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                   प्रकृति का "आँचल"

नये साल की शुरुआत का ही तो समय था , हम अपने एक पारिवारिक मित्र के यहाँ आमंत्रित थे ,ठिठुरती हुयी सी सर्दी थी , जाकर आराम से लिविंग रूम मे बैठ गये ,बड़ी कुशलता से सजाया हुआ घर था।करीने से लगा हुआ सामान कुछ पेंटिंग्स दीवार की शोभा बढ़ा रही थी ।जरूरी नही कि ,आपका घर ज्यादा मँहगी चीजों के कारण ही आकर्षित लगे ,सादगी के साथ सजाया हुआ लिविंग रूम मुझे भा गया । मेरी आँखें दीवार पर टँगी एक पेंटिंग जो कि बहुत कुछ कवर इमेज जैसी थी उसपर जा कर ठिठक गयी ।

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कबीर बानी-Poems of Kabir

मुरली बजत अखंड सदा से, तहाँ प्रेम झनकारा है।
प्रेम-हद तजी जब भाई, सत लोक की हद पुनि आई।
उठत सुगंध महा अधिकाई, जाको वार न पारा है। 62 और  शब्द

Poetry

पहल

​कुछ समस्यायें तुम्हारी हैं

कुछ उलझनें मेरी भी हैं

दोनों एक पग दूर खड़े हैं

मतभेदों में मजबूर खड़े हैं

कोई तो रिक्तस्थान भरो

पहल मैं करूं या तुम करो !

न जाने क्यों

न जाने क्यों / आज फिर से तुम्हारी याद ने किया बेचैन मुझे

चाहती हूँ कुछ सुनना / कुछ सुनाना

पर कैसे / प्रश्न है यही सबसे कठिन

क्योंकि जा बैठी हो तुम दूर कहीं / बहुत दूर

हालाँकि जानती हूँ मैं, नहीं हो दूर तुम मुझसे

मैं जहाँ भी रहूँ / जैसे भी रहूँ

तुम जहाँ भी हो / जिस हाल में भी हो

तुम साथ हो मेरे हर पल / पूरा करती हुई मेरी हर ज़रूरत को

किसी स्वर्गीय देवी की तरह उठा हुआ है तुम्हारा हाथ

आशीर्वाद के लिए / हर पल

या किसी परी की तरह घुमाती हो कोई काल्पनिक छड़ी

और दे देती हो मुझे वो सब कुछ

जो मैंने चाहा हो / या न भी चाहा हो

अपनी ममता के ख़ज़ाने से / वार देती हो सब कुछ मुझ अकिंचन पर

क्योंकि तुम्हारा अंश हूँ मैं / पाला है तुमने मुझे अपने गर्भ में

गर्भ की वो समस्त पीड़ाएँ तुम्हें अनुभव हुईं / अपार सुख सी

सुख मातृत्व का / अपने शरीर से किसी को जन्म देने का

अहसास अपनेपन का / अपने अस्तित्व का / माध्यम से अपनी रचना के

देख मेरी हँसी / खिल उठती हँसी तुम्हारे चेहरे पर

और मुस्कुराने से मेरे / मुस्कुरा उठते तुम्हारे होंठ

धूल से मेरे तन की भर लेती थीं अपना आँचल / समझ कर पुष्पों का पराग

अपनी गोद के बिछौने पर / लोरी गाकर सुलातीं अँधेरी रातों में

डर जाती यदि कभी नींद में भी / तो सटा लेती सीने से अपने

और बाहों में भर चूमतीं मुझे बेतहाशा

गिर पड़ने पर / दौड़ कर उठा लेतीं / और पीटती ज़मीन को

देकर मीठा उलाहना “गिरा दिया मेरी फूल सी बच्ची को?”

लगती कहीं चोट / तो लगातीं आँसू का मरहम

छाती घटा दुःख की, निराशा की

या भर लेता उन्माद क्रोध का अपने आगोश में

भूल जाती मैं स्वयं को / अपने अस्तित्व को

तुम याद दिलातीं मुझे “कौन हूँ मैं”

आज न जाने क्यों याद आईं वही पुरानी बातें

जिन्हें भूली ही नहीं थी कभी / बस छिपी हुईं थीं मन के किसी कोने में

क्योंकि जानती हूँ मैं / नहीं हो दूर तुम मुझसे

तुम हो साथ मेरे सदा सदा / हर पल / पूरा करती हुई मेरी हर ज़रूरत को…

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कल्पना 

​*कल्पना कविता का अभिप्राय उस अनुपमा कन्या की छवि से है जो किसी नवयुवक के स्वप्नों में निर्मित हुई है
तुम्हारे बारे में क्या कहूं

शायद तुम कोई सौन्दर्य रस की कविता हो ,

जिसमें समस्त उपमायें सम्मिलित हैं !
नहीं तुम उन सभी दीपों का प्रकाश हो ,

जो मेरे ह्रदय रूपी आंगन में प्रज्वल्लित हैं !
या फिर तुम लेखनी हो किसी प्रेम ग्रन्थ की ,

जो पूर्णतयः हस्तलिखित है !
तुम जरूर पुष्पमाला हो उस प्रेम मन्दिर की,

जिससे समस्त स्थल सुसज्जित है!
तुम कोकिला हो उस उद्यान की,

जो तुम्हारे मधुर स्वरों से कलरवित है !
हां तुम अभिमान हो किसी तुच्छ मनुज का ,

जिसके ह्रदय में तुम्हारी मूर्ति प्रतिष्ठित है!

अब सत्य कहूं या मिथ्य कहूं !

तुम हो भी या नहीं भी ?

या फिर यह सब कल्पित है !

©Confused Thoughts

मनमीत मेरे

मैंने अपने गीत तुम्हें हैं सौंप दिये मनमीत मेरे
जी चाहे जैसे भी बहलाओ इनको मनमीत मेरे ||
चाहूँ सुनकर तुम भी झूमो गीत मेरे, मनमीत मेरे
जी चाहे जैसे भी बहलाओ इनको मनमीत मेरे ||
मैं जब भी गाती इनको, चेतनता भर जाती मुझमें
मस्त मगन हो इठलाती, ये भरते मादकता मुझमें |
मेरे दिल की आस भरी और आह भरी इन गीतों में
युवा बनी ये लहराएँ, मन भरमाए इन गीतों में ||
सावन की मधु मल्हारें हुलसाती हैं इन छन्दों में
एक अनोखा हास भरा जाता है हर जड़ चेतन में |
दीवाली की जगमग हो या रात अमावस की काली
मेरे गीतों के मधु से भर जाती दोनों की प्याली ||
रंग अबीर गुलालों वाले बसे हुए इन गीतों में
सतरंगी बन धरा मगन इतराती है इन गीतों में |
अगर मचा हो पतझर का भी शोर कभी मन उपवन में
राग बसन्त-बहार सुनाते गीत मेरे हर एक पल में ||

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ढाई अक्षर का शब्द

कल वेलेंटाईन डे है, उत्साह है समस्त युवा वर्ग में… अभी एक फरवरी को पर्व था वसन्त पंचमी का – जिसे भारतीय वेलेंटाईन डे भी कहा जाता है… जिस दिन ज्ञान विज्ञान की दात्री माँ वाणी की पूजा अर्चना करने के साथ ही सब प्रेम के रंग में रंग जाते हैं, और केवल मानवमात्र ही नहीं, सारी प्रकृति ही वासन्ती प्रेम के रंग में डूबी होती है… और संयोग ये कि वसन्त पंचमी तो आती ही वसन्त ऋतु के स्वागत के लिए है, ऐसा लगता है मानों वेलेंटाईन डे भी वसन्त के स्वागत के लिए इन्हीं दिनों मनाया जाता है | बहुत सारे लोग इस वेलेंटाईन डे के पक्ष में रहते हैं, तो कुछ ऐसे भी हैं जो इसका विरोध करते हैं |

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