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Choumaso:चौमासो

आभै चमके बिजळी, धण नैना में प्यार |

जळ बरसावे बादळी, हिवड़ो रस री धार ||

चौमासो चोखो घणो, साजन हो जद साथ |

मुधरा मुधरा मुळकता, बिते दिन और रात ||

बीज झबूके बादली, घूँघट गौरी नैन |

मनचीती पूरी करे, सावन सांचों सैण ||

घुट घुट आवे बादली, घुट घुट उमड़े नेह |

भीगे मनभर गोरड़ी, आँगन बरसे मेह ||

नदी नालां जल उफणे, हिवडे प्रीत हिलोर |

धरा, हिये दोन्यू जगह, मधरा नाचे मोर ||

हरियाळो गौरी हियो, हरियल धरती सेज |

सुपणा हरियल नैन में,इंद्र,अनंग रंगरेज़ ||

Bhav-abhivykti

अनुभव

My this poem is simple as compared to the earlier one.it took me 2 hours to finish but for the older one I was awake all night.depends on the frequency at which thoughts and words hit my mind!!i also installed a Hindi editor.here it goes……

पथिक मिले बहुतेरे
किन्तु पथ ही संग संग चल रहा है,
बुझ गए दीपक अनेकों
परन्तु मन निरन्तर जल रहा है!

कंटको सी चुभ रही
मनुस्मृतियां मनपृष्ठ पर,
उनको अश्रुओं में उँगलियों से
खींचना ही खल रहा है!!

संभलकर सजग सी
धीमे पाँव थी मैं रख रही,
फिर भी गिरी सौ बार
प्रतिपल यह जीवन छल रहा है!

जमघट सुबह का कम हुआ
कुछ लोग ही बाकी बचे,
अब हो रही पहचान उनकी
सूर्य ज्यों ज्यों ढल रहा है!

चुप थी अभी तक देख के
यह छल कपट और टालना,
निकलते लेखनी से तीर की
अब मौन मेरा गल रहा है!
हाँ!अब मौन मेरा गल रहा है||

अंकिता सिंह.

मेरा विश्वास

1.
विश्वास अजब है,
आयाम नए गढ़ता रहता है,
मैं गिरती रहती हूँ,
ये बढ़ता बहता है!!

कोई अजर अमर है,
वंशो से आया है,
पहले भीतर दुबका था,
अब मुख् पर छाया है!!

अंकिता सिंह.

शाम अधूरी लगती है

होठों में क्या बात छुपी,
मुस्कान अधूरी लगती है,
आँखों में है नींद छुपी,
तलाश अधूरी लगती है,
धड़कन में ख़ामोशी सी,
ये बाते अधूरी लगती है,
ना दिखे अगर तू महफिल में,
महफ़िल अधूरी लगती है,
जाने क्यों तेरे बिन “भरत”,
ये शाम अधूरी लगती है ।।

Bharat

मुझे इंसान क्यों नही दिखता

बहुत दिनों की यात्रा में एक छोटी सी अपने मनोभावों के विचारो को कुछ पंक्तियों में सजोया है शायद आपके भी दिल की यही आवाज़ हो …….

My - Way

Nain Beimaan:नैन बेईमान

धन,जोबन अरु धाक की, सुलगे अँखियन साध |
यही कारण कम होत हैं , अंधों से अपराध ||

Bhav-abhivykti