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अब मैं लौट रही हूँ / अमृता भारती

अब
कोई फूल नहीं रहा
न वे फूल ही
जो अपने अर्थों को अलग रख कर भी
एक डोरी में गुँथ जाते थे
छोटे-से क्षण की
लम्बी डोरी में ।

अब मौसम बदल गया है
और टहनियों की नम्रता
कभी की झर गई है —

मैं अनुभव करती हूँ
बिजली का संचरण
बादलों में दरारें डालता
और उनकी सींवन में
अपलक लुप्त होता —

मैंने अपने को समेटना शुरू कर दिया है
बाहर केवल एक दिया रख कर
उसके प्रति
जो पहले अन्दर था
प्रकाशित मन के केन्द्र में
और अब बाहर रह सकता है
उस दीये के नीचे के
अँधेरे में

अब मैंअपने को अलग कर रही हूँ
समय के गुँथे हुए अर्थों से
और लौट रही हूँ
अपने ‘शब्द-गृह’ में

जहाँ
अभी पिछले क्षण
टूट कर गिरा था आकाश
और अब एक छोटी-सी
ठण्डी चारदीवारी है ।

अमृता भारती (जन्म 1939)
आधुनिक हिन्दी कविता की विशिष्ट हस्ताक्षर और हिन्दी की दार्शनिक कवि।
source :kavitakosh.org

Poetry

कालान्तर - Then And Now

कैशोर्य के उन दिनों में मैं
सुबह की ख़ुशियों से भर जाता था,
पर शामों में रुदन ही रुदन था ;
अब, जबकि मैं बूढ़ा हूँ

Poetry

भारत का भविष्य

उस बालक की आँखो मे तमन्ना मरी ना थी जो अब भीख मांग रहा है,

उसकी आशायें थमी ना थी जो अब यूँ कराह रहा है,,

रो कर वो यूँ देख रहा है शायद वह कुछ बोल रहा है,

लेकिन इस भागदौड़ मे क्या कोई उसकी सुन रहा है?

पर हम थे अंधे पहले अब तो बहरे भी हो गये

दुत्कार के भविष्य देश का हम तो आगे चले गये,,

कोई कुछ बोला था कि देश तरक्की कर रहा है,

मै कहता हूँ भारत का भविष्य आज भीख मांग रहा है,,

जब तक ना ये विनाश रुकेगा,

कोई मुझे बताये ये देश कैसे आगे बढ़ेगा,,

शिवम् दूबे…

Hindi Poem

Sunshine - Gulzar

Sunshine

A golden sun shines

on floating islands

in the cosmos.

The rarefied mist

has slipped aside.

Your face

quivers in my palms.

The morning cupped… 49 और  शब्द

Poetry

A Moment in Time - एक लम्हा

Life is the name given to a few moments, and
In but one of those fleeting moments
Two eyes meet eloquently
Looking up from a cup of tea, and… 68 और  शब्द

Poetry

अपने पराए हो गए

कुछ ख्वाब हकीकत हो गए,
और कुछ हकीकत ख्वाब हो गए,
जिंदगी ने ली कुछ करवट ऐसी,
कि कुछ पराए अपने हो गए,
और कुछ अपने पराए हो गए।
-सन्नी कुमार

मेरी कविता

.......कि जब तक 'साँस' चलती है कोई कंधा नहीं देता

मोहब्बत करने वालों को कोई रास्ता नहीं देता, 
जमीन वाकिफ नहीं बनती फलक साया नहीं देता.. 

हिन्दी कविता