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पर्यावरण

पर्यावरण देता हमे वायु, भोजन और मिटाता हमारी प्यास।

इसे बचाने के लिए हम कुछ भी करेंगे चाहे करने हो कितने भी प्रयास।।

प्रकृति है पिता, प्रकृति है माता और प्रकृति ही है अन्न दाता।

फिर क्यों है हमने इसको अपने ही हाथो से काटा।।

ऋषियों ने भी पर्यावरण को सर्वोत्तम स्थान दिया।

इसको जीवित रखने के लिए हर ऋषी ने विष पान किया।।

पर्यावरण ने हम पर किए कई ऐहसान अब वह ऐहसान चुक्ता करने की बारी है।

पर्यावरण को बचालो, यह फर्ज़ हमारा और ज़िंदगी हमारी है।।

विकास के नाम पर हमने पर्यावरण को बरबाद किया। पर्यावरण की इस बरबादी मे हमने सिद्ध अपना स्वार्थ किया।।

विकास करो, मना नही किया लेकिन करो हद में।

विकास के नाम पर पर्यावरण की बरबादी करो यह नहीं लिखा किसी मज़हब में।।

अगर अपना जीवन चाहते हो मिलकर बचालो पर्यावरण।

इसे चाहे मेरा सुझाव मानो, चाहे समझो मेरा वंदन।।

उत्कर्ष भारद्वाज द्वारा।।

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अज्ञेय । Agyeya

साँप!
तुम सभ्य तो हुए नहीं
नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया।

एक बात पूछूँ–(उत्तर दोगे?)
तब कैसे सीखा डँसना–
विष कहाँ पाया?

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अजित कुमार । Ajit Kumar

मेरे साथ जुड़ी हैं
कुछ मेरी ज़रूरतें उनमें एक तुम हो।

चाहूँ या न चाहूँ:
जब ज़रूरत हो तुम,
तो तुम हो मुझ में और पूरे अन्त तक रहोगी।

इससे यह सिद्ध कहाँ होता
कि मैं भी तुम्हारे लिए उसी तरह ज़रूरी।

देखो न!
आदमी को हवा चाहिए ज़िन्दा रहने को
पर हवा तो आदमी की अपेक्षा नहीं करती,
वह अपने आप जीवित है।

डाली पर खिला था एक फूल,
छुआ तितली ने, रस लेकर उड़ गई।
पर फूल वह तितली मय हो चुका था।

झरी पँखुरी एक: तितली।
फिर दूसरी भी: तितली।
फिर सबकी सब: तितली।
छूँछें वृन्त पर बाक़ी बची ख़ुश्की जो: तितली।

कोमलता अंतिम क्षण तक यह बताकर ही गई:
‘मैं वहाँ भी हूँ, जहाँ मेरी कोई ज़रूरत नहीं।’

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सर्वेश्वर दयाल सक्सेना । Sarveshvar Dayal Saxena

जब सब बोलते थे
वह चुप रहता था
जब सब चलते थे
वह पीछे हो जाता था
जब सब खाने पर टूटते थे
वह अलग बैठा टूँगता रहता था
जब सब निढाल हो सो जाते थे
वह शून्य में टकटकी लगाए रहता था

लेकिन जब गोली चली तब
सबसे पहले वही मारा गया

इब्नबतूता पहन के जूता
निकल पड़े तूफान में
थोड़ी हवा नाक में घुस गई
घुस गई थोड़ी कान में

कभी नाक को, कभी कान को
मलते इब्नबतूता
इसी बीच में निकल पड़ा
उनके पैरों का जूता
उड़ते उड़ते जूता उनका
जा पहुँचा जापान में
इब्नबतूता खड़े रह गये
मोची की दुकान में

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सुभद्राकुमारी चौहान । Subhadrakumari Chauhan

यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे।।

ले देतीं यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली।
किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली।।

तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता।
उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता।।

वहीं बैठ फिर बड़े मजे से मैं बांसुरी बजाता।
अम्मा-अम्मा कह वंशी के स्वर में तुम्हे बुलाता।।

बहुत बुलाने पर भी माँ जब नहीं उतर कर आता।
माँ, तब माँ का हृदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता।।

तुम आँचल फैला कर अम्मां वहीं पेड़ के नीचे।
ईश्वर से कुछ विनती करतीं बैठी आँखें मीचे।।

तुम्हें ध्यान में लगी देख मैं धीरे-धीरे आता।
और तुम्हारे फैले आँचल के नीचे छिप जाता।।

तुम घबरा कर आँख खोलतीं, पर माँ खुश हो जाती।
जब अपने मुन्ना राजा को गोदी में ही पातीं।।

इसी तरह कुछ खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे।
यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।।

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My Mother

I am going to tell you who is the mother,
she is the one who protect her child from others.

She moves her child towards the bright side, 60 और  शब्द

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स्वतंत्रता दिवस

आज स्वतंत्रता दिवस हम सब मिलकर मनाएंगे।

और अपने वीर शहीदों की गाथाएं गाएंगे।।
याद करेंगे हम आज उन शहीदों को।
किसान के बच्चे और उन फकीरों को।।
जिन्होंने वतन के खातिर अपना घर छोड़ दिया।
घर छोड़ते ही उन्होंने ‘स्वराज’ से नाता जोड़ लिया।।
जब सबके अंदर स्वराज का खून दौड़ रहा था।
तब बटुकेश्वर अंग्रेजी संसद में बम फोड़ रहा था।।
इक्कीस वर्ष की दीर्घ प्रतीक्षा के बाद।
मिला मौका उठाने का उसे अपनी आवाज़।।
उधम सिंह ने कैस्टन हौल में जर्नल डायर को मार दिया।
मारने के बाद उसने गर्व से अपनी मूंछों को ताव दिया।।
याद करो भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की कूर्बानी।
जो हंसते-हंसते चढ गए फांसी जिनकी अभी आयी भी नहीं थी जवानी।।
स्वतंत्रता हमें पहले ही मिल जाती, अगर पैदा हुआ न होता गांधी।
हमारे हाथों में स्वतंत्रता थी जब चली थी प्रथम स्वतंत्रता की आंधी।।
कुर्बानी उन वीर शहीदों की अब व्यर्थ नहीं जाएगी।
जब भारत माता निज गौरव को उत्कर्ष पर पाएंगी।।

रचिता: उत्कर्ष भारद्वाज

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