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मैं और मेरे अपने

मैं कल भी उड़ता था,
मैं आज भी उड़ता हूँ,
पहले दो पैरों की सवारी थी,
अब चार पहियों पे चलता हूँ।

जिंदगी ने रफ़्तार तो पकड़ ली,
जमाने के साथ मैं भी तेज हो लिया,
पर जीने की इस भाग-दौड़ में,
हर ख़ुशी को अनदेखा करता गया,
वही ख़ुशी, जिनसे मेरा संसार चलता था,
जिनसे मेरा घर, घर बनता था।

देर से ही सही पर,
इस बात का एहसास हुआ,
घर से ज्यादा, कैसे और कब?
कुछ और मेरे लिए ख़ास हुआ,
अब सब कुछ संवारना है,
खुद को परिवार पे वारना है।

बीते पलों को वापस ला तो नहीं सकता पर,
आने वाले पल को खुशनुमा बना सकता हूँ,
सबके चेहरे पर हँसी ला सकता हूँ,
सबसे अहम्, मैं घर पर वक़्त दे सकता हूँ,
मैं कैसे भूल गया था की इनकी हँसी,
इनके खिले चेहरे, यही तो मेरी ऊर्जा थी।

अब मैं जीऊंगा भरपूर, अपनों के साथ,
अपनों के लिए अपनों से दूर रहकर देख लिया,
वो जगह बहुत सुना है, बहुत सन्नाटा है,
अपने घर पे तो शोर में भी शान्ति है,
अब खुश हूँ मैं फिर से जमीन पे पैर टिका के,
सुकून से जीऊंगा अब, अपनों को अपने सीने से लगा के।

Poetry

Numaaish

Us dard-e-dil ka
maza hi kya jiski
numaaish aap
puri duniya mein
karte firein.

Kabhi kabhi dard sehna
zaruri hota hai, aye dost.
Insaan zindagi ke… 9 और  शब्द

Poetry

Patthar Dil Insaan

Agar tab hum nadaan na hote.
Agar tab zindagi me aaye
wo toofan na hote.
Agar tab sath wo kuch
galat insaan na hote.
Nazarandaaz na kar paye jise, 146 और  शब्द

Poet

चक्रवात..

चक्रवात

ये जो तेरी यादों का समंदर है
लगे जैसे कोई बवंडर है
मैं ज्यों ही करता इनपे दृष्टिपात
मन में उठता कोई भीषण चक्रवात
मैं बीच बवंडर के आ जाता हूँ
और क्षत विछत हो जाता हूँ
इसमें चक्रवात का क्या जाता है
वह तो तांडव को ही आता है
अपने हिस्से की तबाही मचा कर
वह जाने कहाँ खो जाता है
मैं तिनका-तिनका जुटाता हूँ
और फिर से खड़ा हो जाता हूँ
पर, तेरी यादों की है इतनी आदत
ए चक्रवात ! तुम्हारा फिर से स्वागत

……अभय…..

Hindi Poem

बटन टूट रहा है

वक्त कुछ ऐसे मुझ पे सितम कर रहा है,
की हर शख़्स मुझसे मुख मोड़ रहा है.
क्यों ना हो शहर में चर्चा तेरे हुस्न का?
हर रात जो तेरी चोली का बटन टूट रहा है.

परमीत सिंह धुरंधर

Chidiyon ka ghar- Harivansha ray batchan

चिड़िया, ओ चिड़िया,

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कहाँ है तेरा घर?
उड़-उड़ आती है
जहाँ से फर-फर!

चिड़िया, ओ चिड़िया,
कहाँ है तेरा घर? 25 और  शब्द

Hindi Kavita( Poem)

सूर्य क्षितिज में गया निकल (Published in Rupayan 1.12.17)

पाने को एक बेहतर कल

उद्यम की ली है राह पकड़

 

इन राहों की नींदों को

बोला कुछ विश्राम कर

 

भेदने रात का कम्बल

सूर्य क्षितिज में गया निकल

 

पंछी ने उड़ने से पहले

समेटे अपने सारे पर

 

जड़ की जीवन-इच्छा ने

काट डाले हैं पत्थर

 

तीव्र खोज के बाद कुदरत

दे देती मरूभूमि में जल

Relations