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रात भर छाए रहे हैं

रात भर छाए रहे हैं, मेघ बौराए रहे हैं

देख बिजली का तड़पना, मेघ इतराए रहे हैं |

बाँध कर बूँदों की पायल, है धरा भी तो मचलती

रस कलश को कर समर्पित, मेघ हर्षाए रहे हैं ||

पहन कर परिधान सतरंगी, धरा भी है ठुमकती

रास धरती का निरख कर, मेघ ललचाए रहे हैं |

तन मुदित, हर मन मुदित, और मस्त सारी चेतना है

थाप देकर धिनक धिन धिन, मेघ लहराए रहे हैं ||

सुर से वर्षा के उमंगती रागिनी मल्हार की है

और पवन की बाँसुरी सुन, मेघ पगलाए रहे हैं |

मस्त नभ निज बाँह भरकर चूमता है इस धरा को

करके जल थल एक देखो, मेघ इठलाए रहे हैं ||

हिन्दी साहित्य

मैं एक लड़की ( कविता 1 )

मेरी पाँच कविताएँ / My 5 Poems Published in She The Shakti, Anthology– POEM 4

इस दुनिया मॆं मैने
आँखें खोली.
यह दुनिया तो
बड़ी हसीन
और रंगीन है.

मेरे लबों पर
मुस्कान छा गई.
तभी मेरी माँ ने मुझे
पहली बार देखा.
वितृष्णा से मुँह मोड़ लिया

और बोली -लड़की ?
तभी एक और आवाज़ आई
लड़की ? वो भी सांवली ?

Source: मैं एक लड़की ( कविता 1 )

देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ - निदा फ़ाज़ली

देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ
हर वक़्त मेरे साथ है उलझा हुआ सा कुछ

होता है यूँ भी रास्ता खुलता नहीं कहीं
जंगल-सा फैल जाता है खोया हुआ सा कुछ

साहिल की गिली रेत पर बच्चों के खेल-सा
हर लम्हा मुझ में बनता बिखरता हुआ सा कुछ

फ़ुर्सत ने आज घर को सजाया कुछ इस तरह
हर शय से मुस्कुराता है रोता हुआ सा कुछ

धुँधली सी एक याद किसी क़ब्र का दिया
और मेरे आस-पास चमकता हुआ सा कुछ
– निदा फ़ाज़ली

Poetry

नाम -कविता 

खिला खिला गुलमोहर तपिश में मोहरें लूटाता रहा…..

पूरा चाँद,  रात भर  जल कर चाँदनी बाँटता  रहा.

ना पेड़ों ने कहीँ अपना नाम लिखा ना शुभ्र गगन में चाँद ने.

और हम है घरों – कब्रों पर अपना नाम लिखते रहते है.

Images from internet.

बेलगाम   ख्वाहिशें-  कविता 

कुछ ख्वाहिशें बेलगाम उडती,

 बिखरती रहती है हवा के झोंकों सी.

 सभी अरमानों को पूरा करना मुशकिल है,

और  बंधनों में बाँधना भी मुश्किल है.

सर्जना के क्षण - अज्ञेय

एक क्षण भर और
रहने दो मुझे अभिभूत
फिर जहाँ मैने संजो कर और भी सब रखी हैं
ज्योति शिखायें
वहीं तुम भी चली जाना
शांत तेजोरूप!

एक क्षण भर और
लम्बे सर्जना के क्षण कभी भी हो नहीं सकते!
बूँद स्वाती की भले हो
बेधती है मर्म सीपी का उसी निर्मम त्वरा से
वज्र जिससे फोड़ता चट्टान को
भले ही फिर व्यथा के तम में
बरस पर बरस बीतें
एक मुक्तारूप को पकते!
– अज्ञेय
(सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन “अज्ञेय” 7th March 1911-4th April 1987)

Poetry

हर तरफ ....

चिड़िया  …. 

तुम सुन रही हो न 

घोंसले की 

दहलीज के बाहर 

आँधियाँ ही आँधियाँ हैं 

हर तरफ 

*

नोचने को पर तुम्हारे

उड़ रहे हैं 

गिद्ध ही गिद्ध यहाँ  

हर तरफ 

**

पैने करने होंगे 

अपने ही नाख़ून तुमको 

कोई नहीं आएगा बचाने  

मुखौटों के अंदर 

बस कायरों की 

भीड़ ही भीड़ है यहाँ 

हर तरफ 

***

सरे आम होने वाले अपराधों को लोग कैसे तमाशाई बनकर देखते रहते हैं, आखिर हमे हो क्या गया है… हम जिन्दा भी हैं या नहीं, आत्म विश्लेषण की बहुत जरूरत है 

सामाजिक सरोकार