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ઍશ-ટ્રે - અમૃતા પ્રીતમ ऐश ट्रे - अमृता प्रीतम

ऐश ट्रे

इलहाम के धुएँ से लेकर
सिगरेट की राख तक
उम्र की सूरज ढले
माथे की सोच बले
एक फेफड़ा गले
एक वीयतनाम जले…

Poetry

बातें - વાતો - અમૃતા પ્રીતમ – પ્રતિનિધિ કવિતા અનુવાદ : જયા મહેતા

बातें
आ साजन, आज बातें कर लें…

तेरे दिल के बाग़ों में
हरी चाह की पत्ती-जैसी
जो बात जब भी उगी,
तूने वही बात तोड़ ली 24 और  शब्द

Poetry

मौन

कोई ध्वनि न हो हवा में, यदि वहाँ न हो कोई वृक्ष |

कोई अर्थ न हो मौन का, यदि वहाँ न हो कोई लक्ष्य |

मौन उत्पन्न होता है प्रेम में, मौन उत्पन्न होता है दया में

मौन उत्पन्न होता है आनंद में, और मौन उत्पन्न होता है संगीत में |

मौन, ऐसा गीत जो कभी गाया नहीं गया,

फिर भी मुखरित हो गया |

मौन, ऐसा सन्देश जो कभी सुना नहीं गया

फिर भी ज्ञात हो गया |

मौन, एक भाषा, जिसकी कोई लिपि नहीं |

मौन, एक नृत्य, जिसकी कोई मुद्रा नहीं |

मौन, स्थिरता की ऐसी ऊर्जा, जिसका कोई रूप नहीं |

मौन, एक शब्दहीन शब्द

इसीलिये नहीं हो सकती अनुचित व्याख्या इसकी |

प्रश्न केवल इतना ही

क्यों रुदन करते हैं हम जन्म लेते समय ?

क्यों नहीं जन्म ले सकते हम मौन भाव से ?

ताकि हमारी सत्ता ही बन जाए हमारा मोक्ष

और भाव बन जाए अभाव ?

हिन्दी साहित्य

कुछ चुनिंदा अशआर- बशीर बद्र

हम भी दरया हैं हमें अपना हुनर  मालूम है
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा

जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कही मील का पत्थर नहीं देखा

कही यूँ भी आ मिरी आँखमें कि मिरी नज़र को ख़बर न हो
मुझे एक रात नवाज़ दे, मगर उसके बाद सहर न हो

मुहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला

गर्म कपड़ों का सन्दूक़ मत खोलना, वर्ना यादों की काफूर जैसी महक
खून में आग बन कर उतर जायेगी, सुब्ह तक ये मकाँ ख़ाक हो जायेगा

ख़ुदा की इतनी बड़ी काइनात में मैंने
बस एक शख़्स को माँगा मुझे वही न मिला

घड़ी दो घड़ी हम को पलकों पे रख
यहाँ अाते आते ज़माने लगे

ख़ुदा एेसे एहसास का नाम है
रहे सामने ओर दिखाई न दे

लेहजा कि जैसे सुब्ह की ख़ुश्बू अज़ान दे
जी चाहता है मैं तिरी आवाज़ चूम लूँ

अपने आंगन की उदासी से ज़रा बात करो
नीम के सूखे हुए पेड़ को सन्दल कर दो

सन्नाटे की शाख़ों पर कुछ ज़ख़्मी परिन्दे हैं
ख़ामोशी बज़ाते खुद आवाज़ का सेहरा है

नाहा गया था मैं कल जुग्नुओं की बारिश में
वो मेरे कांधे पे सर रख के खूब रोई थी

चमकती है कहीं सदियों में आंसुओं से ज़मीं
ग़ज़ल के शेर कहाँ रोज़ रोज़ होते हैं

वक़्त के होंट हमें छू लेंगे
अनकहे बोल हैं गा लो हमको

–  बशीर बद्र

Poetry

My words my sketch

Trying something new, something different! I hope you will like it!

Poetry

तमाम हो गया

भोर हुई और धूप चढ़ गई, शोर मचा और साँझ ढल गई

लो ऐसे ही और एक दिन देखो आज तमाम हो गया ||

एक दिवस यों कहा कली ने भँवरे से, ना अब मुझको छू

भँवरा बोला, अरी बावली फिर तू ही आ मुझे चूम ले |

और तभी एक झोंका आया, डाल हिली, भू गगन हिल गए

कली और भँवरे के देखो अनजाने ही अधर मिल गए ||

प्राण तपे और प्यास जग उठी, मेघ घिरे और झड़ी लग गई

और यों ही सागर में सरिता का चिर मिलन तमाम हो गया ||

एक बार था चन्द्र खिला, पर रूठी हुई चन्द्रिका बैठी

बार बार पूछा चंदा ने, पर वह तो बस दूर खड़ी थी |

मगर तभी एक बादल गरजा, बिजली ने भी क्रोध दिखाया

और डरी वह चन्द्रकिरण खुद ही जा लिपटी निज प्रियतम से ||

स्नेह बढ़ा और साँस रुक गई, तिमिर खिला और ज्योति बिक गई

लो ऐसे ही और एक दीपक यह आज तमाम हो गया ||

एक रात एक तारा टूटा पतझर में उजड़े पेड़ों पर

विहँस कहा पुष्पों ने यह है बुझा दिया, इसका क्या होगा |

तभी कहा एक शुष्क पत्र ने, यह भी अपने ही जैसा है

एक दु:खी से एक दु:खी को सदा प्यार ही तो मिलता है ||

रूप हँसा और रास रच गया, मिलन हुआ पर विरह बच गया

लो ऐसे ही और एक यह देखो स्वप्न तमाम हो गया ||

जीवन की इस कड़ी धूप में दो पंछी थे मुक्त गगन में

हँस हँस उड़ते, मगर तभी एक आँधी उठी और तम बरसा |

हाथों से तब हाथ था छूटा, साँसों का हर तार था टूटा

जग ने पथ में काँटे बोए, नियति नटी का प्यार था झूठा ||

रोया जीवन, मृत्यु हँस पड़ी, आयु लुटी और धूल बच गई

ब्रह्मा की रचना का यों ही देखो काम तमाम हो गया ||

 

 

हिन्दी साहित्य

मीर तक़ी मीर

मीर तक़ी मीर  (1722-23  –   1810)
उर्दू के पहले सबसे बड़े शायर जिन्हें ‘ ख़ुदा-ए-सुख़न, (शायरी का ख़ुदा) कहा जाता है।

 कुछ  अशआर

दिल से रुख़सत हुई कोई ख़्वाहिश 75 और  शब्द

Poetry