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Nischhal Neh: निश्छल नेह

लजियात रही वृषभानु लली ,
अरु मुस्कावत मोहन हैं मधुरे |
हुलसी विकसी उर की कलियाँ,
इक ध्यान न दूसरा चित्त धरे ||
अवलोकत आनन प्रीत पगे ,
सब लोकन की सुधियाँ बिसरे|
छलके रस गागर राधिका लोचन,
नटनागर नैनन नेह झरे ||

Bhav-abhivykti

ज़िन्दगी क्या करती है

ये दुनिया मेरे साथ मजाक करती है,
बात सपने सच ने होने की अखरती है।

कल जिंदगी बेफिक्र हो यूँ करके रुपयो को ठुकराया था,
आज उसी को पाने के लिए जिंदगी दर-दर भटकती है।

उम्र बढ़ने पर भी माँ-पियौ मेरा सहारा है,
इनका सहारा न बनने की बात रुआंसा करती है।

बचपन में भगवान् के हरेक इंसान में बसने की बात सुनी थी,
आज इनके मुँह में राम तो बगल में छुरी झलकती है।

उनका प्यार ना मिला तो जिंदगी को माशूक़ बनाया था,
इसकी बेवफाई मालूम हुई तो अब रूह तड़पती है।

Poems And Things Alike

इन दिनों

व्यर्थ बढ़ गई है कांव कांव

कौए मगर दिखते नहीं

दोस्त बेहिसाब बनते हैं

दिल में मगर बसते नहीं

 

आंखों को सुंदर लगते

मन को भी भाते हैं

खुशबू की खातिर

लोग इत्र लगाते हैं

पेड़ पौधे फ्रेमों में रखते

पत्ते जहाँ गिरते नहीं

 

नन्ही सी गोरैया प्यारी

प्लास्टिक की बनाते हैं

कृत्रिम घोंसले में रख

घर को सजाते हैं

चूँ चूँ चिड़िया की मीठी

घंटी भी वही लगाते हैं

चुग कर गा पाए चिड़िया

दाना वो रखते नहीं

 

बातें बहुत सुंदर सुंदर

सुनने को मिलती हैं रोज

तन सुंदर, घर सुंदर

जहां पड़े परछाई अपनी

सारा वातावरण सुंदर

कितनी तहें खोजूँ पर

मन अपने सजते नहीं

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तुम्हारा जिक्र जरुरी है..

जिन्दगी के किताब में,
तुम्हारा जिक्र जरुरी है,
प्यार से महके मेरा जीवन,
सो तुम्हारे यादों का इत्र जरुरी है..
जिन्दगी के किताब में,
तुम्हारा जिक्र जरुरी है..

बेहतर है आज मेरा कल की रूसवाइयों से,
पर इस वर्तमान के मोल की खातिर,
तुम्हारा इतिहास जरुरी है..
जिन्दगी के किताब में,
तुम्हारा जिक्र जरुरी है..
-सन्नी कुमार

मेरी कविता

"अतिक्रमण"

और देखते-देखते वहां मंदिर बन गया,
वो कोना, जहाँ सड़क मुड़ती है।
वो कोना, दिखता है मेरे घर के छज्जे से।
पहले खाली था, लोग मुड़ जाते थे आसानी से।
फिर एक रात को देखा,
एक शख्श वहां एक मूर्ति रख गया।
आते-जाते कुछ औरतों ने,
हाथ जोड़ चढ़ा दिए सिक्के।
अगले दिन वहां एक दीपक भी जल रहा था।
सुलग रहीं थीं चार अगरबत्तियां,
कुछ बताशों के साथ।
पर, सिक्के आज पहले से ज़्यादा चढ़े।
और फिर यह सिलसिला रोज़ का हो गया।
लोगों की जगह भीड़ ने ले ली,
और सिक्को की नोट ने।
और खड़ा हो गया वहां,
एक 6’*6′ का मंदिर।
लोग आने लगे चढाने लगे पैसे,
ख़रबूज़े को देख ख़रबूज़ा रंग बदले जैसे।
वक़्त के साथ भीड़ बढ़ी,
और सड़क छोटी हो गयी।
फिर जब सड़क ने अपना हाथ फैलाया,
लील लिया दोनों तरफ बसे घरों को।
सिवाए उस कोने के जहाँ मंदिर बसा था।
कहते हैं वहां आस्था बसती है,
घर से बेघर कर दिया,
प्यार को,व्इच्छाओं को, उम्मीदों को।
काश! उन घरों में भी,
आस्था रहती होती।
सुबह-सुबह जब यूँ ही,
झांकता हूँ छज्जे से मंदिर की तरफ।
औरतें घुसती हैं मंदिर में,
साडी के रंग पे डिस्कशन करते हुए,
और बाहर निकलतीं हैं,
पड़ोसन को गाली देते हुए।
और साहिबान तो दफ्तर की दौड़ा-दौड़ी में,
ध्यान ही नहीं देते।
जैसे वहां कोई रहता ही न हो।
हाँ! छोटे स्कूली बच्चों का हुजूम रहता है,
मंदिर में नहीं साथ लगे जामुन के पेड़ पे।
लौंडे खड़े हो छेड़ते हैं लड़कियां,
तो लड़कियां भी जान कर गिरा संभालतीं हैं दुपट्टे।
इम्तिहानों में ज़रूर बजती हैं घंटियां,
इच्छा से नहीं बल्कि डर से।
तीखे मोड़ पर भीड़ कटती रहती है वाहनों से,
और अंदर लोग दुआएँ मांगते हैं,
बच्चों के पैदा होने की।
लोगों की शक्ल याद नहीं भगवन की,
पर कंगनों का डिजाईन याद है औरतों को।
आदमियों को पता है,
अब उन्हें फलां के जैसा iphone लेना है।
बच्चों को जामुन पकने का मौसम याद हो चला है।
लड़के जानते हैं,
जीन्स वाली लड़की 8 बजे आती है।
पर न जाने क्यों,
पुजारी की जवान बेटी खामोश रहती है।
मंदिर के पीछे ही बने कमरे में रहते हैं दोनों।
माँ को मरे अर्सा हो चुका है।
रात जब खामोश हो जाती है,
सिसकियाँ उभरती हैं मंदिर से।
कोई खुद के मर जाने की,
प्राथनाएं करता है प्रभु से।
मैं रात भर सो नहीं पाता हूँ।
काश! इंसान की जगह,
ईश्वर अतिक्रमण करता लोगों के दिलों पर।
काश! कि ऐसा होता, होता।
(आग़ाज़)

Abstract Poem