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Jee Len : जी लें

जब साँसे मिली है चंद हमें, फ़िर क्यों ना अपने ढंग जियें |

क्यों घुट के रहें इन बंधन में, क्यों हँसकर गम के घूँट पियें ||

और रहें सब शाद मगर, पर अपना भी तो हक़े – बहाराँ हो |

क्यों चाक करें दिल अपना, क्यों अपने ही हाथों फिर से सियें ||

माना के ना टूटे दिल कोई, पर क्या ये दिल, दिल है ही नहीं |

औरों पे नहीं है ठीक मगर, पर खुद पे सितम क्यूँ जाए कियें ||

ये दुनियाँ है, दुनियाँ वाले, हम कुछ ना करें, हैं फिर भी कहते |

परवाहे ज़माना क्यूँ करना, क्यों ज़ख्मों को दिल पर जाए लियें ||

ये तारे, बहारें, नदियाँ, गुलशन, इन लुत्फे-नजारों को क्यों खोना |

बेशक ना मगर हम कल होंगे, पर आज तो हम जी भर के जियें ||

Bhav-abhivykti

Farebi : फ़रेबी

ज्यादातर तो देखो दुनिया में, चहरे पर चहरे वाले हैं |

होठों पर होता शहद मगर, ये ज़हर दिलों में पाले हैं ||

हँसकर जितना मिलते हैं ये, अन्दर उतना जलते हैं |

बन अपने ये चढ़ते कंधे, पर पीठ में डसने वाले हैं ||

उजली बातें, उजले कपड़े, सब उजले भाव दिखाते हैं |

झाँक जरा दिल देखो इनके, भीतर से दुगने काले हैं ||

शब्दों की पाश बिछाकर के, ये वार प्यार से करते हैं |

भोले भाले जन दुनियाँ के, इनके तो सहज निवाले हैं ||

छल अपनों से करने वाले, ये मीत किसी के क्या होंगे |

धोखे का गर्त खोद कर रखते, पत्ते विश्वास के डाले हैं ||

कुटिल चाल हँसी के पीछे, रखते घात छुपाकर बातों में |

मत फंसना, रहना दूर सम्हलकर ,ये मकड़ी के जाले हैं ||

Bhav-abhivykti

खुद को बदलने की कोशिश में,

जब टूट जाता है बदलने का जज़्बा,

समर्पण कर देती है जब,

विशाल शरीर  के अंदर छुपा बैठा नन्हा सा दिल,

जब रोज़ महसूस होने है,

कलेजे को पत्थर की तरह पीसने पर संवेदनाएं,

और जब हार जाता है हिमालय सा अटल मन,

तब ख्याल आता है,

की कोई अपना होता,

जो मेरे बालों को सहला,

दे देता मुझे अपनी गोद,

और सुन जाता मेरी सारी बेचैनी,

की कोई मुझे लड़ता,

क्यूंकि मैंने उसके साथ बिताये बचपन को,

बस युही भूलना सोचा था,

की कोई मेरे हर गलतियों पर,

मुझे डांटने के बाद भी,

मुझे फिर से खड़े होने की हिम्मत दे जाता,

पर ये वही चीज़ें थी,

जिसे मैंने छोड़ा था,

अपने सपनो की अभिव्यक्ति में,

बाधा समझ कर,

और निस्पन्दित कर डालें थे,

एक-एक कर ,

अब सपनों की ऊंचाइयों को छूने पर,

जब छोड़ दी है मुझे मेरी हालत ने,

अकेलेपन के बाढ़ में,

तब मैं जाना चाहता हूँ लौट कर,

की ठीक कर दू,

कुछ महासागर से गहरे घावों को,

पर क्या बन पायेगा वही विश्वास,

फिर से,

उनके आँखों में,

यही मेरे पैरों को अस्थूल कर देती है.

Hindi Poems

Aalam-e-ishq : आलम-ए-इश्क़

चलते हैं हँसकर ख़ारों पर, इस इश्क का यारो क्या कहना |

रख देते हैं दिल अंगारों पर, इस इश्क का यारो क्या कहना ||

जीत की चाह लिए जग में, अब तक तो अनेकों हैं जंगें हुई |

ये हँसते हैं अपनी हारों पर, इस इश्क का यारो क्या कहना ||

ना दौलत, तख्तो-ताज़, खजाना, इस जान से बढ़कर ना कोई |

ये मर जाते महज़ इशारों पर, इस इश्क का यारो क्या कहना ||

ना रब, ना जात, ना दीन औ”धर्म, यार खुदा, बस प्यार खुदा |

सजदा तो कदम-ए-यारों पर, इस इश्क का यारो क्या कहना ||

बस दीदार की हसरत रखते हैं, होती ना ख्वाहिश और कोई |

नज़रें हैं ना और नज़ारों पर, इस इश्क का यारो क्या कहना ||

ये दिल की लगी है जिसको लगी, समझेंगे वही ना और कोई |

हैं चलते तलवार की धारों पर, इस इश्क का यारो क्या कहना ||

Bhav-abhivykti

Preet Praveen : प्रीत प्रवीण

पल ना टरे पलकें राधे, बस मुख मनमोहन जाए निहारत हैं |

मनभावन आनन उर माहिं बसा, ना नटवर पलक उघारत हैं ||

उमगत नेह अति उर दोनों ही, अरु ये प्राण परस्पर वारत हैं |

प्रीत प्रवीण छवि युगल मनोहर, जीते ना कोऊ, दोऊ हारत हैं ||

Bhav-abhivykti

Yaad Teri : याद तेरी

चाहता हूँ भुला दूँ याद सभी, पर तस्वीर तेरी दिल में उतरी |

फिर याद तेरी घिर आई है, फिर से ये आँखें सावन बदरी ||

ज़न्नत औ’ बहारां और नहीं, हैं रस से भरे ये नयन तेरे ,

कितनी खता हम कर बैठे बड़ी, थे ये तो लुटेरे दिल नगरी |

फिर याद तेरी घिर आई है, फिर से ये आँखें सावन बदरी ||

कैसी थी घडी जब आँख लड़ी, इस दिल पे खुमारी छाई थी ,

हमें नाज़ नसीबा अपने लगा, पर हाथ लगी गम की गठरी |

फिर याद तेरी घिर आई है, फिर से ये आँखें सावन बदरी ||

वो तेरी हँसी दिल मेरे बसी, जैसे प्यार का सागर पाया हो,

धोखा मिला कुछ और नहीं, मुझको मिली अँसुवन गगरी |

फिर याद तेरी घिर आई है, फिर से ये आँखें सावन बदरी ||

वहाँ आज वीराना पसरा है, ये दिल जो कभी गुलज़ार रहा ,

अब मैं हूँ, मेरी तन्हाई है, किससे कहें जो इस पर गुजरी |

फिर याद तेरी घिर आई है, फिर से ये आँखें सावन बदरी ||

Bhav-abhivykti

Peer Paraai : पीर पराई

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मतवाला हूँ, पी हाला नहीं, मैं पीर पराई पीता हूँ |

साँसों का क़र्ज़ चुकाने को, हित समग्र के जीता हूँ ||

रखते ना सुमन हैं जगवाले, कर कंटक हैं लाख भरे,

क्षत तन, मन होता है, ये जहाँ कहीं भी हाथ धरे |

जगाचरण से विदीर्ण ह्रदय को, क्षण प्रति ही सींता हूँ |

———————————- मैं पीर पराई पीता हूँ ||

वो गरल नहीं है पास अहि, जो ये जिह्वा अपनी धरे |

उससे तो मरे इक बार मनुज, इससे सौ सौ बार मरे ||

मैं दग्ध मरू इस भूमि में, बहती लघु प्रेम सरिता हूँ |

———————————- मैं पीर पराई पीता हूँ ||

उपकार नहीं, कर्तव्य मगर है, मनुज कलेवर पाया है |

नर ना, नराधम है वो, दिल जिसने कोई दुखाया है ||

छंद ना लय हो कोई मगर, मैं मानवता की कविता हूँ |

———————————- मैं पीर पराई पीता हूँ ||

कोई कहे कुछ मुझको मगर, परवाह नहीं मैं करता हूँ ,

जितना भी होता है मुझसे, मैं ज़ख्म दिलों के भरता हूँ |

मैं मर्यादा गायक रामायण का, और उपदेशक गीता हूँ |

———————————- मैं पीर पराई पीता हूँ ||

Bhav-abhivykti