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उबलता आसमां

यह धुंधलाया हुआ आसमां ,
उबलता सा महसूस होता है !
जैसे कोई चूल्हे पे धर कर ,
भूल गया है इसको !
अगर किसी ने नहीं उतार तो ,
पीला पड़ जायेगा कुछ देर में !
झाग तो देखो कैसे ,
उफन-उफन कर आते हैं !
पतीले से छलक न जाए कहीं,
छलक गया तो बेजा,
बर्बाद हो जायेगा इतना आसमां !
चूल्हे पे गिरेगा, ज़मीं पे बहेगा ,
बेजा गन्दा कर जायेगा ये आसमां !
अब तो गंध भी उठने लगी है इससे जलने की ,
पतीले में लग गया है शायद !
काश !
कोई एक बार चम्मच ही हिला देता ,
नहीं तो जला अपने हाथ पतीला ही उठा देता !
पर अब तो ये गाढ़ा हो चुका है ,
जल-जल कर कम भी रह गया है !
उबल तो रहा है पर ,
अब उफन नहीं रहा !
देखा जब पतीले में तो पाया,
फ़क़त है कालिख अब उसमें आसमां ही न रहा !

(आग़ाज़)

Poem

यादें

हर एक पल तेरी यादों में खोया रहता हूँ

तेरी यादों को सिरहाने रखकर सोया करता हूँ 

हर पल मेरी नज़रे तरसती है.. ढूंढती है तुम्हे 

आँखे नम हो जाती है  …तुझे देखने 

पर कम्बख़्त अपनी मुलाकात ही  न हो पाती। ..

इसीलिए खामोश रहकर आँखों में आये आंसू आँखों से ही पी लिया करता हूँ…

तुम

तुम

उलझती जुल्फें

सरकती पलकें

चमकती आँखे

दमकता चेहरा

उस पर पहरा!

खनकती चूड़ी

सरकता आँचल

लटकती बाली

खनकता पायल

कितने घायल!

चहकती बोली

मचलती चाल

माधुरी मुस्कान

महकता तन

कितनो का बहकता मन !

गरजते बादल

बरसते पानी

कुहू की शोर

नाचते मोर

ज्यों देखे तेरी ओर !

विचलित मन

मौन हरदम

दिल में बर्फ जमी

आँखों में “नमी”

तेरी कमी

……..अभय……

Hindi Poem

यह दरीचा

यह अधखुला सा दरीचा,
बड़ा ही अजीब लगता है !
हर बार रोक लेता है,
खींच लेता है अपनी ज़ानिब !
जब-जब भी देखता हूँ इसे,
इसकी खिड़कियों के कांच,
गंदले, धुंधलाए हुए !
साफ़-साफ़ कुछ देखने नहीं देते !
जब कभी भी खोलता हूँ इन खिड़कियों को,
दूर तक दिखता है सब कुछ साफ़-साफ़ !
धुप में चमकते मकान,
सूखती सतरंगी साड़ियां,
बच्चों का खेल !
हवा के झोंके आते हैं अंदर,
कुरेद जाते हैं मन को !
पैदा करते हैं अकुलाहट मन में !
फिर जब शाम आती है,
उतर जाते हैं सूखते कपडे,
घरों को लौट जाते हैं बच्चे !
धुंधलाए कांच से और भी धुंधला जाती है नज़र,
कुछ नहीं दिखता, कुछ नहीं सूझता !
चाहता हूँ सहेज लेना मैं यह धुप,
बढ़ाता हूँ हाथ पर कुछ छू पाता नहीं,
इस दरीचे की सलाखों के पार,
मैं कभी भी पहुँच पाता नहीं !

(आग़ाज़)

Abstract Poem

Basant:बसंत

शोभित है रंग पीत धरा,अरु घूमत है खुशियाँ हर द्वारे |

कोकिल की हद कूक सुहावन,मोर मनोहर नाम पुकारे ||

गूंजत है अलि तान दसों दिस, फूलन को मुख चूमत सारे |

नीरस तो रह तो जग जीवन, या सच एक बसंत बिना रे ||

Bhav-abhivykti

जुगनू

जुगनू

आजकल रात जुगनू मेरे छत पे
झुण्ड में मंडरा रही है
अनजाने में ही सही लेकिन मुझे
तेरी याद दिला रही है

इक पल जलती , फिर बुझ जाती
जैसे सुख दुःख का एहसास कराती
कम ही सही,
पर प्रकाश तो फैला रही है

एक जुगनू बैठ हाथ पे
शायद कुछ गा रही है
अफ़सोस! उसकी एक बात भी
मेरे समझ नहीं आ रही है

स्तब्ध हूँ मैं बैठा
देख उसकी कोमलता
है छोटी सी, पर पल भर को ही सही
अंधकार को हरा रही है

उड़ चली हाथों से
झुण्ड में वो समा गयी
मानो स्पर्श से मेरे
हो वो शर्मा गयी है
तेरी याद दिला गयी है …

………..अभय………..

Hindi Poem