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अग्निपथ 

​वृक्ष हों भले खड़े,

हों घने हों बड़े,

एक पत्र छाँह भी,

माँग मत, माँग मत, माँग मत,

अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।
तू न थकेगा कभी,

Poetry

दशरथ मांझी और दाना मांझी (कविता)

Dashrath Manjhi -Mountain Man  single-handedly carved a path through a mountain in 22 years using only a hammer and chisel  to make a short cut rout to near by town. 50 और  शब्द

kanha : ek manuhaar

Bansi sunne doudi main aayi
Madhur madhur murli sunao
Kar do chitt pawan  mera
Mujhko mujhse churao kanha
Tum lout ke fir aao kanha

Kayi saheliyaan dhundhti fir rahe… 90 और  शब्द

Hindi Poem

अभिमन्यु की तरह (कविता) poem of an unborn baby

चक्रव्यु तोङने वाले ,

अभिमन्यु की तरह सुनती वहाँ,

बाहर की बातें  –

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ,

मुझे नहीं पता, मैं कौन हूं?  बेटा या बेटी ?

पिघले नीलम सा बहता हुआ यह समां : जिंदगी ना मिलेगी दोबारा

पिघले नीलम सा बहता हुआ यह समां
नीली नीली सी खामोशियाँ
न कहीं है ज़मीन
न कहीं आसमां
सरसराती हुयी टहनियां , पत्तियां
कह रही हैं की बस एक तुम हो यहाँ

Poetry

Bichhudan: बिछुड़न

निःशब्द जुबां है, आँखें नम

रोता है दिल, मुस्काते हम ||

है कौनसा दिन, जिसकी रात नहीं,

जायेंगे विछुड़ कब ज्ञात नहीं |

साँसें तो सलामत है लेकिन,

निः शेष हुआ, लगता है दम |

निःशब्द जुबां है, आँखें नम ||

चहरे हैं खिले, मुरझाये मन,

सावन के संग ये कैसी अगन |

खुशियों की घटा, गम की बूँदें,

ना समझ पड़े कैसा मौसम |

निःशब्द जुबां है, आँखें नम ||

करते हैं बातें हँस-हँस के,

गम पीते जुदाई छुप-छुप के |

खुशियों में पसरी ख़ामोशी,

                                    उलझन से भरा है ये आलम |

                                  निःशब्द जुबां है,आँखें नम ||

Bhav-abhivykti

​ये कैसा इश्क है उर्दू जबां का -गुलज़ार

ये कैसा इश्क है उर्दू जबां का

मज़ा घुलता है लफ्जों का ज़बां पर

कि जैसे पान में महंगा क़माम घुलता है

नशा आता है उर्दू बोलने में

गिलोरी की तरह हैं मुंह लगी सब इस्तिलाहें

लुत्फ़ देती हैं
हलक़ छूती है उर्दू तो

हलक़ से जैसे मय का घूँट उतरता है !

बड़ी एरिस्टोक्रेसी है ज़बां में

फ़कीरी में नवाबी का मज़ा देती है उर्दू
अगरचे मानी कम होते हैं और

अल्फाज़ की इफरात होती है

मगर फिर भी

बलंद आवाज़ पढ़िये तो

बहुत ही मोतबर लगती हैं बातें

कहीं कुछ दूर से कानों में पड़ती है अगर उर्दू

तो लगता है

कि दिन जाड़ों के हैं, खिड़की खुली है

धूप अन्दर आ रही है
अजब है ये ज़बां उर्दू

कभी यूँ ही सफ़र करते

अगर कोई मुसाफिर शेर पढ़ दे मीर-ओ-ग़ालिब का

वो चाहे अजनबी हो

यही लगता है वो मेरे वतन का है

बड़े शाइस्ता लहजे में किसी से उर्दू सुनकर

क्या नहीं लगता –

कि इक तहज़ीब की आवाज़ है उर्दू !

-गुलज़ार

गुलज़ार

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