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अच्छा लगता है

कभी यूँ ही अकेले बैठना अच्छा लगता है।

चुपचाप से;

अपने-आप से भी खामोश रहना,

अच्छा लगता है।

मन की गुफाओ में बहते झरनों की

धून सुनना, गुनगुनाना

अच्छा लगता है।

कभी दिल के दरवाज़ों को बंद रखना

दस्तकों से बेपरवा होना

अच्छा लगता है।

दिल के बाग की खूशबूओं में

खोना, महकना

अच्छा लगता है।

ख़ामोशी की शांत  पहाड़ीओं के

पीछे से बहती है

इक नीली सी नदी

उस के शीतल, निर्मल जलमें

भीगना, बहना

अच्छा लगता है।

हवाएँ मन की अटारीओं से बहते

शब्द के अनेक स्वर छेड जाती है

उसके ध्वनित तरंगो को मौनमें डूबोना

अच्छा लगता है।

– नेहल

Poetry

बचपन (Childhood )

आजकल चारो तरफ बच्चों की मस्ती दिखाई पड़ रही है । बच्चों का खिलंदड़ मिजाज हर जगह दिख रहा है ।समय चाहे सुबह का हो या शाम का , पार्क हो या खेलने की कोई और जगह , हर जगह बाल सुलभ चंचलता दिखाई पड़ती है ।

Positivity, Hindi Blog

जिंदगी के रंग 14 - कविता

NEWS- The Sunday Express, March 19, 2017

1.It was in March last year that her husband Shankar was hacked to death by goons hired by her parents, … 96 और  शब्द

होली की गुदगुदी  (Tingling)

आ गया होली का त्योहार भी मन मे उत्साह भरते हुये , कोशिश करता है कि दबे पाँव आये लेकिन ऐसा हो नही पाता ,आने से पहले ही गुझिया की खुशबू और गुलाल के रंग चारो तरफ बिखरे हुये से महसूस होते हैं ।

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सबही को एकरंग करो तो

जिससे यह तन मन रंग जाए ऐसा कोई रंग भरो तो |

प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||

यह दीवार घृणा की ऊँची आसमान तक खड़ी हुई है

भू पर ही जन जन में भू नभ जैसी दूरी पड़ी हुई है |

आँगन समतल करो, ढहाने का इसके कुछ ढंग करो तो

प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||

दुर्भावों का हिरणाकश्यप घेर रहा है सबके मन को

विषम होलिका लिपट रही है इस पावन प्रहलाद के तन को

सच पर आँच नहीं आएगी, जला असत्य अपंग करो तो

प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||

मुख गुलाल से लाल हुआ है, किन्तु न मन अनुराग रंगा है

रंग से केवल तन भीगा है, मन तो बिल्कुल ही सूखा है |

दुगुना होगा असर, नियम संयम की सच्ची गंध भरो तो

प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||

एक दूसरे पर आरोपों की कीचड़ क्यों ये उछल रही है

पिचकारी से रंग के बदले नफ़रत क्यों ये निकल रही है |

ये बेशर्म ठिठोली छोड़ो, मधर हास्य के व्यंग्य भरो तो

प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||

खींचे कोई घूँघट का पट, हाथ पकड़ कर नीचे कर दो

मत रोको गोरी के मग को, उसे नेह आदर से भर दो |

राधा स्वयं चली आएगी, सरस श्याम का रंग भरो तो

प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||

भीतर से यदि नहीं रंगा तो मिट्टी है मिट्टी का चोला

दुनिया का यह वैभव क्या है, हिम से ढका आग का गोला |

वहम और सन्देह तजो सब, मन में नई उमंग भरो तो

प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||

हिन्दी साहित्य

अमीर खुसरो - Amir Khusrau(1253-1325)

આ અદ્ભુત રચના પસંદ કરવાનો હેતુ એમાં થયેલો સૂફી પરંપરા, ભક્તિ માર્ગ અને અદ્વૈતનો સુભગ સંગમ છે. પરમ તત્ત્વ અહીં રંગરેજ છે, પ્રિયતમ છે, સંત નિઝામ્મુદ્દીન નું રુપ લઈને પ્રસ્તુત છે.

Poetry

औरत

औरत

उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे
कल्ब-ए-माहौल में लरज़ाँ शरर-ए-ज़ंग हैं आज
हौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक रंग हैं आज 49 और  शब्द

Poetry