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काव्य कणिका

छोडो ये किताबोसे सीखना

कुछ हम तुमसे सीखे

कुछ तुम हमसे सीखो….

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ऐसे आदमीओ से तो बहुत डरते है हम.

एक तो जूठ बोलते है

फिर कहते है आपकी कसम……

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दर्द की तो हमें आदत पड गई,

बेदर्दो के साथ वास्ता है जो…..

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बेदर्दो से दर्द नहीं मिटता,

दर्द मिटा ने केलीये हमदर्द चाहिए.

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केसी गजब दुनिया है ये Word छुपाने केलिए Password चाहिए….

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जिसकी राह पे हम चलने निकले, क्या करू इन्होने ही राह बदलली…..

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हर घडी वो घडी नहीं रहेती, जिसका घडी घडी इंतजार करते थे,

पल तो आकर चला जाता है, जिसका पल पल इंतजार करते है.

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वख्त को इल्जाम मत दो, उसका तो काम ही है चलाना,

एक हम ही है की वख्त के साथ चल न पाए, इल्जाम वख्त को देते है….

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मे हिन्दू, मे मुस्लिम करते है एक-दुसरे पे वार,

समजते क्यों नहीं यार, हम है एक परिवार.

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मुस्कराहट मुस्कराहट में फर्क है……

किसी के साथ भी मुस्कुराया जाता है,

और किसी पर भी मुस्कुराया जाता है.

मुस्कराने  से रिस्ते जोड़े भी जाते है,

मुस्कराने  से रिस्ते तोड़े भी जाते है.

  • नितिन गज्जर
हिन्दी कविता

दम्भ - The ego of a capitalist

दम्भ

थिरक रही अभिमान निहित झनक झंझावत ,

सकल दया-मेघ निज शीश्चुम्ब अविरल बरसत;

निज पद विस्तृत भूमि-विरचित मनहु कृपा ,

मोहे ही बस रखे भिगोये, शेष वारि लूं हथचंद्र छिपा |

भीग जो हों नृत्य अदा जाएं निज गात मचल ,

कृपाजनित प्रभु गंगाजल हस्तकमल में किन्तु अचल ;

पीता जाऊं एकत्रित कर बूँद-बूँद नशे में मद होकर ,

झरता जाऊं नमक-जल डूबें चाहे सर्वजन दु:श्रम सागर |

कुछपे आशिष दऊँ अतिरेक विखंडित |

कनीं जल झरऊँ दम्भित विचम्भित ||

दुष्कर्म हमें करना होगा अज्ञानी पर ,

सद्धर्म कठिन चलना पीड़ा अनजानी कर ;

पूत तुम्हारे किंचित् बेध्यानी कर ,

छोड़ रखा वाचाल कृपा मरु-तप्ताणी पर |

मन उदास न चंचल गाछ |

ढूंढे कोई मिल के चरण नाथ ||

जय श्री राम !