा

मतवाला युवाओं जैसा / और गम्भीर बुजुर्गों जैसा

और तब मानवता हो जाती है धन्य |

तो क्यों न सारे अहंकार और अधिकार भाव को तज

करें आराधन ऐसे निस्वार्थ प्रेम का

क्योंकि यही तो है सहचर समूची मानवता का…

हिन्दी साहित्य

मूर्त

इस विशाल ब्रह्माण्ड में मैं क्या हूँ / शायद कुछ भी नहीं |

शायद कहीं होगा कोई एक छोटा सा शून्य

और उस छोटे से शून्य के मध्य

मैं – एक छोटा सा बिन्दु

शायद एक अत्यन्त सूक्ष्मातिसूक्ष्म अणु

जिसे ढूँढ़ पाना भी मुश्किल |

लेकिन फिर भी मैं हीन नहीं हूँ

लेकिन फिर भी मैं क्षीण नहीं हूँ

क्योंकि मैं ही तो हूँ ऊर्जा का भौतिक रूप |

ऊर्जा – जो पदार्थ बनने के क्रम में

हो जाती है विभक्त अनेक रूपों में |

ऊर्जा के विस्फोट से उपजे

उन्हीं अनेक रूपों में से एक हूँ मैं

असंख्य आकाशगंगाओं के मध्य भटकती

मेरी अपनी ही आत्मा का भौतिक स्वरूप |

आँखों में सँजोए अनगिनती सपने

मन में लिए लाखों इच्छाएँ

बार बार खोती हूँ – विलीन हो जाती हूँ

अपने ही शून्य में

लेकिन पुनः धारण कर लेती हूँ यही भौतिक रूप

क्योंकि इस भौतिक तत्व की ही होती हैं इच्छाएँ – आकांक्षाएं |

कुछ और पाने की चाह में

उगा लेती हूँ पंख अपने मन के साथ

और उड़ती जाती हूँ तलाशने को नित नए क्षितिज |

क्योंकि नश्वर होते हुए भी

अपना अहम् तो मैं ही हूँ…..

उस शाश्वत सत्य का / उस अप्रतिम ऊर्जा का

मूर्त रूप तो मैं ही हूँ……….

हिन्दी साहित्य

शुभ प्रभात

मंज़िल का भान हो न हो / पथ का भी ज्ञान हो न हो

आत्मा – हमारी अपनी चेतना / नित नवीन पंख लगाए

सदा उड़ती ही जाती है / सतत / निरन्तर / अविरत…

क्योंकि मैं “वही” हूँ / मेरे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं

“अहम् ब्रह्मास्मि” या कह लीजिये “सोSहमस्मि”

तभी तो, कभी इस तन, कभी उस तन

कभी तेरे तन तो कभी मेरे तन |

न इसके पंख जलते हैं भयंकर ताप से

और न ये गलते हैं तेज़ सर्द हवाओं से |

इन डैनों को फैलाए आत्मा – हमारी अपनी चेतना

उड़ती जाती है विशाल ब्रह्माण्ड में / सतत / निरन्तर / अविरत…

कितनी दूर अभी जाना है / कहाँ रुकना है

नहीं ज्ञान इसे / बस ज्ञान है तो इतना

जितने विशाल पंख फैलेंगे / उड़ान उतनी ही ऊँची होगी |

प्रत्यक्ष की इस जीवन यात्रा में

आत्मा – हमारी अपनी चेतना

बस उड़ती ही रहती है / सतत / निरन्तर / अविरत…

थकते नहीं कभी / कमज़ोर नहीं पड़ते इसके पंख

हाँ, ठहर ज़रूर जाते हैं कुछ पलों के लिए

क्योंकि आ जाते हैं व्यवधान राहों में |

कभी मार्ग रोकता है क्रोध

लेकिन साथ ही प्रेम दिखा देता है नया मार्ग |

कभी मार्ग रोकते हैं भय और कष्ट

तो साथ ही पुरुषार्थ खोल देता है नई राहें |

कभी उन फैले पंखों से पहुँचता है कष्ट किसी को

तो क्षमादान प्रशस्त करता है एक नया मार्ग |

कभी होता है अभिमान एक पंख को अपने विस्तार का

तो दूसरा पंख एक ओर झुककर / प्रशस्त करता है मार्ग विनम्रता का |

एक पंख के साथ होता है रुदन

तो दूसरा हँसकर उसे पहुँचाता है सुख |

कभी दोनों ही पंख होते हैं उपेक्षित

तो कभी दोनों को मिलता है सम्मान अपार |

यही क्रम है सृष्टि का – संसार चक्र का

आत्मा – हमारी अपनी चेतना

अनेक प्रकार के पंख लगाए

बस उड़ती जाती है अपने ही विशाल विस्तार में

सतत / निरन्तर / अविरत……..

तो आइये आज दे दें अपनी आत्मा को पंख उन्मुक्त प्रेम के

भर दें इन पंखों में माधुर्य क्षमा का

पुरुषार्थ से कर दें इन पंखों को बलिष्ठ

हवा भर दें इन पंखों में विनम्रता की

ताकि उड़ती रहे आत्मा – हमारी अपनी चेतना

अपने ही विशाल विस्तार में / सतत / निरन्तर / अविरत / अनवरत……

हिन्दी साहित्य

हो सबको मंगलमय नव वर्ष

आओ मिलकर स्वागत कर लें, नव कुसुमांजलि अर्पण कर दें |

आया नूतन वर्ष, हो सबको मंगलमय नव वर्ष ||

आज न कोई फांस पुरानी रह जाए, आज न कोई कटुता बाक़ी रह जाए |

द्वेष घृणा का अँधियारा सब छंट जाए, प्रेम सुमन हर जन के हिय में खिल जाए |

आओ मिलकर नव अरुणोदय का हम सब ही स्वागत कर लें |

आया नूतन वर्ष, हो सबको मंगलमय नव वर्ष ||

हर घर में बस प्रेम उजाला फैला हो, और सद्भावों से सबका मन जागा हो |

कोई अधूरा काज यदि हो रहा कभी, पूरा करने हित मन में संकल्प नया हो |

आओ मिलकर प्यार भरी बोली से इसका स्वागत कर लें |

आया नूतन वर्ष, हो सबको मंगलमय नव वर्ष ||

हर मन में विचरित हो एक नई आशा, वातावरण नया हो ऐसी अभिलाषा |

सुख समृद्धि के पुष्प चहूँ दिशि खिल जाएँ, हर दिन खुशियों का संदेसा ले आए |

आओ मिलकर एक नई सरगम से सबका स्वागत कर लें |

आया नूतन वर्ष, हो सबको मंगलमय नव वर्ष ||

2017 में प्रथम दिवस से ही उदित होने वाले सूर्य की प्रत्येक किरण हर दिन आपके तथा आपके परिवारजनों के जीवन में सुख, समृद्धि, उत्साह एवं सफलता की रजत धूप प्रसारित करे, और प्रत्येक निशा का चन्द्र प्रेम एवं शांति की धवल ज्योत्सना ज्योतित करे | एक नवीन और सकारात्मक नव वर्ष की अनेकानेक शुभकामनाओं के साथ आपकी मित्र – पूर्णिमा

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