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Fiction: An Introduction to Jasper

I lay on the cool, fresh grass, the sweet scent filling my nostrils. This was my favourite time of day; the twilight hours deep in summer, when the light became magical. 1,412 और  शब्द

Erotic Fiction

The Old Fashioned Way

Tanya knocked upon the Poet’s door, on an afternoon when his wife just happened to be away visiting her mother, on a mission to secure money for a plane ticket. 203 और  शब्द

Erotica

मल्हना भाग 8

कलावती, स्वामी पिछले कुछ दिनो से में गरम भैंस की तरह तड़प रही हूँ मेरा अंग अंग पुरुष का स्पर्श चाहता है कसम काली मैया की अगर में पहले जैसी साधारण स्त्री होती तो किसी भी मर्द पे चढ़ जाती आखिर क्यूँ तडपा रहे हो?
स्वामी मंदिर के खम्भे से सटा हुआ मुस्कराता है और कलावती मंदिर से सटे हुए बाग़ से पुष्प चुन रही होती है
“देखो ये गेंदे का पुष्प मेरे सिर पे कैसा लग रहा है”

स्वामी ने कोई जवाब ना दिया
कलावती अब एक गुलाब को तोड़ के अपने शरीर के एकलौते कपडे को स्तन के पास ढीला करके स्वामी के ध्यान को पाने के लिए एक छोटा कंकड़ उसकी तरफ उछालती है आखिर में उसे अपनी धर्म पत्नी की ओर देखना ही पड़ता है
कलावती ध्यान पाकर तुरंत गुलाब वाले हाँथ को अपने स्तनों तक पहुंचा देती है और स्वामी को इशारा करती है “कैसा लगा”
स्वामी ने चुप्पी तोड़ी ठीक है आज रात हम मिलन करेंगे कलावती ख़ुशी से मंदिर के ऊपर चढ़ जाती है और स्वामी का हाँथ पकड़कर गुफा की तरफ खींचती है

स्वामी हाँथ छुड़ाकर, सब्र करो रात तो होने दो
कलावती अपनी योनी खुजाती हुयी, अब तसल्ली नहीं होती मन तो करता है है यहीं मंदिर में सबके सामने तुम्हारे लिंग पे बैठके झूला झूलूं
तुम सोचते होगे कैसी उतावली स्त्री मेरे पल्ले पड़ी है, पर में तो ऐसी ही रहूंगी हमेशा…उतावली ना मर्दों का क्या भरोसा किस छिनार के पल्लू से बंध जाये

स्वामी, देखो कलावती अपनी वाणी को सुधारो अब तुम गाँव के सबसे बड़े मंदिर के रखवाले की पत्नी हो
कलावती, रखवाले नहीं, मालिक हो आप| सिर्फ आपकी वजह से दूर दूर से लोग आते है| आपसे पहले तो कोई चिरैया भी झकने न आत रही|

स्वामी, “इस बात से क्या प्रयोजन है इस बात से किसी का क्या फायदा हो सकता है कितनी बार कहा है वाणी पे ध्यान दो और फालतू कम सोचो|”
कलावती हाँथ जोड़ के ठीक है प्रियतम!… फिर अपने रूप और हुस्न की थोड़ी कला दिखाती है और अचानक अपना हाँथ स्वामी के पजामे पे रख देती है ये सुनिश्चित करने के बाद कि उसका लिंग तन गया है तिरछी नजर से बदमाशी हंसी हंसकर चल देती है

स्वामी, “सुनो! ध्यान कर लेना ध्यान से, मन शांत होकर पूर्णता वर्तमान में आने से सम्भोग 1000 गुना आनंद देता है में कुछ अँधेरा होने पर ही गुफा में आऊंगा”

मन्दाकिनी खटिया से उठकर जमींदार को स्नान घर में खीच ले जाती है जल से अपने और पति के जननांग साफ करती है जमींदार के लिए सब नया था

मन्दाकिनी बाहर आकर खटिया पे बैठकर एक हाँथ में मलाई का पारा उठाती है मलाई हथेली पे उठा के लिंग पे अच्छे से चुपेरती है जमींदार का दिमाग काम करना बंद कर जाता है उसने तो इन सब की कल्पना भी ना की थी वो तो सिर्फ घोड़ी बनाकर सीधे लिंग योनी में प्रवेश करा देता था और कुछ धक्कों के बाद उतरा हुआ चेहरा लेके घूमता था सही अर्थों में तो वो अपने पूरे जीवन में संतुष्ट नहीं हुआ था

मन्दाकिनी लिंग को अपने मुंह में ले लेती है जमींदार के पेट में झटके से लग रहे थे पर मन तो रोमांचित हो चूका था मन्दाकिनी लिंग को गले तक घुसेड़ने लगी मन में सोचती है कि लिंग थोडा और लम्बा होना चाहिए आज से इसे लम्बा करने की कार्यवाई शुरू करुँगी लिंग को चुसना जारी रखती है जमींदार का आनंद बढ़ता ही जरा था वो मन्दाकिनी के बाल पकड़कर सिर को तेजी से आगे पीछे करने लगा

मन्दाकिनी मन में, “हे भगवान पता नहीं मुझे कितना समय लगेगा इस बेवक़ूफ़ को एक इन्सान बनाने में” उसने जमींदार को मजा चखाने की सोची लिंग को हलके से काट लिया
जमींदार का दर्द से हाँथ छूट गया मन्दाकिनी फिर से धीमे धीमे लिंग चूसने लगी अब खुद उसने जमींदार का हाँथ अपने सिर पे लगा लिया जमींदार अपने हाँथ इस्तेमाल नहीं करना चाहता था मन्दाकिनी जमींदार का हाँथ अपने हाँथ में लेके अपने सिर की गति पर नियंत्रण करने लगी जमींदार अब धीरे मन्दाकिनी का सिर आगे पीछे करने लगा
मन्दाकिनी लिंग को बायीं व दायीं दाढ़ में भरकर बारी बारी से अन्दर बाहर करती है जमींदार झड़ने को था पर वो लिंग को बाहर निकालने की हिम्मत नहीं कर पाता
मन्दाकिनी चेहरे से समझ जाती है की जमींदार अब टिक नहीं पायेगा वो तुरंत लिंग बाहर निकाल लेती है “प्रिय साँसे ऊपर की तरफ खींचो” लिंग से ढेर सारा थूक जमीन पे चू रहा था

साँसे ऊपर की ओर लेने से जमींदार झड़ने से बच जाता है मन्दाकिनी अपनी एडियों पे नितंभ टिकाकर योनी पे ढेर सारी मलाई लगाती है

अब जमींदार को जमीन पे लिटा देती है वो लेटने में थोड़ी आना कानी करता है उसका एक उसूल था कि औरत की जगह आदमी से नीचे होती है इसलिए उसने आज तक किसी भी औरत को अपने ऊपर नहीं आने दिया था परिणामस्वरूप वो कभी हंसलीला आसन में सम्भोग नहीं कर पाया था

मन्दाकिनी बहुत ही हटी महिला थी वो जमींदार के ऊपर आने में सफल रही जांघो पे बैठ के लिंग को अपनी योनी में प्रवेश करा देती है अब वो लिंग पे ऊपर ऊपर नीचे हो रही थी उसकी वक्राकर कमर उर्ध्व व्रत पे नीचे से ऊपर, ऊपर से नीचे जा रही थी मन्दाकिनी आसन बदलने की सोचती है दो दिन पहले तक खुद को बुढिया समझने वाली महिला बहुत ही तजुर्बेकार सम्भोग में रत थी वो अब उठके चल देती है इस पूरे मंजर में मन्दाकिनी एक नदी थी जमींदार सिर्फ उसके साथ बह रहा था

मन्दाकिनी बांस की सीडियों पे दो दडके चड़कर अपने नितंभ हवा में उठाकर जमींदार को इशारा करती है “मेरे पीछे आ जाओ”

मन्दाकिनी के जांघो से लेके कमर तक का हिस्सा हवा में उछल रहा था कभी कभी घुटने पेट से अड़ जाते जिससे उसको हल्के दर्द का अहसास हो जाता इस आसन में ज्यादा देर तक सम्भोग असंभव था दोनों खटिया पे आ जाते है दोनों फूली हुयी रोटी के दो भाग की तरह लिपटे हुए अपने होंठों को चुम्बक बनने की स्वतंत्रता दे देते है पर जमींदार दो कदम आगे था वो स्तन भी मसल रहा था तथा कमर भी चला रहा था मन्दाकिनी जमींदार के नीचे दबी हुयी आनंद व मीठे दर्द से कराह रही थी

आगे के भाग naturalecstasy.ga पर

Erotic Stories

Amnesia (Erotic Short Story, M/M)

This story includes no actual sex (I know, sad faces all around), and clocks in 489 words.<3

Clay couldn’t quite dislodge his boot from the tight crack in the red rocks and ended up slipping his foot out. 487 और  शब्द

Meno Silencio

मल्हना भाग 7

रूपवती अपने घर का काम समेट सिर पे गोबर की डलिया रखके कंडे पाथने को निकलती है गाँव में बढे बूढ़े जवान मर्द औरत सब उसे आंखे फाड़ फाड़ के देख रहे थे
एक हुक्का की गफलिया से बुड्डा बोला वाह भई वाह रूपवती आज बहुत कटीली लग रही है
“अरे काका आंखे खोल के देखो आज वो सुबह सुबह ही श्रृंगार करके आयी है”
“बिटवा मुझे दिख तो रहा है पर ये समझ नहीं आ रहा कि कन्डो के बहाने किसके साथ मजे करने जा रही है एक बार मिल जाये तो पैरों का दर्द दूर हो जाये”, बुड्डा ने अपने परियों पे हाँथ फिराया, पूरी गफलिया हंसने लगी, “क्या खूब कहा काका”
टकला आग बबूला हो रहा था ये सब उसके बर्दाश्त के बाहर था “वाह मेरे खुसड़ बुड्डे धरती पे बोझ ठरकी नालायक साले तेरी छोटी बेटी की उम्र की रूपवती काकी”
बुड्डा वहां से खिसक लिया सभी के मन में बस एक सवाल था “आज टकला को क्या हो गया बड़ी अजीब बात बोल गया”

रूपवती अपनी साड़ी और पेटीकोट थोड़ा ऊपर खींचकर कमर में घुस लेती है फिर गोबर को मीजने लगती है उसके मन में पिछले दो दिनों की रति क्रिया की बातें चल रही थी बीच बीच में उसकी मुस्कान छूट जाती
टकला की अम्मा पद्मा, “अरे कमीनी क्या सोच सोच के हंस रही है मुझे भी बता”
अरे जिज्जी आ गयी, वो कुछ नहीं मुन्ना की बातें याद करके हंस रही हूँ
“अच्छा मुन्ना की बातें क्या बातें?”
“अरे जिज्जी कोई दूसरा घरवाला देख लो तुम्हारा शरीर अकेले रहने लायक नहीं है इसे तो नर के प्रेम की जरुरत है“, रूपवती कुछ बातें बनाने की कोशिश करती है

पद्मा के गाल लाल हो जाते है वो शर्माकर अपने ढके हुए ब्लाउज को सफ़ेद पल्लू से और ज्यादा ढकने की कोशिश करती है
“चल कुछ भी बोलती है”
“अरे जिज्जी कुछ भी नहीं सच बोलती हूँ, तुम कितनी भी कोशिश करो अपने योवन को ढकने की| तब भी धोती ब्लाउज के नीचे के उभार को समझा जा सकता है”

“चल बातें मत बना, तू ये बता ऐसी क्या बात है मुन्ना की| कि तू मुझे गोल गोल घुमा रही है”
“अरे जिज्जी तुम मानोगी नहीं लो सुन लो, आजकल वो बहुत मेहरबान चल रहे है आज सुबह…”, इतना कहकर रूपवती मंद मंद मुस्कराती है
अब पद्मा ठहाके लगा के हंसने लगती है,”खोदा पहाड़ निकली चुहिया”
अरे जिज्जी उसे देख रही हो एक औरत की तरफ ऊँगली करती हुयी, एक गोरी चिट्टी जवान औरत सिर से पैर तक गहनों से लदी बनारसी साड़ी के ऊपर काली चुन्नी में सिमटी हुयी नयी नवेली दुल्हन की तरह छोटे पग के साथ हिरनी जैसी हिलती हुयी चल रही थी
“अरे ये तो “सोना” है अपने करमचंद की लुगाई”

“पर जिज्जी इसका खसम तो दुसरे गाँव में पड़ा रहता है कभी होली दिवाली आ जाये तो आ जाये और ये कितनी चिकनी लग रही है इसका खसम तो मजदूरी ही करता और ये तो जमिदारन लग रही है”
“अरे पगली कहाँ रहती है तू जमींदार दिन रात इसपे चड़ा रहता है और गाँव में बूढ़े अधेड़ जवान सबके नीचे से, ये निकल चुकी है| उसी से इसने माल कमाया है सही का जमाना नहीं है गलत काम करो मजे में रहो”
“पर जिज्जी एक बात बताऊँ बुरा मत मानना, एक शाम टकला को मैंने सोना के घर से निकलते देखा था”
पदमा के आँखों में खून उतर आता है वो तुरंत उठ के चल देती है “अरे जिज्जी कहाँ चलीं सुनो तो सही”
पर पदमा तो सीधे अरहर के खेत की सीध लगा जाती है उससे पतली और जानदार लग तोड़ के तेजी से अपने घर चल देती है
गाँव में घुसते ही औरतों के अभिवादन सुनने को मिलते है “जिज्जी थोडा बैठ लो”
पर पदमा सीधे घर पहुँचती है उसकी बेटी उर्वशी बर्तन धो रही थी “टकला कहाँ है? और तुझसे कितनी बार बोला है कि दरवाजा बंद करके रखाकर, हमेशा चुन्नी डाल के रहा कर, ये पहाड़ किसे दिखाती है, ऐसा ही खसम के भी यहाँ करना”
उर्वशी, “अम्मा वो छत पे है”

अरहर की लग लेके छत पे चढ़ जाती है टकला लेटा हुआ चंद्रवती के ख्यालों में डूबा था
पदमा सबसे पहले तीन चार डंडे टांगो में चटकाती है टकला बिलबिला जाता है “अम्मा क्या हुआ? सुन तो” “में आज कुछ नहीं सुनूंगी” पद्मा रुकने का नाम ना लेती हाँथ पैर पीठ पेट सब झार के रख देती है
टकला वहीँ सिकुड़ के रोता रहता है
अब पद्मा नीचे उतर के आती है साड़ी उतार के रख देती है और बैठ के गोबर से सने हाँथ धुलने लगती है
फिर ब्लाउज निकालकर वहीँ घेरे में नहाने के लिए बैठ जाती है पहले एक लोटा पानी सिर पे डालती है उसका माथा थोडा ठंडा होता है
पेटीकोट ढीला करके अपना हाँथ योनी पे ले जाती है योनी रगडती हुयी “उर्वशी उर्वशी कहाँ मर गयी”
“का है अम्मा!”

पद्मा अपना हाँथ बाहर निकालकर, “इधर तो आ मेरी पीठ रगड़ दे”
टकला छत ही छत घर से बाहर निकलकर गाँव के बाहर चल देता है एक आदमी, “ओये टकला कहाँ जा रहा है रोयी सी शकल लेके”
टकला गुस्से से खीजकर, “तेरी जिज्जी से मिलने”, पता चल गया?
टकला तालाब में नहा के एक पेड़ के ऊपर चढ़ जाता है मोटी पिंडी खोजकर उसी पे लेटकर सोचने लगता है “इतना प्यार करने वाली अम्मा ने आज मुझे क्यूँ पीटा? क्या बात हो सकती है? कहीं चंदा काकी ने तो शिकायत नहीं कर दी?”

जमींदार आज फिर खेतों की तरफ नहीं गया
बटेश्वरी, “काका तुझे क्या लगता है जमींदार के ना आने से काम में तीव्रता आयी है”
“बिटवा एक दम सही बात बोले हो काम में तेजी आयी है साथ ही मजदूर भी खुश है”
“काका स्त्रीयों को देखा है? पल्लू अल्लू एक तरफ करके कमर में घुसेड़, सर्रा के कटाई कर रही है पुरुषों की हाँफी छूट जाती है उनके साथ चलने में”
“हाँ अब उनका बहुत सारा समय धोती और घूंघट सँभालने में व्यर्थ नहीं होता है पर बेचारी मल्हना के व्यवहार में अभी भी कोई बदलाव नहीं आया”
“काका मुझे तो उस बेचारी पे बहुत तरस आता है सोचता हूँ इसके गाँव जाऊं और इसके बारे में पता लगाऊं शायद में कोई मदद कर सकूँ”
“बात तो सही है आखिर इन्सान ही इन्सान के काम आता है”
बटेश्वरी मल्हना को लेके गहरी सोच में चला जाता है

पदमा, उर्वशी देख तो कौन दरवाजा खटका रहा है
दरवाजा खुलता है सामने सोना खड़ी थी, “अम्मा सोना काकी है”
पद्मा का आराम हराम हो जाता है तुरंत उठ के बैठ जाती है “आज इस सोना को भी देख लेती हूँ इसकी वजह से मुझे अपने लाल पे पहली बार हाँथ उठाना पड़ा”
सोना घर में घुसकर “कैसी हो जिज्जी?”
“जिन्दा हूँ”, पद्मा ने जवाब दिया
“अरे जिज्जी ऐसी बातें काहे करती है अभी तो तू 10-12 बच्चो की अम्मा बन सकती है”
“तू आज इधर का रास्ता कैसे भूल गयी, टकला से मिलना है?”
नही जिज्जी! वैसे टकला बहुत अच्छा लड़का है उसे कोई काम की कहो तो तुरंत कर देता है कुछ देने पहले मेरा बच्चा बीमार था तो टकला रात में ही दवा लाके दे गया| मेरे लिए तो वो देवता निकला जुग जुग जिए वो| गया कहाँ दिख नही रहा है? अरे हाँ भूल ही गयी वो आज रूपवती जिज्जी मिल गयी थी, तू आज गोबर की डलिया वहीँ भूल आयी थी? रूपवती जीजी ने कहा तेरा घर उधर ही पड़ता है डलिया देती हुयी निकल जाऊँ ले डलिया अब में चलती हूँ”

पद्मा गुस्से में “आ सोना बैठ और बता जमींदार कैसा है?”
अब तो सोना फूट फूट कर रोने लगी जीजी उस कमीने ने मेरी जिन्दगी बरबाद कर रखी है जब इस गाँव में ब्याह कर आयी थी तभी से उसकी नजर मेरे पे थी कभी रास्ते में कभी मेरे घर आकर गन्दी गन्दी मजाकें करता मैंने कई बार उसे खरी खोटी सुनाई एक बार तो मैंने ये तक कह दिया कि अपनी माँ बहिन से मजाक किया कर तो कमीने ने जवाब दिया उनसे मजाक करके थक चुका हूँ और ज्यादा ज्ञान मत दे हमारी कोई माँ बहिन नहीं होती
पर फिर भी में उसके शिकंजे में नहीं आयी, पद्मा सारी बातें सुन रही थी
जीजी फिर उसने मेरे पति पे दवाब बनाया उसे डराया धमकाया मार पीट भी की यहाँ से नौकरी छुड़ाकर अपने बहिन के गाँव में नौकर बनवा दिया ताकि वो मेरे साथ ना रह सके तब से लेकर आज तक वो मेरा बलात्कार कर रहा है उसकी बहिन की भी इसमें मिली भगत है वो मेरे मर्द को छुट्टी नहीं देती ये अमीर लोग सराफत का चोला ओढे हुए सबसे नीच भेडिये होते है

जमींदार ने मेरी बदनामी में कोई कसर ना छोड़ी दिन रात मेरे घर में अपने आदमीं भेजता ताकि गाँव वालों को ऐसा लगे जैसे में बाजारू औरत हूँ
पद्मा टुकुर टुकुर बातें सुन रही थी पर उसके मन में फिर भी संदेह था वो सोना के श्रृंगार पे चित्त लगायी थी
और जीजी ये श्रृंगार ये कपडे और ये गहने उसी के दिए हुए है और मुझे पहनने पड़ते है ना तो वो कमीना बहुत पीटता है
पद्मा अब उसकी बातों से पिघलने लगी “में क्या सोची थी और ये क्या निकला आज मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गयी अपने प्राणों से प्यारे बेटे को आज इतना पीटा” उसका कलेजा फटने लगा वो रूआसी सी हो आयी

और जीजी तुम्हे क्या बताऊँ औरतें मेरे योवन के बारे में बातें करती है में तुम्हे हकीकत बताती हूँ मेरे दो बच्चे हुए इस कमीने ने 15 दिन भी स्तनपान नहीं कराने दिया बीती बातों को याद करके सोना सिर पटक पटक के रोने लगी
पद्मा ने सोना को अपनी छाती से लगा लिया सोना “बहुत हुआ ये जुलम अब मेरे रहते ये संभव नहीं है मेरे बाबूजी ने भी मुझे पहलवानी सिखाई थी कसम काली मैया की अगर मैंने इस जमींदार की टांगे चीरकर दो टुकड़े ना किये तो में अपने बाप की औलाद नही”
पद्मा खड़ी होकर अपने जांघ पे तेज हाँथ मारती है, “सोना चुप हो जा इस गाँव के मर्दों ने चुडीयाँ पहन रखी है तो क्या हुआ? में इस गाँव से जुर्म का सर्वनाश करुँगी अब तेरे रोने के दिन गये रोयेगा तो अब जमींदार वो भी खून के आंसू”
उर्वशी जा काकी के लिए पानी ला फिर उसके लिए रोटी परस देखती हूँ में इस हराम के जने को|
सोना थोडा पानी अपने चेहरे पे डालकर बाकी का पानी पी जाती है, “जीजी में खाना नहीं खाऊँगी”
पद्मा अपना हाँथ सोना के पीठ पे रख देती है क्यूँ ना खाएगी सोना के शरीर में दर्द की लहर दौड़ जाती है
पद्मा क्या हुआ अब? वो सोना की चुन्नी हटा देती है ये क्या खून जैसा? पीठ से धोती भी हटा देती हाय ये तो घाव है उस भड़वे ने ही किया होगा ये?
पद्मा को रह रह के गुस्सा आ रही थी वो तो बस जल्दी से जमींदार के पूरे वंश को खतम कर देना चाह रही थी
सोना, तू बैठ के खाना खा
“पर तुम कहाँ चली जीजी सुनो तो सही”

“तू बैठ अभी आयी”, पद्मा दरवाजे के पास जाके कुण्डी अटका के वापस खटिया पे आ जाती है| फिर सोना को सांत्वना देने लगती है “तुझे अब ये झूटे श्रृंगार और महंगे कपडे दवाब में पहनने की जरुरत नहीं है तू निडर होके रह अबकी बार वो तेरे घर आए तो तू मेरे पास चली आना देख लुंगी उस हिजड़े को” “वो असल माल खाता है इसलिए अभी चल भी रहा है हम लोगों जैसा मेहनत का खाना होता तो सारी नसे खिंच चुकी होती अपने आप को बहुत मर्द समझता है बहुत सुना है जमींदार का गरम खूनन….बहुत झूठे दिखावे करते है ये लोग, पद्मा ने अपना मुंह बनाया
जवानी.. मर्द घोड़े.. गरम खून.. जमींदार का वंश.. इनका वही किस्सा है “अधजल गगरी छलकत जाये” मर्द तो हम लोगों के पति होते है बिलकुल पानी की तरह जो एकदम मुलायम और लचीला होने के बाबजूद सबको अपनी दिशा में बहा ले जाने की सच्ची ताकत रखते है
और तू चिंता मत करना इसकी बहिन से तेरे पति को भी आजाद करा दूंगी वो तो में इन भेडीयों की तरह नहीं हूँ ना तो में उस रंडी को कोठे पे बैठा के दम भरूं

उर्वशी मन में सोचती है अम्मा कितनी भावुक स्त्री है अब ये एक दो दिन तक इसी के बारे में सोचती रहेगी
पद्मा, “मुझे तो इश्वर पे भी शक होने लगा है, सोना हमारे घरों के मर्द ना औरत सब, इन अमीरजादों के छोटे बड़े सबकी इज्जत करें, पर सोना हमे बेज्जत करने वाले सिर्फ ये चंद जमींदार और इनके जैसे अमीरजादे है इनकी सेवा करो और ये, ये तो हमारी स्त्रियों के बदन नोंचने के बारे में ही सोचते रहते है, बहुत हुआ अब|”
सोना अपने घर चली जाती है अब शाम होने को थी पद्मा का विचार उसके बेटे की तरफ जाता है “हाय क्या ये छत पे ही पड़ा है उर्वशी देख तो”
“अम्मा छत पे तो नहीं है वो अपने घर के पीछे से नीचे उतर गया होगा वो तो पूरा बन्दर है”
“उर्वशी तुझे मजाक सूझी है पर मुझे बहुत बैचैनी हो रही है सुबह से भूखा है पता नहीं कहाँ भटक रहा होगा”
“परेशान ना हो शाम तक आ जायेगा अम्मा तू कहे तो आज शाम टकला के मन का खाना बनाऊ”
पद्मा हामी भरती हुयी खटिया पे लेट जाती है

जमींदार के घर अब नौकर चाकर आ गये “मालिकिन सुबह हम दरवाजा पीटते रहे पर”
मन्दाकिनी, हाँ, वो मैंने कुछ सोचा है तुम लोगों के लिए
“क्या मालकिन” यही कि तुम सबको जन्मो से चली आ रही इस गुलामी से आजाद कर दूँ इसलिए अब तुम सब आजाद हो अपनी जिन्दगी ख़ुशी से जियो
हमने कितना भी सच को स्वीकार करने से इंकार किया हो पर इस बात में सच्चाई है की हमारे पूरवजो ने तुम पे जानवरों से भी बत्तर सुलूख किया है हम अपनी इस भूल को सुधारना चाहते है हो सके तो हम लोगों को माफ़ कर देना
सभी नौकर प्रणाम करके चले जाते है जमींदार पे फिर से जमींदारों का अंश हावी होने लगा
मन्दाकिनी तुरंत जमींदार को शांत कर देती है “पहले मेरी सुनो” वो तुरंत अपना ब्लाउज खोलके एक स्तन जमींदार के मुंह के अन्दर कर देती है जमींदार कुछ नहीं बोल पाता है वो तो बस क्रम बद्ध तरीके से स्तनों को चूसते हुए अपनी पत्नी को सुनने लगता है
इस घर में प्रकोप है कभी दिमाग शांत करके सोचो तुम्हे हजारों लोगों की चीखती हुयी आत्माए दिखाई देंगी जमींदारो और उनके पूर्वजों ने बहुत अत्याचार किये है मासूमों पर उन्होंने बच्चे तक न छोड़े बताओ इंसानों की खरीदारी हुआ करती थी बड़े बड़े ज्ञानी लोग भी गुलाम रखते थे बेचारी माँ का मालिक एक, बाप का मालिक कोई दूसरा, उनके परिवार बिखरे रहते थे अपनों से बिछड़ने का दर्द क्या होता है उनके झूठे गुरुर ने कभी समझने की कोशिश ना की नौकर और नौकरानियों पे इतने जुर्म हुए है कि उनपे जुर्म अब जुर्म नहीं लगते ऐसा लगता है ये तो मालिक का अधिकार है
पत्नी, “तुम्हे पता है?..”, जमींदार एक भूखे की तरह जोर जोर से स्तन चूसने में लगा था| दो तीन दिन सम्भोग ना करने से उसका लिंग तेजी से तन रहा था उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसके दिमाग की नसे खुल रही हों अब उस रात का बुरा सपना भी जाता रहा मन रोमांचित हो उठा, उसका हाँथ पेटीकोट के नाड़े की खोज में था उसे आशा थी की आज एक जोरदार सम्भोग होगा
पर मन्दाकिनी बीच बीच में कराहती हुयी अपनी बात जारी रखती है “पता है कितने ही मालिक अपनी नौकरानी को भोगने की इच्छा रखते है”,आह..आह..धीरेरेरे..चूसो में छूट जाउंगी

“ऐसा इसलिए है की उनके पूर्वज ऐसा करते आए है नौकरानियों से जबरदस्ती करने में उन्हें कोई अपराध भाव नहीं होता पर इसके भयंकर दुष्परिणाम होंगे ऊपर वाले के यहाँ देर है पर अंधेर नही”
अब दोनों एक दुसरे को बिछड़े प्रेमियों की तरह चूमने लगते है जमींदार अपनी पत्नी के ऊपर आ जाता है अपनी तर्जनी सट से योनी में घुसेड़ देता है मन्दाकिनी थोडा उछल जाती है जमींदार तुरंत उसके होंठ गपक लेता है और उसकी जीभ अपने मुंह में भर लेता है कुछ देर ऐसे ही चूसड के बाद मन्दाकिनी उलझे हुए ब्लाउज पेटीकोट को जमीन पे फेंक के रसोई की तरफ बढती है एक दुधाड़ी दूध में शक्कर मिलाके पारे सहित उठा के आँगन में रख लेती है फिर अपने नितंभ जमीन पे टिका के टांगे चीरकर बैठ जाती है उसके बाल जमीन को छू रहे थे वो थोड़ी मलाई पारे में निकालकर दूध को फेंट रही होती है जमींदार भी नीचे बैठ जाता है
मन्दाकिनी दुधाड़ी उठाकर जमींदार के मुन्ह से लगा देती है जमीदार दूध गटकना शुरू कर देता है दोनों आधा आधा दूध गटक लेते है जमींदार अपनी पत्नी की छाती पे बह रहे दूध को चाटकर फिर से स्तन चुसना शुरू कर देता है
मन्दाकिनी योनी रस छोड़ने लगी थी जमींदार अपनी ऊँगली उसकी योनी की तरफ बढाता ही है की वो पीछे हट जाती है उसे पता था की अगर योनी से छेड़ छाड़ हुयी तो तुरंत सम्भोग करना पड़ेगा
“प्रिय अभी पेट भरा है आधे घंटे बाद सम्भोग करेगे नहीं तो प्रेमसुख दुखदायी हो सकता है”
जमींदार ये सुन के आंखे लाल ताल करने लगता है पर मन्दाकिनी से कुछ कह नहीं पाता है
दोनों चारपाई पर आकर लेट जाते है मन्दाकिनी अपने पति की तरफ करवट लेके चुम्बनों की शुरुआत कर देती है

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मल्हना भाग 6

आज रूपवती ने सुबह सुबह ही नहा धोकर बिंदी टिकुलिया करके ही भोजन पकाने की शुरुआत की गुलाबी रंग की साड़ी हरा सिल्क का ब्लाउज सिर के जुड़े से अटका पल्लू और चेहरे पे संतुष्टि व ख़ुशी के मिले जुले भाव|
बटेश्वरी जब गाँव घुम के अपने घर में प्रवेश करता है तो चूल्हे के पास चौकी पे सजी धजी रूप की रानी को देखके मन ही मन इश्वर का शुक्रियादा करता है “हे ईश्वर तूने मुझे क्या क्या दिया! पर में तो उन चीजों की कभी क़द्र ही नहीं की”
रूपवती, “अरे आ गये बहुत देर लगा दी आज” अब उन्हें एक पल भी एक दुसरे के बिना भारू लगने लगा था
“अरे देर क्या तालाब पे नहाने गया था तो वहां पता नही कौन स्त्री पहले से ही मौजूद थी, फिर मुझे कुंए पे जाना पड़ा”
“तो क्या हुआ वहीँ तालाब में ही नहा लेना चाहिए थे कम से कम देर तो ना होती और फिर वो स्त्री ही तो थी कोई जानवर तो नहीं”, रूपवती हंस रही थी

बटेश्वरी, क्यूँ सुबह सुबह मेरी खिंचाई कर रही है
रूपवती, क्यूँ इसमें खिंचाई जैसा क्या है
बटेश्वरी, क्या तुझे बुरा ना लगता ये जान के कि में परायी स्त्री के साथ नहा के आया
रूपवती, इसमें बुराई की क्या बात है मुझे तो ख़ुशी होती कि मेरा पति खुले विचारों का है
अब रूपवती मठ्ठे के मटके के पास पहुँच जाती है एक लोटा मठ्ठे का भरकर बटेश्वरी के तरफ खिसकाती है बटेश्वरी भी वहीँ चौके के पास बैठ जाता है
एक घूँट मठ्ठा पीकर, “इसमें गुड़ डाली है?”
“हाँ”

“आज इतनी मेहरबान क्यूँ हो वैसे तो नमक या कुछ नहीं डालती थी”
“वो इसलिए कल रात तुम मुझे बहुत मीठे लगे में चाहती हूँ कि तुम और मीठे हो जाओ”, अपनी कोहनी बटेश्वरी के मारती हुयी
“और फिर मैंने क्या तुम्हारे हाँथ पकड़े है जो मन हो वो डाल के पिओ खाओ”
“पर पति को अच्छे से खिलाना तो पत्नी का काम है”
“क्यूँ रात वाला ज्ञान कहाँ गया रात में तो बड़े बोल रहे थे ये सब नियम धर्म स्त्रियों को गुलाम बनाये रखने के लिए बनाये गए”
बटेश्वरी, अरे गलती हो गई ई ससुरा समाज बहुत बुरी चीज है खुद तो बेड़ियों में जकड़ा रहता है अगर कोई अपनी सोच बदले वो भी इसी का हिस्सा होने से इसकी बुराइयों से अछूता नहीं रह पाता है
पता नहीं कब एक आदर्श समाज की कल्पना पूर्ण होंगी, इश्वर ही जाने
बटेश्वरी, अब देख में तुझे बदल कर दिखाऊंगा आज से कोई नियम नही कभी कभी में भी खाना पका दिया करूँगा, कपडे भी धो दिया करूँगा
रूपवती, हंसकर बस करो कहीं कोई सुन ना ले
बटेश्वरी, एक धीमें थप्पड़ से रूपवती के गाल सहलाते हुए, “पगली घर गृहस्थी में दोनों मिलके काम करे तो जिंदगी हंसती हुयी कट जाती और ये बस हँसना खेलना ही है इस धरती पे| धन दौलत रिश्ते नाते सब पड़े रह जायेंगे नंगे आए थे और नंगे ही चले जायेंगे”
रूपवती, एक लम्बी साँस लेकर, “तो फिर मेरे पति परमेश्वर! कब से बदल रहे हो”
बटेश्वरी, “अरे आज और अभी से”
“तो फिर गूंदो आटा सब्जी तो बन चुकी है”
“अरे मुन्ना ने आकर देख लिया तो पूरे गाँव में थू थू हो जाएगी”, बटेश्वरी ने अपनी शंका प्रकट की
दोनों हंसी के फव्वारे छोड़ने लगे, मुन्ना अपने घर में प्रवेश होता है अपने माँ बाप को हँसता हुआ देखकर उसका तो जैसे दिन सुधर जाता है आखिर बच्चे कल्पना भी क्या करते है इन सब खुशियों के अलावा वो तो पुष्प की तरह ख़ुशी के वातावरण में खिल जाते है, दुःख और कलेश में मुरझा जाते पर कितने पति पत्नियों को अपने बच्चों की परवाह है वो तो ग़लतफ़हमी में रहते है उनके लिए तो खिलाना पिलाना कपड़ा लत्ता ही परवरिश के लिए जरुरी है

जमींदार की तो जैसे जिंदगी नरक हो चुकी थी उसके मन से सपने का भय निकल ही नहीं रहा था एक बच्चे की तरह बार बार चौंक जाता इतने भारी संकट के दौरान उसे सिर्फ अपनी पत्नी का सहारा था जो कुछ भी होता है अच्छे के लिए होता है जमींदार ने दो दिन से मदिरा को हाँथ तक ना लगाया था उसके खेतों पे आने वाली मजदूर स्त्रियाँ ज्यादा खुश थी उनके शरीर को नोचने वाला भेड़िया लगभग गायब हो चूका था|
मन्दाकिनी से मार पीट गाली गलौज करने वाला उसका पति एक बच्चे में तब्दील हो गया था वो तो सिर्फ इश्वर का शुक्रियादा कर रही थी कि उसके और उसके पति के बीच में फांसले काम हो चुके थे जमींदार दिन रात अपनी पत्नी से चिपटा रहता
सूर्य सिर पे चढ़ चूका था पर मन्दाकिनी और जमींदार दोनों लैला मजनू से लिपटकर सो रहे थे
मन्दाकिनी की आंख खुलती है “हाय इतनी देर हो गयी”
वो जल्दी से अपने पेटीकोट को ऊपर खींच कर कस लेती है और शौचघर के बाद स्नान घर में प्रवेश करती है|
ब्लाउज और पेटीकोट उतारकर बाल्टी में डाल देती है जैसे ही उसकी नजर योनी पे पड़ती है “हाय ये सफ़ेद द्रव्य इतनी सालों बाद अब तो में बूढी हो चुकी हूँ मेरे स्तन भी लगभग सूख चुके है”
वो नहाकर नंगी ही अपने कमरे में आ जाती है आज उसका सजने धजने का बड़ा मन कर रहा था वो तुरंत एक पीली साड़ी पहन लेती है सिर पे बिंदी, मांग में चटक सिन्दूर, होंठो पे लाल लाली लगा कर अपने पति के पास पहुँचती है
“सिर पे हाँथ फिराकर चलो उठो”
जमींदार के दिमाग में आज थोड़ी ताजगी थी वो उठकर चल देता है
मन्दाकिनी सोचती है “आज नौकर भी नहीं आए.. ओहो शायद वो दरवाजा पीट पीट के लौट गये हों आज वर्षों बाद इतनी गहरी नींद आयी, चलो आज खुद ही नाश्ता बनाती हूँ”
वो तुरंत रसोई में आकर चूल्हा जलाती है, चौकी पे बैठ नाश्ता की तयारी करती है

उधर बटेश्वरी खा पीकर खेतों की तरफ जाने की तयारी में था मुन्ना भी बाहर खेलने के लिए निकल गया ये देखकर वो तुरंत दरवाजा बंद कर अपनी घरवाली के पास पहुँचता है चूल्हे के पास से उठाकर दीवार के सहारे खड़ा करके उसका पल्लू हटा देता है
रूपवती, क्या कर रहे हो? मेरे हाँथ आटे से सने है
बटेश्वरी स्तनों पे हाँथ टिकाकर अपनी जोरू के निचले होंठ अपने मुंह में भर लेता है दोनों चुम्बनों में जुट जाते है
रूपवती अपना बायाँ पैर टेड़ा कर के दीवार पे रख लेती है और अपनी कलाई बटेश्वरी के गले में डालके अब जोश के साथ होंठ और जीभ चूसने लगती है

बटेश्वरी का पूरा मुंह और गला लाली से लाल हो गया था वो ब्लाउज के 2 बटन खोल के उसका स्तन मुंह में भर लेता है
रूपवती के स्तन तन जाते है उसका शरीर अकड़ने लगता है
“दरवाजे पे फट फट की आवाज आयी अरे जीजी!, मुन्ना की अम्मा! में हूँ कौशल्या दरवाजा खोलो”
बटेश्वरी तुरंत अपना गमछा लेके पानी की बाल्टी की तरफ भागता है उसे आँगन में रख मुंह धुलने लगता है
रूपवती अपने ब्लाउज के बटन बंद करके दरवाजा खोलती है अरे सखी तू सुबह सुबह?
कौशल्या, अरे जीजी आटा कम था ऊपर से गीला और हो गया थोडा आटा दे दे
रूपवती “आ मेरे साथ”
अरे जीजी ये क्या पूरे मुंह पे लाली और ये खुला हुआ पल्लू ये क्या कर रही थी
रूपवती, “चुप और अपने पति की तरफ इशारा करती है”
कौशल्या शांत होकर अपना चेहरे पे घूंघट कर लेती है
बटेश्वरी का लिंग जब तक शांत नहीं हो जाता वो मुंह को धुलता रहता है “हाय ये लाली सारा कुतार कर गयी इसे क्या जरुरत थी सुबह सुबह लाली लगाने की”
बटेश्वरी अपने कंधे पे गमछा डालके गेंहूँ कटाने के लिए निकल पड़ता है
“हाय जीजी सुबह सुबह ही जेठ के साथ कबड्डी शुरू कर दी”
रूपवती पल्लू को कमर में घुसेड़ लेती है, “चल शैतान जैसे तू तो कुछ करती ही नहीं है”
“अरे में कैसे जीजी में तो पेट से हूँ”
“हाँ कबड्डी खेली होगी तूने तभी तो पेट से है”
“अच्छा जीजी अब चलती हूँ”

जमींदार नहा कर खटिया पे बैठने को चलता ही है कि मन्दाकिनी आवाज देती है भीतर चले आओ
वो थाली में नाश्ता लगाकर जमींदार को देती है जमींदार, “एक बात बोलूं तुम भी इसी में खा लो” दोनों नाश्ता करने लगते है
जमींदार दो दिन अच्छी तरह सोने से, उसका दिमाग शांत हो चूका था उसकी दिमाग में घूमती हुयी सारी कामुक स्त्री पलायन कर चुकी थी इस समय वो पूरी तरह से वर्तमान में था इसलिए आज पहली बार उसे अपनी स्त्री सुन्दर प्रतीत हुयी वो प्यार से उसके गाल चूमना चाहता था पर उसके अन्दर हिम्मत ना थी जिन गालों पर उसने थप्पड़ बरसाए हों उन्हें अचानक चूमने के लिए कैसे पूछ सकता है अपराध भाव से डूब चूका था मन में “मैंने कितना परेशान किया है अपनी पत्नी को| जिनसे कोई वास्ता नही उनको अपने गोद में लिया रहा जिसके साथ 7 फेरे लिए उसपे हमेशा अत्याचार ही किये और उसका कशूर क्या था सिर्फ इतना कि वो मेरी पत्नी है और पत्नियों की किस्मत में हमेशा दुःख ही आता है सारा प्रेम तो बाहर की स्त्रियों या काल्पनिक स्त्रियों पे लुटाया जाता है”

“काश में ये सब ना किया होता तो कितनी खुश जिंदगी होती मेरा बेटा मेरे साथ रह रहा होता”
जमींदार बीती बातों को सोच सोचकर तेज आवाज में रोने लगता है “मुझे माफ़ कर दे.. माफ़ कर दे.. अब में जीवन भर तुझपे या किसी पे अत्याचार नही करूँगा”
मन्दाकिनी भी जमींदार को अपने गले लगाके रोने लगती है “मैंने गाँव में पता किया है उन्होंने बताया कि पहाड़ के उस तरफ गाँव में काली के मंदिर पास एक स्वामी रहते है वो तुम्हारे सपने का कारण बता सकते है इसलिए आप आज शाम को उनके पास चले जाना”
अब दोनों शांत हो जाते है उनके चेहरे एक दुसरे के सामने थे मन्दाकिनी के आंख से एक मोती उसके गाल पे आ रहा था जमींदार उस आंशु की बूँद को तुरंत चट कर जाता है फिर दोनों के होंठ मिलते देर ना लगी चुम्बन शुरू हो गये पत्नी अपने आप को जवान महसूस करने लगी जमींदार अपनी कपोल कल्पित कल्पना से बाहर आकर महसूस किया कि वो बुढ़ा हो गया है और एक बच्चे का नाना भी|

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