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Man-Paankhi : मन-पांखी

मन पांखी परदार है , उड़े पिया की ओर |
मैं बेबस , बेपर सखी , बैठी हूँ इक ठौर ||
मन चंचल परवाज़ भर, पहुँचे पिव के पास |
पंख विहीन नैना सखी, निशिदिन रहे उदास ||
पल पल मिलता मन सखी, उड़ उड़ पिव के देश |
पर नैना दीदार बिन , कल न पड़े लवलेश ||
हाय दई मन पंख क्यूँ , तूँ ने दिए लगाय |
ये उड़ साजन संग जा , रहता मुझे सताय ||
मन सुधि लाता पीव की , आतुर होते नैन |
व्याकुल चित को हे सखी, दरस बिना ना चैन ||

Bhav-abhivykti

Hans Dekhoon Sansaar : हँस देखूँ संसार

जन्मी अजन्मी समस्त, बहनों के उद्गार |

भैया सँग ये भी मिलें, भाई इस त्यौहार ||

बीर बने यदुनाथ जो , जग मेरे इक बार |

कटने ना दे कोख में , हँस देखूँ संसार ||

भाई वो आँखें बने , वहशी जिनमें ज्वार |

निर्भय, निर्मल फिर सदा, हँस देखूँ संसार ||

दिल, दिमाग में जो बसे, तिलक,दहेज़ विचार |

वो भ्राता मेरे बने , हँस देखूँ संसार ||

रहे  ह्रदय के अतल में, छुपे  कुटिल व्यवहार |

बहना मुझको मान ले , हँस देखूँ संसार ||

Bhav-abhivykti

Vigyaan-Sanskriti :विज्ञान-संस्कृति

शशि पद, मंगल यान है, उत्सुक बहुत विज्ञान |

बन हमसाया रह रहा , आज मगर अनजान ||

रहन सलीके उच्च पर , होती नीयत नीच |

दूरी वसुधा जो घटी , बसी मनों के बीच ||

भाव तिरोहित हो रहे, अरु संस्कार विहीन |

सामाजिक सरोकार न, मानव बना मशीन ||

स्नेह संबंधों मध्य न , यंत्रों से अति प्यार |

क्षण प्रतिक्षण बदल रहा, मानव का व्यवहार ||

संस्कारों पर पाँव धर , बढ़ा अगर विज्ञान |

मनुज सभ्यता पतन तय, कोई नहीं निधान ||

Bhav-abhivykti

Jaadugare Nain : जादूगारे नैन

घट अमिय भर वारूणी, दिया हलाहल डाल |

गोरी तेरे नैन में , विधि ने किया कमाल ||

देखे भी ना चैन मिले, बिन देखे ना चैन |

सदा करे बेचैन चित , ये मतवारे नैन  ||

मादक मदिरा वास है , तेरे लोचन लाल |

प्रतिपल पीने दे मुझे, होवे जो कुछ हाल ||

ठग, छलिया अरु चोर हैं , जादूगारे  नैन |

वश करते अरु लूटते , दिन देखे ना रैन ||

डूबे अनगिन लोग हैं , नैना दरिया बीच |

चाहे, अनचाहे भले , बरबस लेते खींच ||

Bhav-abhivykti

Ras-Pran : रस -प्राण

मुख मयंक, लोचन तड़ित, रस को अधर लजात |

मलयज महक , केसर वर्ण , इनको तेरा गात ||

नैन नशीले, सरस लब , आनन मद भरपूर |

 रसिक प्यास बुझती नहीं, अचरज होय जरूर ||

 देखत नैना ना थके, मिटे न मन की प्यास |

 बरबस चित है खींचती , प्रिय तुम्हारी हास ||

 कुंतल काले, गोर मुख , मनो घटा सँग चंद |

 चातक आतुर प्राण को , पल पल दे आनंद ||

 रस गागर, नागर नवल , रसिक, कविजन प्राण |

 अद्भुत, अनुपम एक तुम, विधि कर का निर्माण ||

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Virhaanal : विरहानल

पीर ह्रदय दारुण प्रबल, जग से कही ना जाय |

देह दीमक विरहा लगी , भीतर भीतर खाय ||

मन उमंग, मधुमास रितु, रही चहूँदिस छाय |

बिन साजन मुझको सखी, रंग एक ना भाय ||

सावन बदरी झूम के , बरसी फेर लजाय |

मुझ नैना देखी झड़ी, अब ना बूँद गिराय ||

लोग कहें हैं अनल सब , देती सहज जलाय |

मैं जाने किसकी बनी, ये तन जला न पाय ||

रूचि अनुरूप रची विधि, बिछुड़त बैर निभाय |

विरह अंक किस्मत लिखे, पल पल सो तडपाय ||

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Maanav Man Abhimaan : मानव मन अभिमान

छीजत तन छिन छिन रहे, ग्रहण लगे है ज्ञान |

शील नाश करता सकल, मानव मन अभिमान ||

“मैं”  मर्यादा  मारता, “मैं ” हरता  है  मान |

मूल अमंगल है सकल, मानव मन अभिमान ||

कलह, कलुषता, क्रोध अरु, है कटुता की खान |

सर्व नाश सामान है , मानव मन अभिमान ||

नदिया धार कगार को , करती चुप नुकसान |

पतन करे न पता चले, मानव मन अभिमान ||

बैर, बुराई, ग्रन्थि मन, अपयश अरु अपमान |

इनका भागी कर बना , मानव मन अभिमान ||

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