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काँच के पीछे चाँद भी था - गुलज़ार

काँच के पीछे चाँद भी था

काँच के पीछे चाँद भी था और काँच के ऊपर काई भी
तीनों थे हम, वो भी थे, और मैं भी था, तनहाई भी

यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं
सोंधी-सोंधी लगती है तब माज़ी की रुसवाई भी

दो-दो शक्लें दिखती हैं इस बहके-से आईने में
मेरे साथ चला आया है, आप का इक सौदाई भी

कितनी जल्दी मैली करता है पोशाकें, रोज़ फ़लक़
सुबह ही रात उतारी थी और शाम को शब पहनायी भी

ख़ामोशी का हासिल भी इक लम्बी-सी ख़ामोशी थी
उन की बात सुनी भी हमने, अपनी बात सुनायी भी

कल साहिल पर लेटे-लेटे, कितनी सारी बातें की
आप का हुंकारा न आया, चाँद ने बात करायी भी
गुलज़ार  (यार जुलाहे….)
सम्पादन यतीन्द्र मिश्र

Poetry

कहाँ भला ये क्षमता मुझमें

माँ में चन्दा की शीतलता, तो सूरज का तेज भी उसमें ।

हिमगिरि जैसी ऊँची है, तो सागर की गहराई उसमें ।।

शक्ति का भण्डार भरा है, वत्सलता की कोमलता भी ।

भला बुरा सब गर्भ समाती, भेद भाव का बोध न उसमें ।।

बरखा की रिमझिम रिमझिम बून्दों का है वह गान सुनाती ।

नेह अमित है सदा लुटाती, मोती का वरदान भी उसमें ।।

धीरज की प्रतिमा है, चट्टानों सी अडिग सदा वो रहती ।

अपनी छाती से लिपटा कर सहलाने की मृदुता उसमें ।।

मैं हूँ तेरा अंश, तेरे तन मन की ही तो छाया हूँ मैं ।

बून्द अकिंचन को मूरत कर देने की है क्षमता तुझमें ।।

धन्यभाग मेरे, अपने अमृत से तूने सींचा मुझको ।

ऋण तेरा चुकता कर पाऊँ, कहाँ भला ये क्षमता मुझमें ।।

सच, आज जो कुछ भी हम हैं – हमारी माताओं के स्नेह और श्रम का ही परिणाम हैं | माँ से ही हमारी जड़ें मजबूत बनी हुई हैं – ऐसी कि बड़े से बड़े आँधी तूफ़ान भी हमें अपने लक्ष्य से – अपने आदर्शों से – अपने कर्तव्यों से डिगा नहीं सकते | करुणा-विश्वास-क्षमाशीलता की उदात्त भावनाएँ माँ से ही हमें मिली हैं | स्नेह, विश्वास, साहस और क्षमाशीलता  की प्रतिमूर्ति संसार की सभी माताओं को श्रद्धापूर्वक नमन के साथ अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की अपने साथ साथ आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ…

हिन्दी साहित्य

मातृ दिवस - मदर्स डे

कल “मदर्स डे” है – यानी कि “मात्तृ दिवस” – हर माँ को सम्मान और आदर देने के लिये हर वर्ष एक वार्षिक कार्यक्रम के रुप में मातृदिवस को मनाया जाता है । यों भारत में तो मातृ शक्ति के सम्मान की महान परम्परा आरम्भ से ही रही है | उत्तरी अमेरिका में माताओं को सम्मान देने के लिये अन्ना जारविस ने इस दिवस का आयोजन आरम्भ किया था | यद्यपि वो अविवाहित महिला थी और उनकी अपनी कोई सन्तान भी नहीं थी | लेकिन उनकी माँ ने उन्हें जितना प्यार दिया और जिस प्रकार उनका पालन पोषण किया उस सबसे वे इतनी अधिक प्रभावित और अभिभूत कि अपनी माँ के स्वर्गवास के बाद संसार की समस्त माँओं को सम्मान देने के लिए उनके सच्चे और निस्वार्थ प्यार के प्रतीक के रूप में उन्होंने एक दिन माँ को समर्पित कर दिया, जिसने बाद में इतने बड़े पर्व का रूप ले लिया | अब पूरे विश्व के विभिन्न देशों में अलग-अलग तारीखों पर हर वर्ष मातृ दिवस मनाया जाता है | भारत में, इसे हर साल मई महीने के दूसरे रविवार को मनाते हैं |

माँ का ऋण कभी चुकाया नहीं जा सकता | केवल एक दिन कोई पर्व मनाकर हम अपने कर्तव्यों की इतिश्री नहीं कर सकते | लेकिन यदि एक दिन सारा संसार मिलकर माँ के प्यार, देखभाल, कड़ी मेहनत और प्रेरणादायक विचारों का स्मरण करे और इस तथ्य को समझने का प्रयास करे कि हमारे जीवन में वो एक महान इंसान है जिसके बिना हम एक सरल जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं, जो हमारे जीवन को अपने प्यार के साथ बहुत आसान बना देती है – तो ऐसे पर्व मनाना वास्तव में एक सार्थक प्रयास है | माँ एक ऐसी देवी होती है जो सन्तान को केवल देना ही जानती है, प्रतिदान की कभी इच्छा नहीं रखती | एक पथप्रदर्शक शक्ति के रूप में सदा हमें आगे बढ़ने में और किसी भी समस्या से साहस के साथ उबरने में हमारी सहायता करती है | इसलिए आज के इस भाग दौड़ के युग में जहाँ पूरा परिवार एक साथ खाने की मेज़ पर भी हर दिन सम्भवतः नहीं मिलता होगा, सन्तान और माता पिता के पारस्परिक सम्बन्धों को प्रगाढ़ बनाने की दिशा में इस प्रकार के पर्वों का आयोजन किया जाना वास्तव में बड़ा सुखद और सार्थक प्रयास है |

तो, मेरी अपनी माँ के साथ साथ संसार की हर माँ को समर्पित हैं कुछ पंक्तियाँ… मदर्स डे की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ…

बेहद खुश थी मैं उस दिन / जब बताया गया था मुझे

बनने वाली हूँ मैं भी एक माँ…

जब पहली बार अहसास हुआ माँ बनने का

प्रतीक्षा कर रही थी बड़ी उत्सुकता से / उस सुखद क्षण की…

और तब अहसास हुआ / तुम भी रही होगी इतनी ही उत्सुक

जब प्रथम बार पता लगा होगा / तुम बनने वाली हो माँ…

कानों में पड़ा बिटिया का प्रथम रुदन

सीने से लगाया बिटिया को अपनी

भीग उठा मन स्नेह और करुणा के अमृत जल से

मानों घाम से जलती देह पर / पड़ गई हो वर्षा की प्रथम बूँद…

तुम्हें भी अहसास हुआ होगा ऐसी ही शान्ति का

जब सुना होगा मेरा प्रथम रुदन / या भरा होगा अंक में मुझे

तभी तो मिलती थी शान्ति मुझे / जब ढँक लेती थीं तुम आँचल से अपने…

बिटिया को देख नैनों से प्रवाहित हो चला था आनन्द का जल

और तब मैंने जाना / क्यों आ जाती थी चमक तुम्हारी आँखों में / मेरी हर बात से…

वात्सल्य से भरा था तुम्हारा अन्तर / भोली थीं तुम / मात्र स्नेह में पगी

पर साथ ही भरी थी व्यावहारिकता भी कूट कूट कर तुममें…

तभी तो खड़ी रहीं अदम्य साहस के साथ / हर परिस्थिति में…

और यही सब सिखाया मुझे भी / कभी स्नेह से / तो कभी क्रोध से…

और क्रोध में भी तुम्हारे / छलकता था करुणा का अथाह समुद्र

मौन में भी सुनाई पड़ता था / तुम्हारे हृदय का वह वात्सल्य गान…

उँगली पकड़ कर चलना सिखाया तुम्हीं ने

घुटनों पर रेंगते रेंगते / कब खड़ी हो गई अपने पाँवों पर

पता ही नहीं लगने दिया तुमने…

नहीं पता कितनी कक्षाएँ पास की थीं तुमने

पर बोलना और पढ़ना लिखना / सिखाया तुम्हीं ने

तुम ही तो हो मेरी सबसे बड़ी शिक्षक / ज्ञान और व्यवहार / दोनों क्षेत्रों में…

गाना तुम्हें नहीं आता था / बाद में पता चला था

पर रातों को मीठी लोरी गाकर / गहन निद्रा में ले जाती तुम्हीं थीं

स्नेह निर्झर बरसाती हुई / सहलाती हुई मेरे सपनों को…

रातों को नींद में / हटा देती जब मैं रजाई अपने ऊपर से

दिन भर थकी संसार के कर्तव्यों से / फिर भी जागकर वापस मुझे ढंकती तुम्हीं थीं…

कितनी थीं दुबली पतली तुम

फिर भी मेरे गिर पड़ने पर / संभालती तुम्हीं थीं…

मैंने देखी हैं / तुम्हारे अन्तर की वेदना से भीगी तुम्हारी आँखें

पर मुझे सदा हँसना सिखाती तुम्हीं थीं…

तुम रहीं सदा स्नेह से पूर्ण / भय और आशंकाओं से रहित

फिर भी मेरे लिए सदा ईश्वर से करती रहतीं प्रार्थना / झोली पसार

न जाने कितने रखतीं व्रत उपवास / आज भी जो हैं मेरे साथ…

मैंने कुछ भी किया / नहीं किया / सफल रही / या असफल

तुम्हारे लिए मैं ही थी / संसार की सबसे अच्छी बच्ची…

क्या सही है क्या ग़लत / तुमने ही बताया इनके मध्य का अन्तर

व्यस्त होते हुए भी / समाज से मिलवाया तुम्हीं ने…

तुमसे ही तो था मेरा अस्तित्व – मेरा सर्वस्व…

तुम्हारे ही अंक से लगकर / ममता की छाँव में / स्नेह के जल से सिंच कर

विकसित हुई थीं मेरी पंखुड़ियाँ…

तुम्हारे ही आँचल की छाया में / पाया था संसार का सारा वैभव मैंने…

आज भी दिल चाहता है / काश तुम्हारी गोदी में सर रखकर सो पाती

गाती तुम लोरी / राहत मिलती थके हुए दिल को मेरे

नहीं है कोई ख़ुशी बढ़कर तुम्हारे आँचल की छाया से माँ

जानती हूँ / तुम्हारे आशीष सदा सदा हैं साथ मेरे

दिखाती हो आज भी मार्ग मुझे आगे बढ़ने का…

लुटाती हो आज भी नेह का रस / मिलता है जिससे साहस / आगे बढ़ने का…

क्योंकि तुम रहो / न रहो / तुम समाई हो मेरे भीतर ही…

क्योंकि तुम्हारा प्रतिरूप ही तो हूँ मैं माँ…

हिन्दी साहित्य

धोखा -कविता Trust

It takes years to build up trust, only seconds to destroy it. But betrayal has its positive side too.

“Out of suffering have emerged the strongest souls; the most massive characters are seared with scars.” 6 और  शब्द

जीवन की धुरी

भान है मुझे / मैं ही हूँ जीवन की धुरी

मेरे चलने से ही तो भरती है / जीवन में लय और गति |

रुक जाऊँ तनिक थककर / ठिठक जाऊँ

तो रुक जाती हैं गतिविधियाँ जीवन की सारी |

भान है मुझे अपनी शक्ति का / मैं हूँ हिमगिरि की भांति दृढ़

बड़े से बड़े तूफानों में भी खड़ी रहती हूँ अविचल |

रहती हूँ सावधान / कहीं गिर न जाऊँ खाकर ठोकर

मेरे गिरने से / गिर जाएँगी भरभराकर आदर्श की दीवारें भी सारी

क्योंकि हो चुकी हैं वे खोखली / झेलकर सम्वेदनशून्य मान्यताओं के दंश |

भान है मुझे / मैं ही हूँ नैतिकता / जो रहती है बन्द दरवाजों के पीछे |

रहती हूँ सावधान / कहीं भटक न जाऊँ लक्ष्य से

अन्यथा चरमरा कर खुल जाएँगे / सिद्धान्तों के सारे बन्द द्वार |

क्योंकि मैं हूँ नारी / उठाए हुए सारे संसार के आदर्शों का बोझ / अपने कन्धों पर

चढ़ जाती हूँ पहाड़ों की ऊँची से ऊँची चोटियाँ भी

और गाढ़ आती हूँ अपने नाज़ुक हाथों से / अपनी विजय पताका |

पहुँच जाती हूँ आकाश की भी सीमाओं के पार / दूर अंतरिक्ष में

जीवन की चिन्ता किये बिना / क्योंकि परिचित हूँ तन की क्षणभंगुरता से |

लगाती हूँ सागर की गहराइयों में गोते / इठलाती हुई / लहराती हुई |

उड़ती हूँ साथ खगचरों के / तो सहोदर से लगते हैं सारे जलचर मुझे |

सारा ब्रह्माण्ड बन जाता है साक्षी / साकार होते मेरे सपनों का |

तुम डालना चाहते हो बेड़ियाँ / पाँवों में मेरे / तथाकथित आदर्शों की ?

बन्द दरवाजों के पीछे / नैतिकता के नाम पर / करना चाहते हो भ्रमित ?

देकर दुहाई थोथे सिद्धान्तों की / सिलना चाहते हो होंठ मेरे ?

पर झेलकर अनेकों झँझावात / बन गई हूँ मैं दुर्गा

नहीं साहस किसी दुष्यन्त में / कर दे जो आहत / भावनाओं को मेरी

नहीं साहस किसी दुशासन में / खेल सके जो / अस्मिता से मेरी

नहीं साहस किसी महान ऋषि में / कर दे जो जड़ सारी भावनाओं / सम्वेदनाओं को मेरी

नहीं साहस किसी राम में / ले सके जो अग्नि परीक्षा मेरी

नहीं देखना प्रदर्शन / अहंकार का / किसी दुष्यन्त के

नहीं हूँ मैं अबला / जो दया की पात्र बनूँ किसी कृष्ण की

नहीं हूँ मैं पत्थर / जो पड़ी रहूँ ठोकरों में / किसी राम की

पाने को नया जीवन

अब नहीं होंगे प्रश्न / अस्तित्व पर मेरे

अब नहीं होंगे प्रश्न / आदर्शों पर मेरे

अब नहीं किया जाएगा विवश मुझे / नाम पर नैतिकता के

अब नहीं सी सकेगा कोई होंठ मेरे / नाम पर सिद्धान्तों के

अब नहीं बनूँगी मैं देवी / नाम पर आस्था के

क्योंकि मुझे है अधिकार / इन्सान होने का

माना फँसी हूँ चक्रव्यूह में नामों के

कहीं माँ / कहीं बेटी / कहीं बहन / कहीं पत्नी / कहीं प्रेमिका

क्योंकि समेट दिया जाता है मुझे / चक्रव्यूह में इन नामों के |

किन्तु मुझे भी है अधिकार खुल कर जीने का

मुझे भी है अधिकार नाचने का अपनी धुन पर / गुनगुनाने का

मुझे भी है अधिकार / पूछने का तुमसे कुछ सवाल

मुझे भी है अधिकार / उतारने का तुम्हारे ख़ूबसूरत मुखौटे

मैं केवल प्रस्तर प्रतिमा भर नहीं हूँ

मत भूलो कि मैं ही हूँ जीवन की धुरी

मुझसे ही है जीवन में लय और गति

हिमगिरि सी अटल हूँ / तो हूँ सागर सी गहरी भी

इसीलिए तो सिमट जाते हैं आकर मुझ पर ही

सारे आदर्श / सारी नैतिकताएँ / सारे सिद्धान्त

नहीं मिटा पाओगे मेरे अस्तित्व को तुम कभी

क्योंकि मैं ही हूँ आधार इस सृष्टि का…

हिन्दी साहित्य

एक आशीर्वाद - दुष्यंत कुमार

जा तेरे स्वप्न बड़े हों।

भावना की गोद से उतर कर
जल्द पृथ्वी पर चलना सीखें।

चाँद तारों सी अप्राप्य ऊचाँइयों के लिये
रूठना मचलना सीखें।

हँसें
मुस्कुराएँ
गाएँ।

हर दीये की रोशनी देखकर ललचायें
उँगली जलाएँ।
अपने पाँव पर खड़े हों।
जा तेरे स्वप्न बड़े हों।
– दुष्यंत कुमार

source: kavitakosh.org

Poetry

लम्हे

लम्हे

दिन की गठरी खोल
समेट रही हूँ

होले होले गिरते लम्हे

बूँदों-से छलककर  टपकते लम्हे

पत्तों-से गिरते, उठते लम्हे

फूलों-से खिलते, मुरझाते लम्हे

हवाओं-से बहते, हाथमें न आते लम्हे

रेत-से फिसलते, सरकते लम्हे

पलकों से भागे सपनों-से

नीमपके फल,  लम्हे !

कभी सहरा सी धूप में ओढ़े हुए बादल लम्हे

तो कभी सर्दियों में हथेली पे पिधलते

धूप के टुकड़े लम्हे

सिरों को खिंच कर जब तक
बाँधू दिन की गठरी

रात की टोकरी
खूल जाती हैं

तारों से जड़े ढक्कन पर

चमकते लम्हे

पलकों पर सपनोकी सेज सजाते लम्हे

अपने कंधे पर उठाये नींदों के पैगाम;

झूकते, थक कर चूर लम्हे ।

सुबहो-शाम की गठरी और टोकरी
बाँधने-खोलने में बीत रही है ज़िंदगी

क्यूँ बाँधू ईनको?

क्यूँ सजाऊं इनसे अपने मन की अटारी?

छोड दूँ गठरी के सिरों को खूला ही
बनालूँ रात के आसमाँ को टोकरी का ढक्कन

जीया जो पल उसे
बहा दूँ समय की नदीमें
दिया बनाकर!

या हवा के परों पर रखदूँ
डेन्डिलायन्स जैसे….
नेहल

Poetry