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वह कौन है? ( कविता )

 

वह कौन थी?

जिन्दगी में उलझी-उलझी 

सब कुछ सुलझाने की कोशिश में,

बहुत कुछ झेलती हुई

जिन्दगी के सैकङो रंगों से खेलती हुई

           खङी

कुछ परेशान, कुछ हताश,

फिर भी हँसती सी।

वह कौन है?

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                                                    नारी

शून्य

क्या करना है पूर्ण पात्र का, उसका कोई लाभ नहीं है |

रिक्त पात्र हो, तो उसमें कितना भी अमृत भर जाना है ||

सकल सृष्टि है टिकी शून्य पर, और शून्य से आच्छादित है

शून्य से है पाता प्रकाश जग, पूर्ण हुआ तो अन्धकार है |

मन का अन्धकार मिट जाए, मुझको वो प्रकाश पाना है

पूर्ण हुई तो ठहर जाऊँगी, मुझे शून्य में बह जाना है ||

प्राणवायु भी शून्य कक्ष में बहती, सबको जीवन देती

कक्ष भरा हो, तो फिर वह भी भारी होकर दुःख पहुँचाती |

शून्य बने अस्तित्व, तो उसमें पीड़ा का कोई काम नहीं है

क्या करना है निजता का, मुझको सर्वस्व लुटा जाना है ||

निजता में है घोर घनापन, जिससे अहंभाव है बढ़ता

और अस्तित्वविहीन रहे तो मन आनन्दित हुआ झूमता |

पूर्णज्ञान से बढ़कर कोई और नहीं अज्ञान जगत में

बन अज्ञानी, मुझे शून्य में मिलकर नव प्रकाश पाना है ||

परम तत्त्व का भेद न जानूँ, चरम सत्य का तथ्य न जानूँ

योगी और वियोगी में क्या भेद, न मैं यह भी पहचानूँ |

मेरा राग विराग बना, मन में नीरवता भर जाता है

शून्य हुई चेतनता, मुझको नीरवता में खो जाना है ||

हिन्दी साहित्य

पाषाण (कविता )

एक थी खूबसूरत सी लड़की,

 सब से नाराज़, बेजार , 

उखड़ी -उखड़ी , थोड़ी  कटी-कटी.

पूछा , तब उसने बताया –

तलाकशुदा हैं ,

इसलिये कुछ  उसे उपलब्ध मानते हैं. 14 और  शब्द

बूंदे

बूंदे

धूँधले शीशों पर सरकती बूंदे।
बारिष के रुकने पर पेडोंके पत्तो से बरसती बूंदे।
कभी सोने सी; कभी हीरे सी चमकती बूंदे।
परिंदे की गरदन पर थिरकती बूंदे।
अपनी कोख में समाये हुए कइ इन्द्रधनु,
फलक को रंग देती बूंदे!
प्यासे की हलक से उतरते,
दरिया बन जाती बूंदे!
आँखों में छूप के बैठे तो;
कभी सितारों का झुरमुट, तो कभी ओस
और कहीं उमडकर बहती सैलाब बूंदे!
फूलों का शहद, सिपीओं का मोती
थोडी थोडी सब में मिलती बूंदे।
अपनी पानी की ऊँगली से;
कभी जलतरंग तो कभी छपरो पर मृदंग बजाती बूंदे।
– नेहल

Poetry

शब्दों का अस्तित्व

शब्दों का अस्तित्व यही, पल भर में व्यर्थ वो हो जाते हैं

किन्तु मौन की भाषा को सब युगों युगों तक दोहराते हैं |

पल भर को एक कथा सुनाकर शब्द राह अपनी चल देते

किन्तु मौन में जड़े शब्द निज छाप अमिट पड़वा जाते हैं ||

शब्दों से कोलाहल बढ़ता, नित नवीन कोई घटना घटती

और विचित्र कोई अर्थ बताकर इतिहासों में गुम हो रहती |

किन्तु मौन के अर्थ अनेकों, शान्त हृदय से समझे जाते

और नया एक काव्य रचाकर अजर अमर वो हो जाते हैं ||

शब्दों का क्या, होठों पर आते ही बासी हो जाते हैं

और पकड़ ले अगर लेखनी, मूक चित्र तब बन जाते हैं |

किन्तु मौन की अथक साधना में है देखो कितनी क्षमता

भाव होठ तक आते आते अमृत ही बरसा जाते हैं ||

बिना मौन का साधन करके शब्द अगर होठों पर आते

अर्थहीन, बलहीन बने वे भाव नहीं पूरे कह पाते |

पलें मौन के गर्भ तो उनमें अनगिन भाव तरंगित होते

अमिट छाप तब छोड़ें मन पर, सार्थकता वे पा जाते हैं ||

इसीलिये अर्थों को खोजो मौन की गहराई में जाकर

मत उलझाओ शब्दों में उनकी उस अनुपम सुंदरता को |

शब्दों का अस्तित्व शून्य है, पल भर में ही खो जाएगा

मौन की भाषा में सजकर ही शब्द अमरता पा जाते हैं ||

हिन्दी साहित्य

ये भेजा किसने प्रेम संदेसा

इन्द्रधनुष के रंगों में ये भेजा किसने प्रेम संदेसा |

सावन में जैसे पेड़ों की डाली पर हो धूप बसेरा ||

धरा पहनती मुतियन माला, पीली साड़ी अंग लिपटती |

पंछी गाते गान अनोखा, मीठी सी एक तान उभरती ||

दूर गगन के ओर छोर तक पंछी देखो उड़ते जाते |

और ओस से द्रवित निशा में राग भैरवी गाते जाते ||

राग भरा अनुराग भरा है खिला खिला सा जीवन सबका |

हर मन के आँगन में देखो सपनों का है मेला लगता ||

सजनी साजन के संग नाचे, प्रमुदित मन सिंगार सजाए |

मतवाली ये हवा करे अठखेली, मन में प्रीत जगाए ||

ऐसे में है भान किसे शब्दों का या फिर अर्थों ही का |

प्रीत पगे ये भाव ही हर एक मन को हैं महकाते जाते ||

हिन्दी साहित्य

प्रकृति भी दुलहिन बन शरमाई

मेघों ने बाँसुरी बजाई, झूम उठी पुरवाई रे |

बरखा जब गा उठी, प्रकृति भी दुलहिन बन शरमाई रे ||

उमड़ा स्नेह गगन के मन में, बादल बन कर बरस गया

प्रेमाकुल धरती ने नदियों की बाँहों से परस दिया |

लहरों ने एकतारा छेड़ा, कोयलिया इतराई रे

बरखा जब गा उठी, प्रकृति भी दुलहिन बन शरमाई रे ||

बूँदों के दर्पण में कली कली निज रूप निहार रही

धरती हरा घाघरा पहने नित नव कर श्रृंगार रही |

सजी लताएँ, हौले हौले डोल उठी अमराई रे |

बरखा जब गा उठी, प्रकृति भी दुलहिन बन शरमाई रे ||

अँबुवा की डाली पे सावन के झूले मन को भाते

हर इक राधा पेंग बढ़ाए, और हर कान्हा दे झोंटे |

हर क्षण, प्रतिपल, दसों दिशाएँ लगती हैं मदिराई रे

बरखा जब गा उठी, प्रकृति भी दुलहिन बन शरमाई रे ||

हिन्दी साहित्य