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हीरे से दमकती बरखा की बूँदें

आज फिर से बारिश का दिन है |

रत भर भी छाए रहे बादल

और हलकी हलकी बूँदें

भिगोती रहीं धरा बावली को नेह के रस में |

बरखा की इस भीगी रुत में

पेड़ों की हरी हरी पत्तियों

पुष्पों से लदी टहनियों

के मध्य से झाँकता सवेरे का सूरज

बिखराता है लाल गुलाबी प्रकाश इस धरा पर |

मस्ती में मधुर स्वरों में गान करते पंछी

बुलाते हैं एक दूसरे को और अधिक निकट

आपस में मिलकर एक हो जाने को

मिटा देने को सारा दुई का भाव |

मिट्टी की सौंधी ख़ुशबू

फूलों की भीनी महक

मलयानिल की सुगन्धित बयार

कर देती हैं तब मन को मदमस्त |

मन चाहता है तब गुम हो जाना

किन्हीं मीठी सी यादों में |

वंशी के वृक्ष से आती मीठी ध्वनि सुन

और हवा से झूमती टहनियों को देख

तन मन हो जाता है नृत्य में लीन |

तेज़ हवा के झोंकों से झूमती वृक्षों की टहनियाँ

जगा देती हैं मन में राग नया

और बन जाता है एक गीत नया

अनुराग भरा, आह्लाद भरा

फिर अचानक

कहीं से खिल उठती है धूप

और हीरे सी दमक उठती हैं बरखा की बूँदें

जो गिरी हुई हैं हरी हरी घास पर |

धीरे धीरे ढलने लगता है दिन

सूर्यदेव करने लगते हैं प्रस्थान

अस्ताचल को

और खो जाती है समस्त प्रकृति

इन्द्रधनुषी सपनों में

ताकि अगली भोर

पुनः प्रभात के दर्शन कर

रची जा सके एक और नई रचना

भरी जा सके चेतनता

सृष्टि के हरेक कण कण में |

यही क्रम है बरखा की रुत में प्रकृति का

शाश्वत… सत्य… चिरन्तन…

किन्तु रहस्यमय…

जिसे लखता है मन  आह्लादित हो

और हो जाता है गुम

इस सुखद रहस्य के आवरण में

पूर्ण समर्पण भाव से……….

हिन्दी साहित्य

निदा फ़ाज़ली - चुनिंदा अशआर

ज़िन्दगी की सच्चाइयों को खूबसूरती से पेश करनेवाले निदा फ़ाज़ली मेरी नज़र में उजालों के , उम्मीदों के शायर है और हमारे दिलो में हमेशा ज़िन्दा रहेंगे …

Poetry

हम पत्ते तूफ़ान के - नीरज

वेद न कुरान बांचे, ली न ज्ञान की दीक्षा
सीखी नहीं भाषा कोई, दी नहीं परीक्षा,
दर्द रहा शिक्षक अपना, दुनिया पाठशाला
दुःखो की किताब, जिसमें आंसू वर्णमाला।

Poetry

वह सकल चराचर का साथी लगता मुझको

इस जीवन को मैं केवल सपना क्यों समझूँ,
हर भोर उषा की किरण जगाती है मुझको |
हर शाम निशा की बाहों में मुस्काता है
चंदा, तब मादकता छा जाती है मुझको ||
हो समझ रहा कोई, जग मिथ्या छाया है
है सत्य एक बस ब्रह्म, और सब माया है |
पर मैं इस जग को केवल भ्रम कैसे समझूँ
क्षण क्षण कण कण है आकर्षित करता मुझको ||
कल कल छल छल स्वर में गाती है जब नदिया
प्राणों की पायल तब करती ता ता थैया |
पर्वत की ऊँची छोटी चढ़ थकती आँखें
तब मधुर कल्पना कर जाती मोहित मुझको ||
जब कोई भूखा नंगा मिल जाता पथ पर
लगता, खुद ब्रह्म खोजता है मरघट भू पर |
चंचल शिशु तुतलाए नैनों मुझको पढ़ता
जग का नश्वर बन्धन महान लगता मुझको ||
क्या ब्रह्म कभी साथी बन पाया है नर का ?
क्या देख भूख का ताण्डव मन रोया उसका ?
मैं इसी हेतु निज शीश झुकाती मानव को
वह सकल चराचर का साथी लगता मुझको ||

हिन्दी साहित्य

मैं सदा शून्य का ध्यान किया करती हूँ

मैं सदा शून्य का ध्यान किया करती हूँ,

और अनहद का आह्वाहन किया करती हूँ ||१||

आशाएँ मेरी दृढ़, ज्यों खड़ा हिमाचल,

मानस का है प्रतिबिम्ब मेरे, गंगाजल |

रोकेगा मेरी गति को कौन जगत में,

मैं गिरि को ठोकर मार दिया करती हूँ ||२||

मेरी गति में विद्युत् जैसा कम्पन है,

वाणी में सागर के समान गर्जन है |

बादल जैसा चीत्कार किया करती हूँ,

आँधी सा हाहाकार किया करती हूँ ||३||

जग के ये सूरज चंदा चमचम तारे,

पाएँगे क्या मेरा प्रकाश बेचारे |

मैं सदा गरल का पान किया करती हूँ,

और अमृत में स्नान किया करती हूँ ||४||

मुझको लख विस्मित होता है जग सारा,

क्या जाने वह मेरे सुख को बेचारा |

चिन्ताएँ मेरे पास नहीं आती हैं,

पल पल मस्ती में गान किया करती हूँ ||५||

हिन्दी साहित्य

ये बरखा का मौसम सजीला सजीला

ये बरखा का मौसम सजीला सजीला

घटाओं में मस्ती, हवाओं में थिरकन |

वो बलखाती बूँदों का फूलों से मिलना

वो शाख़ों का लहराके हर पल मचलना ||

नशे में है डूबी, क़दम लड़खड़ाती

वो मेघों की टोली चली आ रही है |

कि बिजली के हाथों से ताधिन ताधिनता

वो मादल बजाती बढ़ी आ रही है ||

पपीहा सदा ही पियू को पुकारे

तो कोयल भी संग में है सुर को मिलाती |

जवानी की मस्ती में मतवाला भँवरा

कली जिसपे अपना है सर्वस लुटाती ||

मौसम में ठण्डक, तपन बादलों में

अम्बुआ की बौरों से झरता पसीना |

सावन की रिमझिम फुहारों के संग ही

मन में भी अमृत की धारा बरसती ||

पगलाई बौराई है सारी ही धरती

चढ़ा है नशा पत्ते पत्ते पे भारी |

कि सुध बुध को बिसराके तन मन थिरकता

तो क्यों ना हरेक मन पे छाए जवानी ||

हिन्दी साहित्य

लहराती ये पड़ीं फुहारें

इठलाती बलखाती देखो बरखा की ये पड़ीं फुहारें |

रिमझिम की मीठी तानों संग लहराती ये पड़ीं फुहारें ||

रिमझिम की अब झड़ी लगी है, प्रकृति नटी भी मुस्काई है

लहराते हर डार पात पर हरियाली भी बिखराई है |

रुत ने भी सिंगार किया है, मस्ती में भर पड़ीं फुहारें

रिमझिम की मीठी तानों संग लहराती ये पड़ीं फुहारें ||

कोयल गाती गान सुरीला, मोर दिखाते नाच नशीला

गन्ध सुगन्ध लिए पुरवाई दिशा दिशा में महकाई है |

मेघों की ता धिन मृदंग पर रास रचाती पड़ी फुहारें

रिमझिम की मीठी तानों संग लहराती ये पड़ीं फुहारें ||

पतनालों से जल की धारा गलियों से मिलने आई है

और बाहर आले में भीगी गौरैया भी बौराई है |

कागज़ की नावों को भी तो तैराती ये पडीं फुहारें

रिमझिम की मीठी तानों संग लहराती ये पड़ीं फुहारें ||

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