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ज़िंदगी...

My Hindi Two-liners about ‘Life’…

कभी इसके, कभी उसके इशारों पर चलती,
ये ज़िंदगी जुए का दाँव हो जैसे कोई…

ज़िंदगी के कैन्वस पर तख़य्युल (Imagination) का चेहरा उकेर कर देखो, 34 और  शब्द

#रshmi

कृतज्ञता

मेरे प्रभु

रहा संग तू

न मैं ये भूलूं, मेरे प्रभु

 

असमर्थता की निर्जीवता में

तू विश्वास के प्राण भरता रहा

निराशा के अंधेरों में अक्सर

टिमटिमाता, उजाला करता रहा

मगर जब रुक ही गए कदम

ली तलवार तूने लड़ा जंग तू

न मैं ये भूलूं, मेरे प्रभु

 

उतारा जिस भी समंदर में तूने

तैराकी के अंदाज़ सिखाता रहा

अड़चनों से लड़ना, बच कर निकलना

तू राहें नईं दिखाता रहा

उस समय जब डूब ही जाती देह

अचंभा, कि आया, तिनका बन तू

न मैं ये भूलूं, मेरे प्रभु

 

खेल खिलाए अनोखे अनोखे

हराता, सिखाता, जिताता रहा

परिश्रम तेरा और मेरा पताका

करे कभी भी न मोह भंग तू

न मैं ये भूलूं, मेरे प्रभु

 

मेरे प्रभु

रहा संग तू

न मैं ये भूलूं, मेरे प्रभु

Relations

घर...

हम अकेलेपन के अँधेरे में खो रहे थे,
ये दुनिया कहती थी
हम घर में सो रहे थे…

दर्द भी छुपाते थे (और)
मरहम भी लगाते थे,
हम दरअसल दीवारों में घर ढ़ो रहे थे…

कुछ अरमान भी थे ख़ैर यूं तो,
वो मग़र झूमर पर झूल रहे थे…
एक कहानी बन गई दरवाज़ों के पीछे,
आलमारियों को दीमक़ चख रहे थे…

बैठा था वो पुराना घर भी
दफ़्न किये, कई राज़
जो उसे बेहद तंग कर रहे थे…

#रshmi

©TheRashmiMishra.com

Hindi Poetry

उम्र भर का है दुश्मन

मेरे दिल की दुनिया में एक सूना सा आँगन है,
जिसकी दीवारों पे कुछ भी नहीं है अपना।

ख़्वाबों को क्या देखें? जिसे दोस्त समझा,
वो ही उम्र भर का है दुश्मन अपना।

उमरते हैं बादल, घने – काले बरसने को,
पर उसके छत्ते पे आके रंग बदल लेते हैं अपना।

परमीत सिंह धुरंधर

"ये दूरी एक तपस्या है"

ये विरह बड़ी समस्या है,
तेरी भी और मेरी भी|
ये दूरी एक तपस्या है,
तेरी भी और मेरी भी||

जो किया क्या वो सही किया?
जो जिया क्या वो सही जिया?
तू प्रश्न हमेशा करती है,
मैं उत्तर न दे पाता हूँ,
कि होनी एक अटल अवस्था है,
तेरी भी और मेरी भी|
ये दूरी एक तपस्या है,
तेरी भी और मेरी भी||

मैं कटे फूल सा मुरझाया,
तू बिन बारिश धरती सी है|
मैं सांसों का एक चलता साया,
तू रुकी हुई नदिया सी है|
अनसुलझी सी एक व्यथा है,
तेरी भी और मेरी भी|
ये दूरी एक तपस्या है,
तेरी भी और मेरी भी||

दो जिस्म भले हम दिखते हों,
आत्मा तो अपनी एक है|
दिल दो भले धड़कते हों,
धड़कन तो उनकी एक है|
फिर एक जैसी ही तो तमन्ना है,
तेरी भी और मेरी भी|
ये दूरी एक तपस्या है,
तेरी भी और मेरी भी||

तुझ संग मैं बाग़ सा खिलता हूँ,
और तू कली सी महकती है|
मैं प्रेम गगन में उड़ता हूँ,
जहाँ तू चिड़िया सी चहकती है|
बेसब्र मिलन की इच्छा है,
तेरी भी और मेरी भी|
ये दूरी एक तपस्या है,
तेरी भी और मेरी भी||

पर तुझको याद दिला दूँ मैं,
सब दिन एक जैसे न होंगे|
तुझको ये बात बता दूँ मैं,
हम दूर हमेशा न होंगे|
कि हर पल में यही दुआ है,
तेरी भी और मेरी भी|
ये दूरी एक तपस्या है,
तेरी भी और मेरी भी||

Close To Heart

धिक् धिक् धिक्कार है

किस मज़हब से सीखे थे

धर्म ये कौन सा माने थे

कैसी यह तेरी फ़ितरत थी

आदत कौन सी पाली थी  

                            संस्कार सब रख दिए ताक पर

                          धिक् धिक् धिक्कार है तुम पर

आँखों में उसके सपने थे,

अरमान बहुत सुनहरे थे

सुन्दर थी वो सलोनी थी

मन की बहुत भोली थी

                             पसीजे नहीं उसकी मनुहार पर, 

                                 धिक् धिक् धिक्कार है तुम पर

जीवन के रंग रूपहले थे

सभी तो उसके अपने थे

बाबुल की वो प्यारी थी ,

सबकी बहुत दुलारी थी

                           उजड़े सपने अपनों के ही द्वार पर, 

                          धिक् धिक् धिक्कार है तुम पर

तुम सत्ता में मतवाले थे

दंभ क्यों इतना पाले थे

टूटी वह जो एक नगीना थी

ज़िंदगी बनी खिलौना थी

                        इतना क्यों अहंकार है स्वयं पर,

                          धिक् धिक् धिक्कार है तुम पर

अजब तुम्हारे व्याकरण थे

गजब तुम्हारे निराकरण थे

न हिन्दू थी न मुस्लिम थी

बेटी थी वो केवल बेटी थी

                                चाहिए क्या जयकार कृत्य पर,

                                 धिक् धिक् धिक्कार है तुम पर

पुरूष जाति का दर्प लिए थे

और कापुरुष का कर्म किये थे

लज्जा तो सारी बह गयी थी

और हया काफूर हो गयी थी

                                लानत है इस भीरु कार्य पर

                               धिक् धिक् धिक्कार है तुम पर

कविता : तुमने कहा था

http://hindi.webdunia.com/hindi-poems/hindi-poem-118041800022_1.html

तुमने कहा था साथ रखना,

सब होगा अच्छा विश्वास रखना।

कोई बैरी नहीं सपनों का,

स्वप्न मगर कुछ खास रखना।

जिससे हिल जाए घर की दीवारें,

नहीं कोई ऐसी बात रखना।

 

कांटों से चुभते जीवन में,

हंसने का उल्लास रखना।

अंधेरी रातों का डर नहीं,

अंतर केवल प्रकाश रखना।

तुमने कहा था कि पतझड़ में,

बसंत आने की आस रखना।

Relations