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मुझसे मेरा साथ न माँगो

मुझे अकेली ही रहने दो, मुझसे मेरा साथ न माँगो |

बन न सकूँगी सपन सुहाना, मुझसे मेरी रात न माँगो ||

मेरे मन के मस्त विहग को कोई बन्धन नहीं सुहाता |

प्यार भरा ये राग सुहाना नहीं है मेरा मन बहलाता |

अपना मुझे बनाने के हित मुझसे मेरा हाथ न माँगो ||

वासन्ती बयार ने छूकर एक कली से पुष्प खिलाया |

मैं ही हूँ वह पुष्प किसी को मधुर गन्ध जो दे ना पाया |

सजा सकूँ ना सेज मिलन की, मुझसे ये सौगात न माँगो ||

कोई समझा मैंने सागर के समान पाई गहराई |

कहा किसी ने, छोटी सी एक लहर मस्त होकर लहराई |

पर मैं छुद्र बूँद, पग धोने हित मुझसे बरसात न माँगो ||

सन् २००६ में अरावली प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित मेरे प्रथम उपन्यास “नूपुरपाश” से…..

हिन्दी साहित्य

उड़ते जाना अभी मुझे

उड़ते जाना अभी मुझे

 चलते चलते कहाँ आ गई, नहीं तनिक है भान मुझे |

मगर नहीं ये मंज़िल मेरी, इतना है अनुमान मुझे ||

मैं हूँ ऐसा पुष्प, डाल से टूट गिरा जो माटी में |

उसके स्नेहिल स्पर्शों से गंध बिखेरी कण कण में |

मन में था संकल्प कि जग को महकाना है अभी मुझे ||

चाहें कितनी आँधी आएँ, चाहें कितने तूफाँ आएँ |

चाहें सारे पुष्प धूल में पात पात हो बिखर पड़ें |

लेकिन आँधी तूफ़ानों में उड़ते जाना भी मुझे ||

युगों युगों से चली आ रही, ठौर मिला ना तनिक मुझे |

थक कर हूँ मैं चूर हो गई, मगर नहीं विश्राम मुझे |

पग में छाले पड़े, मगर चलते जाना है अभी मुझे ||

जिसे खोजने निकली उसका पता नहीं है याद मुझे |

किससे पूछूँ, राह दिखाते अलग अलग हैं सभी मुझे |

अन्तर में है छिपा हुआ वह, मगर नहीं है ज्ञान मुझे ||

 

हिन्दी साहित्य

कौन तुम मेरे हृदय में

कौन तुम मेरे हृदय में?

कौन मेरी कसक में नित
मधुरता भरता अलक्षित?
कौन प्यासे लोचनों में
घुमड़ घिर झरता अपरिचित?

स्वर्ण-स्वप्नों का चितेरा
नींद के सूने निलय में! 9 और  शब्द

Poetry

मेरे मानस का शुभ्र हंस

मैंने देखा

खिड़की की जाली के बीच से आती

रेशम की डोर सी / प्रकाश की एक किरण को

मुझ तक पहुँचते ही जो बदल गई

एक विशाल प्रकाश पुंज में

और लपेट कर मुझे

उड़ा ले चली एक उन्मुक्त पंछी की भाँति

उसी प्रकाश-किरण के पथ से / दूर आकाश में

जहाँ कोई अनदेखा

भर रहा था वंशी के छिद्रों में / अलौकिक सुरों के आलाप

जहाँ चारों ओर पुष्पित थे / अलौकिक रंगीन पुष्प

उस प्रकाश पुंज ने पहुँचा दिया मुझे

एक दिव्य हिमाच्छादित सरोवर पर

जिसमें खिले थे अनोखे नीलपद्म

और श्वेत हंस कर रहे थे अठखेलियाँ

नींद टूटी – स्वप्न भी टूटा

लेकिन नहीं – है विश्वास मुझे

सत्य होगा मेरा स्वप्न

जब मैं पहुँच जाऊँगी

अपनी आत्मा के शीतल सरोवर तक

मन्त्र पुष्पों से सज्जित / ध्यान के प्रकाश पथ से

अपने भीतर उतरती हुई

तब मुझे दिखाई देगा

आत्मसरोवर में खिला हुआ वह चैतन्य नीलपद्म

जिसके साथ अठखेलियाँ कर रहा होगा

मेरे मानस का शुभ्र हंस…

हिन्दी साहित्य

महामन्त्र

किसी ने कहा, बाहर नहीं है कुछ भी

क्य प्राप्त करोगे बाहर की रिक्तता से ?

सब कुछ तो है तुम्हारे भीतर / एक अलग संसार |

मैंने बन्द किये अपने नेत्र, झाँकने को अपने भीतर

वहाँ था केवल अन्धकार, भय, चिन्ता |

तब मैंने खटखटाए द्वार महापुरुषों के

जिन्होंने दिया मुझे एक मन्त्र / जाप करने को

ताकि दूर हों समस्त भय, चिन्ताएँ

छिन्न हो समस्त अन्धकार

और दीख पड़े एक किरण प्रकाश की |

मैं करती रही जाप निरन्तर अनवरत

पर कुछ नहीं घटा

मेरा भय, चिन्ताएँ, अन्धकार / कुछ भी नहीं |

तब मान कर सलाह किसी अन्य की

चाट डाले सारे वेद पुराण उपनिषद

जिनसे मिला ज्ञान आध्यात्मिकता का |

पर यह क्या ?

इस ज्ञान ने तो कर दिया मुझे और भी भ्रमित |

तब पूछा किसी अन्य ने

क्य जीवन में तुमने कभी प्रेम किया है ?

क्य तुम्हारे जीवन में कभी प्रेम रहा है ?

बिन प्रेम कैसे पाओगे प्रकाश अपने भीतर का ?

कैसे दूर होंगे तुम्हारे भय और चिन्ताएँ ?

केवल मन्त्र से अथवा ज्ञान से ?

नहीं, पहले उत्पन्न करो प्रेम अपने भीतर

वही है सबसे बड़ा मन्त्र – महामन्त्र |

वही है सबसे बड़ा ज्ञान – महाज्ञान |

और अपने बन्द नेत्रों से मैंने अनुभव किया

एक अदृश्य किन्तु स्नेहिल स्पर्श / अपने मस्तक पर |

अब मैं देख सकती थी प्रकाश

गहन प्रकाश / अपने भीतर |

और उस प्रकाश में वह मार्ग

जो लेता है चरम सत्य की ओर

बिना किसी भय के

बिना किसी चिन्ता के…

हिन्दी साहित्य

हीरों के हारों से चमकें फुहारें

भयंकर गर्मी से तपती धरा पर कल शाम अचानक से ठण्डी सुखद बयार ने दस्तक दी और देखते ही देखते रिमझिम का गीत सुनाती बारिश शुरू हो गई… लगा जैसे बारिश की ये बहार अनगिनती तानें सजाती आ गई… और मस्ती में भरा मन बोल उठा…

हीरों के हारों सी चमकें फुहारें, और वीणा के तारों सी झनकें फुहारें |
धवल मोतियों सी जो झरती हैं बूँदें तो पाँवों में पायल सी झनकें फुहारें ||
कोयल की पंचम में मस्ती लुटातीं, तो पपिहे की पीहू में देतीं पुकारें |
कली अनछुई को रिझाने को देखो ये भँवरे की गुँजन में देतीं पुकारें ||
मेघों के डमरू की धुन सुनके मस्ती में बहकी हैं जातीं ये चंचल बयारें |
दमकती है बिजली तो भयभीत गोरी सी काँपी हैं जातीं ये चंचल बयारें ||
दिन की उमस से पिघलती हैं बूँदें, और मल्हारें गाती बरसती हैं बूँदें |
धड़कन सी देखो धड़कती हुई और मचलती हुई ये बरसती हैं बूँदें ||
मस्ती भरा मद टपकता है जिनसे वो आमों की डालों पे लटकी हैं बौरें |
हरेक दिल में मदमस्त जादू जगाती और खुशबू उड़ाती ये लटकी हैं बौरें ||
कहो कैसे कोई उदासी में डूबे, जो मस्ती भरे गीत गाती बहारें |
कि रिमझिम के मीठे नशीले सुरों में हैं कितनी ही तानें सजाती बहारें ||

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धुआँ- गुलज़ार

आँखों में जल रहा है ये बुझता नहीं धुआँ
उठता तो है घटा सा, बरसता नहीं धुआँ

पलकों के ढापने से भी रूकता नहीं धुआँ
कितनी उँडेलीं आँखें ये बुझता नहीं धुआँ

आँखों से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं
महमां ये गर में आयें तो चुभता नहीं धुआँ

चूल्हे नहीं जलाये कि बस्ती ही जल गई
कुछ रोज़ हो गये है अब उठता नहीं धुआँ

काली लकीरें खींच रहा है फ़िज़ाओं में
बौरा गया है कुछ भी तो खुलता नहीं धुआँ

आँखों के पोंछने से लगा आग का पता
यूं चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ

चिंगारी इक अटक सी गई मेरे सीने में
थोड़ासा आ के फूंक दो, उड़ता नहीं धुआँ
गुलज़ार
( रात पश्मीने की)

Poetry