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Fir Kyon : फ़िर क्यों ?

अपनों के चुभे गर काँटा कोई, तो दिल की धड़कन बढ़ जाती |

क्या होती पीर नहीं औरों को, यह बात समझ ना क्यूँ आती ||

नर तन पाकर नर्तन कितने, हैं मनुज धरा पर करते रहते |

निज हित सधे भले कुछ हो जाए, पर धन, हक हरते रहते ||

जब कोई सम्पदा संग ना जानी, तृष्णा फ़िर क्यूँ बढती जाती |

क्या होती पीर नहीं औरों को, यह बात समझ ना क्यूँ आती ||

देकर ईश ने कर और मेधा, जीवों में श्रेष्ठ बनाया मानव को |

और कर्म भेद के सार सकल से, परिचित करवाया मानव को ||

फ़िर कर्म विमुख क्यूँ पथ चल मानव, जाते हैं बनते अपघाती |

क्या होती पीर नहीं औरों को, यह बात समझ ना क्यूँ आती ||

नर से सहज पशु है बनना, लेकिन, कहाँ सहज है नर बनना |

असि धार पर पदत्रान विहीन हों, वैसा है सत पथ पर चलना ||

माना अनीति मग चाल सरलतम, पर कितने उर यह तड़पाती |

क्या होती पीर नहीं औरों को, यह बात समझ ना क्यूँ आती ||

मर्यादा, धैर्य, विवेक सखा हैं, और उपकार अमोलक थाती हैं |

देह है दीपक और कर्म स्नेहन, प्रज्ञा आभा तो साँसे बाती हैं ||

सब जान बने  हैं अनजान मनुज, अक्ल घास क्यूँ चरने जाती |

क्या होती पीर नहीं औरों को, यह बात समझ ना क्यूँ आती ||

Bhav-abhivykti

मेरी दुनिया के पूर्वज

ओ मेरी दुनिया के पूर्वजों

क्यों तुमने सिखाया था हमें

गुस्से को थूकना

तुम्हारी इसी गलती ने

नपुंसक कर दी है सारी आबादी

आज भी हम

अपने पर हुए अत्याचारों को

नियति के हाथों सौंप

थूक देते हैं खुद पर,खुद के गुस्से पर

जिसे निकलना चाहिए था बाहर

अब तुम्हारी यह देन

कुछ इस तरह हावी है सबपर

की उनकी चीखें

बस उनकी दर्द की अनुभूति है

न की क्रांति का संदेश

तुम्हारी यह पुरुस्कार

जो मानवता के लिए अमूल्य था

अब उसे तोड़-मरोड़ कर

एक ऐसी व्यवस्था बना दी गयी है

जिसमे हर एक जीवन बस इंधन है.

ओ मेरे पूज्य पूर्वज

तुम्हारे सीख,जो अब मेरे संस्कार है,

तुम्हारे ज्ञान,जो अब मेरी सीख है,

तुम्हारे पथ,जिसने मुझे इंसान बनाये रखा,

अतुलनीय है,

पर आज तुम्हे और तुम्हारे इस सीख को

चुनौती प्रदान करता हूँ

अब मेरे शरीर के हर एक जख्म का

हिसाब देना होगा उन्हें

अब हमारे हाल को नियति दोषी नहीं होगा

अब गुस्से को थूका नहीं

बल्कि नपुंसकता की धुंध से

निकालकर आवाज़ दी जाएगी

अब हमारी चीखें दर्द की संवेदना नहीं

सिंह की दहाड़ होगी

जो हिरन को नहीं,पिंजरे वालों को थर्रा देगा।

तब तुम मत पूछना हमें

की झुठला दी मैंने तुम्हारे कुछ उसूल

क्यूंकि तुममे से ही कुछ एक ने

सुखदेव,भगत सिंह,राजगुरु बनकर

मुझे लड़ना भी सिखाया था.

Hindi Poems

मेरा एक घर

मेरा एक घर था,
पुराना सा,जर्जर,
शायद मेरे पूर्वजों का सँवारा हुआ,
लगे थे उसमे कई टेक बांस के,
घुन से लपे थपे,खोखले,
बस वही एक घर था मेरा,
इसीलिए उसके टूट जाने का भय,
व्यथित करता था मुझे,
हर सुबह,हर दिन,हर रात,हर स्वप्न।

फिर एक तूफ़ान आई,
सारा जग शांत था घुप्प सा एकदम,
पर हिल रहा था मेरा घर,
आक्रामक हवा के बहुतेरे झोंको से,
उसके टेक,इतनी शक्ति सहने में असमर्थ,
ढहने लगे एक-एक कर,
पहले टेक,
फिर उसके असंख्य छेदों से घुन,
फिर उन्हें सराने वाले कीड़े,
फिर पूरा घर,
ढह गया एकदम से।

उस समय मुझे रोना चाहिए था,
या फिर कहना चाहिए था बुरा-भला
उन कीड़ों को,जिसने खोखले कर दिए थे टेक,
या फिर कोसना चाहिए था
उस भगवान को,जो हवा का दूकान संभालता है,
या फिर गिरगिराना चाहिए था खुद पे,
पर ऐसा कुछ भी न हुआ,
क्योंकि मैंने अपने जीवन का अधिकांश पल,
इसी भय में गुजारा था,
की कहीं टूट न जाये घर,
कही हो न जाऊ मैं बे-घर,
घर होने पे भी मैंने
घर में होने का सुख नही पाया था।

पर आज एक अलग सी संतुष्टि थी दिल में,
क्योंकि न घर था न घर टूटने का भय,
जिसने न जाने कैसे
नया घर बनाने की हिम्मत जगा दी थी मुझमे।

Hindi Poems

Sitam : सितम

अरमानों का धागा टूट गया, चाहत के मोती बिखर गए |

हर और अँधेरा आता नज़र, हम तो चलकर जिधर गए ||

———————————- चाहत के मोती बिखर गए

ज़न्नत तो नहीं मांगी हमने, था माँगा केवल साथ तेरा |

फ़िर रब की हुई क्यूँ रुसवाई, हम रहे यहाँ वो उधर गए ||

———————————- चाहत के मोती बिखर गए

सबसे तो सुनी थी बात यही, कि प्यार ख़ुदा को प्यारा है |

हमने इबादत की दिल से, फ़िर क्यूँ जग वाले बिफ़र गए ||

———————————- चाहत के मोती बिखर गए

अब यादों के सहारे जीना है, ज़ख्मों को उमर भर सीना है |

नहीं फूल रहे इन राहों में,  अब काँटों के पौधे पसर गए ||

———————————- चाहत के मोती बिखर गए

सपनों के महल सब चूर हुए, हसरत की बगिया उजड़ गई |

अब तो ना साहिल कश्ती को, मझधार में लेकर भंवर गए ||

———————————- चाहत के मोती बिखर गए

Bhav-abhivykti

Neh Natnagar : नेह नटनागर

सब लाज़ दिई बिसराय मति, जब संग ब्रजराज लड़ी अंखियाँ |

हांसत पुर जन लोग सबै, अरु छेड़त अति रस ले ले सखियाँ ||

नैन लगे निस-दिन मग मोहन, बिनु दरस बने पावस नदियाँ |

चाह यही अब आठ्हूँ याम ही, करती रहूँ संग गिरधर बतियाँ ||

Bhav-abhivykti

Hal Kahhan : हल कहाँ ?

जितना सुलझाता हूँ इसको, यह तो और उलझती जाती है |

लाख सम्हालूँ, जतन करूँ, पर हर साँस फिसलती जाती है ||

क्यूँ और कहाँ से आया हूँ, आकर क्या पाया मैंने, क्या खोया,

फ़िर जाना है किस और यहाँ से, यह सोच अक्ल चकराती है |

लाख सम्हालूँ, जतन करूँ, पर हर साँस फिसलती जाती है ||

इस छोटी सी वय में हमने, कितने ज्यादा बंधन, भेद बनाए,

तोडूंगी इक झटके से मैं सब, यह कह मौत खडी मुस्काती है |

लाख सम्हालूँ, जतन करूँ, पर हर साँस फिसलती जाती है ||

ना साथ जन्म का कोई साथी, ना कोई संगी अंतिम पल का,

नहीं जड़ें जीवन की गहरी, फ़िर क्यों तृष्णा बढती जाती है |

लाख सम्हालूँ, जतन करूँ, पर हर साँस फिसलती जाती है ||

न तन पर वश, न मन काबू में, ना साँसों पर ही हक कोई,

क्यों औरों पर मूर्ख मति, अपना अधिकार जताती जाती है |

लाख सम्हालूँ, जतन करूँ, पर हर साँस फिसलती जाती है ||

ना अपना चिंतन, पाकर नर तन, खोते अमोलक थाती को,

हम कहते हैं हो रहा बड़ा, पर सच में आयु घटती जाती है |

लाख सम्हालूँ, जतन करूँ, पर हर साँस फिसलती जाती है ||

Bhav-abhivykti

Tum Keval Tum : तुम केवल तुम

कोई उपमा देकर तुमको, उस जैसा कैसे बतलाऊं ?

अनुपम हो प्रियवर मेरे, तुम तो केवल हो तुम ही ||

घटा ज़ुल्फ़, वेणी नागिन, शशि आनन सुनता आया,

मिटती, डसती, हर रोज बदलती, कैसे मैं ये कह जाऊं ?

अनुपम हो प्रियवर मेरे, तुम तो केवल हो तुम ही ||

कोकिल बयनी, मृग नयनी, कवि जन कहते आए हैं,

अवसरवादी और चंचला, मैं तुमको तो कहते शरमाऊँ |

अनुपम हो प्रियवर मेरे, तुम तो केवल हो तुम ही ||

कुछ भी कहे परवाह नहीं जग, देखो मेरे नयनों में,

तुम हो समाई, और छवि, कहो कहाँ मैं बिठलाऊँ |

अनुपम हो प्रियवर मेरे, तुम तो केवल हो तुम ही ||

उर, जिह्वा, साँसों को लेकर, हर रोम बसेरा तेरा है,

मैं तेरा कवि, अब तूँ ही बता, और गीत मैं कैसे गाऊँ |

अनुपम हो प्रियवर मेरे, तुम तो केवल हो तुम ही ||

Bhav-abhivykti